श्री राजनाथ सिंह जी का शिक्षक प्रकोष्ठ को संदेश (17/12/13)

भारतीय जनता पार्टी के शिक्षक प्रकोष्ठ की बैठक केन्द्रीय कार्यालय, 11, अशोक रोड पर सम्पन्न हुई जिसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह जी ने संबोधित किया।

शिक्षक प्रकोष्ठ पर जो कार्यसमिति की बैठक अगस्त के महीने में हुई थी उसमें मैंने कहा था कि शिक्षा को लेकर कोई न कोई एक पॉलिसी-डॉक्यूमेंट तैयार किया जाना चाहिए। इस संबंध में चूंकि पहल हुई, इसके लिए मैं धन्यवाद देता हूं। जो हमारा विजन डॉक्यूमेंट तैयार हो रहा है उसमें जो भी पॉलिसी डॉक्यूमेंट तैयार होगा उसे विजन डॉक्यूमेंट में शामिल कराया जाएगा। मुझे विश्वास है कि हमारी सरकार आएगी और तब हम अक्षरश: इसे लागू करवाएंगे और हमारा यही उद्देश्य है। जो शिक्षक प्रकोष्ठ भारतीय जनता पार्टी ने बनाया तो उसके पीछे यही उद्देश्य था कि शिक्षक की भूमिका सिर्फ क्लास-रूम तक ही सीमित नहीं है बल्कि शिक्षक के लिए पूरा का पूरा समाज ही एक प्रयोगशाला है। भारत के इतिहास के पन्नों को अगर हम पलटकर देखेंगे तो स्वाभाविक रूप से हम इस नतीजे पर पहुचेंगे कि जब भी देश में सामाजिक परिवर्तन हुआ है अथवा एक नयी सामाजिक चेतना जागृत करने की आवश्यकता हुई है, प्राचीन भारत से लेकर आज तक इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका यदि किसी ने निभाई है तो वह इस समाज के शिक्षक समुदाय ही हैं। भाइयों, जो भारत अपने ज्ञान और विज्ञान के कारण कभी विश्व-गुरु माना जाता था, क्या हम उसे पुनः वही दर्जा दिला पाएंगे? मेरा मानना है कि जब अंग्रेजों की हुकूमत यहां पर थी और जब ईस्ट इंडिया कंपनी यहां आई तो भारत को गुलाम बनाना उनका उद्देश्य था। उन्हें कामयाबी भी हासिल हुई लेकिन 1947 में हमें आज़ादी मिली। चूंकि हम शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए हैं तो स्वाभाविक रूप से मेकाले की सोच क्या थी, किस प्रकार की शिक्षा पद्धति इस देश में लागू की जानी चाहिए, उससे भी आप सब परिचित होंगे। मेकाले का निश्चित रूप से उद्देश्य यही था कि भारत को सचमुच यदि हमको गुलाम बनाना है और लंबे समय तक गुलाम बना के यदि हमें रखना है तो जब तक भारतवासियों की आस्था-श्रद्धा, भारत की धरोहर और भारत के सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति बनी रहेगी, तब तक भारत को पूरी तरह से गुलाम नहीं बनाया जा सकता। मतलब भारत की धरोहर, भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति उसकी जो आस्था है, उसे कमजोर किया जाए, हीन भावना पैदा की जाए और पाश्चात्य संस्कृति और पाश्चात्य जीवन मूल्यों के प्रति उसकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास को बढ़ाया जाए। यही उसका उद्देश्य था और शायद यह सोच मेकाले के मस्तिष्क में तब आई थी। जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी का एक कर्मचारी था चार्ल्स ग्रांड जिसने कहा कि जितना ज्ञान-विज्ञान भारत की पुस्तकों में है, देखा जाए तो हमारे देश में एक अलमारी में ही सारा ज्ञान-विज्ञान बंद है। मेरी निश्चित धारणा है कि जब भी हमारी सरकार आएगी तो जो मेकाले का कोट है- भारत की हर पुस्तकों में उसे प्रकाशित किया जाना चाहिए। ताकि लोग सोचें कि भारत की संस्कृति, भारत की धरोहर और भारत की परम्पराओं से यदि हम सचमुच भारत को काट देंगे तो जो भारत की पहचान हम बनाकर रखना चाहते हैं, क्या वो हो पाएगा? आज हमारे यहां धार्मिक ग्रन्थों को अथवा भारतीय संस्कृति से जुड़े हुए जो भी हमारे ग्रंथ हैं, उन्हें पढ़ने के ऊपर ज्यादा आग्रह नहीं किया जाता। आज भी हमारे भारतीय संस्कृति के पास जो अनमोल निधि हैं, मैं विश्वास के साथ ये कह सकता हूं कि विश्व में किसी के पास ये अनमोल निधि नहीं है। चूंकि वो भी साइन्स स्टूडेंट रह चुके हैं इसलिए वो सैकड़ों ऐसे उदाहरण दे सकते हैं कि आज बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी जिन तथ्यों की इस वक़्त खोज कर रहा है, रिसर्च कर रहा है, वह सारे तथ्य भारत में पहले से ही मूलरूप से विद्यमान थे, उसपर काम हो चुका है। आजादी के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में जो मौलिक परिवर्तन होना चाहिए था, वो नहीं हुआ। जो ऐसा दावा करते हैं कि परिवर्तन हुआ है और हमने यहां की शिक्षा पद्धति को आधुनिक बना दिया है, मैं उनसे ये पूछना चाहता हूं कि आजादी के 67 वर्षों के बाद भी आज हिंदुस्तान में पर्सेंटेज ऑफ लिटेरेसी 64 या 65 परसेंट क्यूं है ? क्या हमें ऐसी ही एजुकेशन सिस्टम चाहिए ? भारत में हर व्यक्ति शिक्षित था। बॉम्बे प्रेसीडेंसी थी, कलकत्ता प्रेसीडेंसी थी, मद्रास प्रेसीडेंसी थी। उस समय की पुस्तकों को अगर पढ़ा जाए तो देखने को मिलेगा कि प्राचीन भारत में समाज के हर वर्ग के लोग शिक्षित थे और आज क्या हालात हो गए हैं। आज की शिक्षण-व्यवस्था लोगों को चिंतक नहीं बना रही है। पुराने साहित्यकारों की लेखनी में एक सोच और गहराई होती थी जो आज देखने को नहीं मिलती। भारत की सबसे बड़ी विशेषता ये रही थी कि प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने भारत की शिक्षा व्यवस्था का राजनीतिकरण नहीं होने दिया था। वहीं पश्चिम में हेनरी 8वीं के समय में ही शिक्षा के राजनीतिकरण का सिलसिला प्रारम्भ हुआ और तब से तरह तरह की विचारधाराएं पढ़ाई जाती हैं। आजादी मिलने के बाद जिस तरह से शिक्षा का राजनीतिकरण हुआ, उसका नतीजा सबके सामने है कि कैसे महाराणा प्रताप, शहीद भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद, गुरु गोबिन्द सिंह के बारे में एनसीईआरटी की पुस्तकों में क्या कुछ प्रकाशित किया गया, उन्हें आतंकवादी बताया गया। कौन राजनीतिकरण कर रहा है ? आजाद भारत में ये सब चीज़ें हो रही हैं। शिक्षक प्रकोष्ठ को इसलिए बनाया गया, ताकि इन चुनौतियों से निपटा जा सके। शिक्षा व्यवस्था में एक मौलिक परिवर्तन होना चाहिए, ये भारतीय जनता पार्टी की सोच है और इसलिए पहली बार शिक्षक प्रकोष्ठ बनाया गया। इसके पहले कभी भी शिक्षक प्रकोष्ठ नहीं हुआ करता था। ये बात सच है की शिक्षक प्रकोष्ठ बनने के बाद इस बार बहुत जल्द चुनाव हमारे सिर पर आसंद हो गए हैं तो एक बेहद ही गहन, मनन और चिंतन के बाद जो हमे एक पॉलिसी तैयार करनी है वो जल्दी नहीं हो पाएगा, क्योंकि हमें चुनाव में भी अच्छा करना है। इसलिए सभी को बिना घबराए स्थायी भाव से इस काम को करना है, यही लक्ष्य हमारे सामने होना चाहिए। “शिक्षकों का काम सिर्फ लोगों को ज्ञान ही देना नहीं होता है बल्कि वह एक समाज सुधारक की भूमिका भी निभा सकता है, भारत की राजनीति को ठीक करने का काम भी कर सकता है और लोगों के अंदर चेतना जागृत करने का काम भी हमारा शिक्षक समुदाय कर सकता है”।

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