श्री राजनाथ सिंह द्वारा ‘निर्मल गंगा अभियान’ कार्यक्रम में दिया गया पूरा भाषण (12/02/14)

12 जनवरी। बहन उमा भारती जी, डॉ. हर्षवर्धन जी, सुश्री अनित सिंह जी और सभागार में उपस्थित मेरे सभी सम्मानित बहनों एवं भाइयों। अविरल गंगा के बारे में आप जानते हैं, बहुत विस्तार में जाकर मुझे बताने की जरूरत नहीं है। और गंगा के संबंध में यह भी मैं दावा पेश नहीं कर सकता कि बहुत कुछ जानता हूं। आप सभी जानते हैं, सारा देश जानता है, गंगा के प्रदूषण को लेकर सारा देश चिंतित है। और 1985-86 से ‘गंगा एक्शन प्लान’ योजना बनाई थी, उस समय की सरकार ने कि गंगा में जो प्रदूषण हो रहा है, यह प्रदूषण नहीं होना चाहिए, नहीं तो देश के आर्थिक विकास पर बहुत ही प्रतिकूल असर पड़ेगा। और उसी समय गंगा एक्शन प्लान बना था। तब से लेकर आज तक जहां तक मुझे जानकारी है, लगभग डेढ़ हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं और शायद हाल में ही विश्व बैंक ने भी गंगा को स्वच्छ और निर्मल रखने के लिए 2,600 करोड़ रुपए खर्च करने का निर्णय किया है।

गंगा का जहां तक प्रश्न है, हम उसे मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं। गंगा के बारे में यह धारणा है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश- ये जो त्रिदेव हैं, हम तीनों की अलग-अलग अगर पूजा करते हैं तो तीनों का अलग-अलग आशीर्वाद प्राप्त होता है, लेकिन गंगा की अगर हम केवल पूजा करते हैं तो हमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। क्योंकि विष्णु के पैर के नाखून से होकर गंगा निकली है और ब्रह्मा के कमंडल में आकर अवतरित हुई है और फिर वहां से शिव की जटा में और फिर शिव की जटा से होकर धरती पर अवतरित हुई हैं, यह गंगा के संबंध में एक धारणा है।

हम यह भी जानते हैं कि भारत हमारा सनातन राष्ट्र है और गंगा हमारी बहुत पवित्र नदी है। लेकिन जब हम अपने भारत को सनातन राष्ट्र कहते हैं तो इसे क्यों कहते हैं, इसलिए कि सनातन राष्ट्र की पहचान दो चीजों से होती हैं- ऋषि और कृषि। तो मैं समझता हूं कि गंगा एक ऐसी नदी है जिसका भारत को एक सनातन राष्ट्र बनाने में बहुत बड़ा योगदान है। ऋषि- देश के सांस्कृतिक विकास से जुड़ी व्यवस्थाओं का प्रतीक है। कृषि- देश का आर्थिक, भौतिक, सुख और समृद्धि के विकास से जुड़ी व्यवस्थाओं का प्रतीक। इसलिए यह विश्व की एक ऐसी पवित्र नदी है जिसके किनारे बसे हुए जो लोग हैं, उनकी संस्कृति भी विविध प्रकार की है। एक विदेशी लेखक हैं- आईएल वॉसम। उन्होंने यह लिखा है कि भारत की संस्कृति और विविधता को अगर समझना हो तो गंगा के किनारे बसे क्षेत्रों को देखने के बाद ही संभव हो सकता है।

और हम यह बात जानते हैं कि भारत ने कभी केवल अपने आर्थिक विकास की चिंता नहीं की है, बल्कि इसके साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास की भी चिंता की है। भारत अगर विश्व में जगत-गुरु के पद पर आसीन था, दूध की नदियां बहती थीं, या सोने की चिड़िया कहलाती थी, तो इसलिए क्योंकि आर्थिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित था। यानी हमारे यहां आर्थिक के साथ आध्यात्मिकता का भी कहीं अधिक महत्व रहा है और इन दोनों की प्रतीक गंगा रही है। और आपको याद होगा कि राजकपूर ने एक फिल्म बनाई थी- राम तेरी, गंगा मैली। उस फिल्म में एक गाना था- राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते। तो उस समय भी मुझे लगता है कि राजकपूर भी गंगा के मसले पर दुखी होंगे, इसलिए उन्होंने इस तरह की फिल्म बनाने का निर्णय लिया।

मैं भी यह मानता हूं कि जो हमें नहीं करना चाहिए, वह हमने अपने सुख और वैभव के लिए किया। इसी कारण गंगा हमलोगों के पाप की वजह से अपवित्र हुई है। आज गंगा को अविरल और पवित्र रखने के लिए हम सभी को संकल्प लेने की आवश्यकता है। गंगा को निर्मल और अविरल रखने के लिए भाजपा ने जो उमा जी को जिम्मेदारी दी है, मुझे लगता है कि निश्चित रूप से उन्हें कामयाबी मिलेगी, क्योंकि वह जिस चीज में हाथ लगाती हैं, सफलता मिलती ही है। मैं जानता हूं कि गंगा यदि इस धरती पर आई है तो बहुत आसानी से नहीं आई हैं, सहजता से नहीं आई हैं, उसके लिए भगीरथ ने प्रयास किया। वैसे ही गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए भगीरथ प्रयास करने की आवश्यकता है। भाजपा इसके लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हमारी सरकार आएगी तो हम गंगा को निर्मल और अविरल बनाएंगे। मेरी निजी धारणा है कि केवल धन के प्रवाह से गंगा को अविरल नहीं बनाया जा सकता, बल्कि जल के प्रवाह से ही अविरल बनाया जा सकता है। तो उस जल की धारा को बढ़ाने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए, उस संबंध में भी बहन उमा जी ने अच्छी-खासी योजना बनाई है, कुछ एक्शन प्लान बनाया है। हमारी सरकार बनने पर केवल उन एक्शन प्लान को लागू किया जाएगा, ऐसा नहीं है। बल्कि उसमें जो भी संशोधन की आवश्यकता होगी, हमारी सरकार आने पर उसे पूरा करेंगे। क्योंकि मैं जानता हूं कि भारत ही नहीं दुनिया के बहुत सारे देशों की जिनकी पुरानी संस्कृति रही है, उन्होंने भी अपने यहां की नदियों के महत्व को समझा है। लंदन की टेम्स नदी 19वीं शताब्दी में जब प्रदूषित हो गई थी, तब लंदनवासियों ने मिलकर यह संकल्प लिया था कि हम सब मिलकर टेम्स नदी को पवित्र बनाएंगे। तब से लेकर आज तक लंदन की वह टेम्स नदी प्रदूषित नहीं हो पाई है। भाजपा ने जो यह संकल्प लिया है कि हम गंगा को पवित्र और निर्मल बनाकर ही दम लेंगे तो मैं समझता हूं कि हम इसमें कामयाब भी होंगे और ऐसी व्यवस्था करेंगे जिससे हमारी गंगा मां कभी प्रदूषित नहीं होने पाएगी।

गंगा के जल के महत्व को भी आप बखूबी समझते हैं। सर्वाधिक ऑक्सीजन अगर किसी जल में होता है तो वह गंगा के ही जल में होता है। यही कारण है कि लंबे समय तक गंगा का जल यदि कहीं रख दिया जाता है तो उसमें कभी कीड़े नहीं पड़ते। लेकिन दूसरी नदियों के जल में कुछ ही दिनों में कीड़े पड़ जाएंगे। और गंगा के जल के वैज्ञानिक महत्व को हमारे ऋषियों व महर्षियों ने समझा। मैं कभी आश्चर्य में पड़ जाता हूं कि हमारे वैज्ञानिकों के पास इतनी सूझबूझ थी कि वह इन सब चीजों को समझते थे। मैं यह भी मानता हूं कि जो हमारे वैज्ञानिकों के पास सोच और समझ रही है, विश्व में किसी भी वैज्ञानिक के पास वो सोच और समझ नहीं रही है। और ज्ञान व विज्ञान के मामले में भी यदि पहली जानकारी कहीं से प्राप्त हुई है तो भारतीय वांगमय और भारत की धरती से प्राप्त हुई है। उदाहरण सैंकड़ों है। लेकिन हमारी जो नेशनल काउंसिल है, उसमें मैंने एक उदाहरण दिया था कि एक विज्ञान का नियम है- अनिश्चितता का सिद्धांत कहते हैं। हाइजन वर्ग, उनका यह सिद्धांत है। तो हमारे देश के वैज्ञानिक यह मानते रहे कि हाइजन वर्ग एक विदेशी हैं और ऐसा ज्ञान अगर किसी के पास हो सकता है तो विदेशियों के पास ही हो सकता है। लेकिन हाइजन वर्ग से उनके ऑस्ट्रेलिया के साथी फिज कोपरा ने पूछा कि ये बताइए कि इसके ज्ञान का मूल कहां से प्राप्त हुआ, तो उन्होंने बताया कि जब मैं आचार्य रविन्द्र नाथ टैगोर के साथ वेदांत पर चर्चा कर रहा था, तब उसकी जो बेसिकल फंडामेंटल्स थी, वहां से प्राप्त हुई थी। उसी के बाद हमने इस अनिश्चितता के सिद्धांत की तलाश की। इसलिए मैं कहता हूं कि ज्ञान और विज्ञान के बारे में हमारा देश बहुत आगे है। लेकिन मैं कह सकता हूं कि ज्ञान और विज्ञान के बारे में हमारी आज की पीढ़ी को जो जानकारी होनी चाहिए, वो नहीं है। मैं समझता हूं कि आज ऐसी सरकार की भी आवश्यकता है कि जो भारत की संस्कृति, परंपरा, प्राचीन, ज्ञान और विज्ञान के बारे में हमारे नवयुवकों को वो जानकारी हो सके, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। लेकिन आज हम सब गंगा को निर्मल, अविरल और अपवित्र बनाने के लिए यहां पर आए हैं और मैं इतना ही आप सबको भरोसा दिलाना चाहता हूं कि हमारी जिस भी प्रकार की सहयोग की आवश्यकता होगी, वह हम तन, मन और धन से पूरी तरह करेंगे। आपका भगीरथ प्रयास पूरी तरह से सफल होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

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