बलिदान का ऋण  केवल रक्त-संबंधों  से नहीं, कर्तव्य-पालन से चुकता है: रक्षा मंत्री

Text of RM’s speech at an event at the Rashtriya Mandir Vishva Ramayana Ashram in New Delhi.

आज जब मैं इस पवित्र प्रांगण में उपस्थित हूँ, तो मेरा हृदय कृतज्ञता से भरा हुआ है। क्योंकि आपने आज का दिन उनको समर्पित किया है, जिन्होंने अपने जीवन का एक-एक कण राष्ट्र और समाज के लिए अर्पित कर दिया।

वैसे भी, अभी पितृ पक्ष चल रहा है, और पितृ पक्ष का यह अवसर हमें अपने बलिदानियों का भी स्मरण करा रहा है। हम उनके ऋणी हैं, जिन्होंने अपने रक्त से, अपने शौर्य से, अपने त्याग से, इस राष्ट्र की मिट्टी को पवित्र किया।

उनका ऋण तो हम नहीं चुका सकते, लेकिन अपनी तरफ से एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि उन्हें अवश्य अर्पित कर सकते हैं। इसलिए आज के इस कार्यक्रम के लिए, मैं आयोजकों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

साथियों, हमारी जो संस्कृति है, उसके बारे में एक बात हमेशा कही जाती है, कि यह विश्व की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में से एक है। और मैं समझता हूं, कि ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी “स्मरण की परंपरा” है। हमारे यहाँ स्मरण करना, किसी को याद करना, केवल औपचारिकता नहीं है। हम हमेशा अपने पूर्वजों को याद करते हैं, क्योंकि हम जो कुछ भी हैं, वह उनके कारण हैं। हम उनके विस्तार हैं, जो हमसे पहले इस दुनिया में आए थे।

हमारी स्वतंत्रता, उनके बलिदानों का परिणाम है।

हमारी संस्कृति, उनके तप का फल है।

हमारा राष्ट्र, उनके त्याग की देन है।

 

और यही कारण है, कि त्रिवेणी सेवा मिशन द्वारा स्थापित, राष्ट्र मंदिर विश्व रामायण आश्रम का यह प्रयास, इतना महत्वपूर्ण है। आप जो प्रयास कर रहे हैं, वह हमारी महान भारतीय परंपरा के पुनर्जागरण के प्रयास हैं, जिसमें “वसुधैव कुटुंबकम” का भाव निहित है।

आज जब मैं विश्व रामायण आश्रम में उपस्थित हूँ, तो मुझे रामायण का वह प्रसंग याद आ रहा है, जो हमें यह सिखाता है, कि बलिदान का ऋण केवल रक्त संबंधों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों से चुकाया जाता है।

जब रावण, माता सीता का हरण करके उन्हें ले जा रहा था, तो जटायु ने उसे रोकने का प्रयास किया। जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए रावण से भीषण युद्ध किया। जटायु वृद्ध थे, लेकिन उनका कर्तव्यबोध अटल था। रावण ने जटायु के पंख काट दिए। जटायु धरती पर गिर पड़े। और आगे चलकर, जटायु ने भगवान राम की गोद में अपने प्राण त्याग दिए।

लेकिन यह प्रसंग यहीं समाप्त नहीं होता। भगवान राम ने जटायु को केवल एक पक्षी नहीं माना। उन्होंने जटायु को पिता तुल्य समझा। और एक पुत्र का कर्तव्य निभाते हुए, उन्होंने जटायु की अंतिम क्रिया की जिम्मेदारी उठाई। राम ने उनका दाह संस्कार किया, उनका तर्पण किया, उनके लिए वह सब किया, जो हमारी संस्कृति में एक पुत्र अपने पिता के लिए करता है।

जटायु राम के पितर नहीं थे, लेकिन राम ने उन्हें पितर का दर्जा दिया, क्योंकि जटायु ने राम के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया था।

 

इसीलिए, जब हम पितृपक्ष में तर्पण करते हैं, तो हमें केवल अपने पूर्वजों का ही स्मरण नहीं करना चाहिए।

हमें उन बलिदानियों का भी स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने हमारी रक्षा के लिए अपने प्राण त्याग दिए।

हमें उन संतों का भी स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने अपने तप से राष्ट्र को दिशा दी।

हमें उन क्रांतिकारियों को भी स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण दिए।

हमें उन वीरांगनाओं को भी स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने अपने परिवार के बलिदान को जिया।

ये सब रक्त से न सही, लेकिन कर्तव्य से हमारे पितर हैं।

ये सभी जन्म से न सही, लेकिन बलिदान से हमारे पूर्वज हैं।

 

यही भावना रामायण हमें सिखाती है। राम ने जटायु का तर्पण किया, तो उन्होंने यह सिद्ध किया, कि राष्ट्र के रक्षक कभी अज्ञात नहीं रहते।

उनका ऋण चुकाया जाता है।

उनका स्मरण किया जाता है।

उनका तर्पण किया जाता है।

आज जब हम राष्ट्र मंदिर में एकत्र हुए हैं, तो हमें यह संकल्प भी लेना चाहिए, कि हम उन सभी का भी तर्पण करेंगे, जो हमारे लिए लड़े। हम उन्हें कभी नहीं भूलेंगे। और हम आने वाली पीढ़ियों को भी यही शिक्षा देंगे, कि पितृपक्ष केवल पितरों का नहीं, हमारे रक्षकों का भी है।

साथियों, एक और बात की ओर ध्यान देना आवश्यक है। हम जिन महापुरुषों का स्मरण कर रहे हैं, जिन बलिदानियों को नमन कर रहे हैं, जिन संतों, सैनिकों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं, वे सभी बड़े व्यक्तित्व थे, बड़े हृदय वाले मनुष्य थे। और बड़ा मनुष्य कभी केवल अपने लिए नहीं जीता। वह अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित करता है, दूसरों के सुख-दुःख को अपना मानता है और सबके लिए जीता है।

जैसे कोई विशाल वटवृक्ष होता है न, उसकी छाया में अनेक जीव-जंतु, पक्षी और प्राणी आश्रय पाते हैं। वटवृक्ष अपनी छाया देते समय यह भेद नहीं करता, कि उसके नीचे कौन प्रश्रय पा रहा है। उसकी प्रकृति ही है, आश्रय देना, संरक्षण देना और जीवन को पोषित करना।

और तो और, उसी वृक्ष का सहारा लेकर कई बार कुछ ऐसी शक्तियाँ भी पनप जाती हैं, जो अनजाने में या स्वार्थवश उस वृक्ष को ही कमजोर करने लगती हैं। यह भी संभव है, कि कभी-कभी कुछ लोग उस उदारता का लाभ उठाएँ। कुछ लोग उसकी छाया में आश्रय पाकर भी उसकी जड़ों को कमजोर करने का प्रयास करें। लेकिन महान व्यक्तित्वों की विशेषता यही होती है, कि वे परिस्थितियों को समझते हुए भी अपने उदार भाव को नहीं छोड़ते। उन्हें यह भी ज्ञात होता है, कि कौन उनके स्नेह का लाभ उठा रहा है, कौन उनके धैर्य की परीक्षा ले रहा है; फिर भी वे अपने स्नेह का द्वार बंद नहीं करते।

स्वामी दयानंद सरस्वती के बारे में कौन नहीं जानता है! बताते हैं, कि उनके अपने ही रसोइए जगन्नाथ ने, एक षड्यंत्र के तहत उन्हें दूध में काँच का चूरा मिलाकर दे दिया था, जिससे स्वामी जी की आगे चलकर मृत्यु हो गयी। ऐसे जगन्नाथ आज भी हमारे समाज में कम नहीं हैं। और मजे की बात देखिए, कि अंतिम समय में जगन्नाथ को पछतावा हुआ, तो उसने जाकर स्वामी जी से क्षमा याचना की। और स्वामी जी के बड़प्पन की पराकाष्ठा देखिए। उन्होंने न केवल जगन्नाथ को क्षमा किया, उल्टे उसे कुछ पैसे भी दिए। उन्होंने उसे हिदायत दी, कि ‘जगन्नाथ! तुम यह स्थान छोड़कर यथाशीघ्र निकल जाओ। यदि लोगों को यह बात पता चल गई, तो तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा। और इस तरह स्वामी जी ने उसके प्रति भी उपकार किया, जिसने स्वामी जी के प्रति अपकार किया। इसीलिए मैंने अभी कहा, कि महान व्यक्तित्वों की विशेषता यही होती है, कि वे परिस्थितियों को समझते हुए भी अपने उदार भाव को नहीं छोड़ते। क्योंकि बड़प्पन केवल शक्ति और सामर्थ्य में नहीं, बल्कि सहनशीलता, उदारता और सबको साथ लेकर चलने की क्षमता में भी होता है।

यही हमारे उन महान पूर्वजों, संतों और सैनिकों की पहचान थी, जिनके त्याग और तपस्या के बल पर हम आज खड़े हैं। उन्होंने भी जीवन में अनेक प्रकार के लोगों को देखा होगा। कुछ उनके साथ चलने वाले रहे होंगे, कुछ उनके स्नेह और संरक्षण से लाभान्वित होने वाले भी रहे होंगे। लेकिन उन्होंने किसी को अपनी छाया से वंचित नहीं किया। क्योंकि वे वटवृक्ष की तरह थे, जो बदले में कुछ माँगे बिना छाया देता है, फल देता है और अपने आसपास के जीवन को निरंतर समृद्ध करता है।

इसलिए, जब हम ऐसे महापुरुषों को स्मरण करते हैं, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि हम उनके ऋणी हैं। और उनका यह ऋण हम अपनी श्रद्धा और अपने कर्तव्यों से ही चुका सकते हैं। आज का यह आयोजन हमें यही सन्देश देता है।

साथियों, एक प्रश्न अक्सर उठता है। और यह प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है। कि आज दुनिया के अलग-अलग देश, नए-नए मुकाम हासिल कर रहे हैं। कोई विज्ञान और प्रौद्योगिकी में छलांग लगा रहा है। कोई हाइपर सोनिक मिसाइल विकसित कर रहा है। कोई Artificial Intelligence में नए आयाम छू रहा है। कोई Quantum technology पर काम कर रहा है। तो ऐसे में, इस प्रकार के आयोजनों की क्या सार्थकता है? इनका क्या अर्थ है? ये सब आयोजन आखिर क्यों जरूरी हैं?

मुझे ऐसा लगता है, कि इस तरह के आयोजन बहुत आवश्यक हैं। और ये इसलिए आवश्यक हैं, क्योंकि ऐसे आयोजन हमें सद्कर्मों के लिए प्रेरित करते हैं, हमें आत्मिक बल देते हैं, और सबसे महत्त्वपूर्ण, ये हमारे मन-मानस की शुद्धि करते हैं। ये हमारे मन का विरेचन करते हैं। ये हमें हमारी उस मूल धारा से जोड़ते हैं, जिससे हम कहीं बहक गए हैं।

जैसे आप समझिए, मानव मन का स्वभाव ही ऐसा है। जब हम अपनी जड़ों से दूर चले जाते हैं, जब हम अपने सुख-सुविधाओं के दायरे में बंद हो जाते हैं, जब हम अपने Comfort zone में सिमट जाते हैं, तो हम साधु-संतों से लेकर हमारे सैनिकों तक, उन सबको भूलने लगते हैं, जिन्होंने हमारे लिए इतना किया।  उनके त्याग को, उनके बलिदान को, हम विस्मृत करने लगते हैं। हमारे मन के ऊपर एक कलुष जमने लगता है। धूल जमने लगती है। यह धूल केवल हमारे मन के लिए नहीं, हमारे पूरे समाज के लिए घातक होती है।

यह मन का कलुष ही होता है, जो आए दिन राष्ट्र-विरोधी नारे लगाता है, और यह मानस की शुद्धि ही होती है जो राष्ट्र को अपना सर्वस्व मान बैठता है।

यह मन का कलुष ही होता है, जो अपने स्वार्थ के लिए समाज को बाँटता है; और यह मानस की शुद्धि ही होती है, जो अपने सुख से ऊपर उठकर समाज को जोड़ने का काम करती है।

यह मन का कलुष ही होता है, जो व्यक्ति को अपनी जान तक की बाजी लगाकर एरोप्लेन को हाइजैक करने जैसी विनाशकारी प्रवृत्ति की ओर ले जाता है; और यह मानस की शुद्धि ही होती है, जो व्यक्ति को अपनी जान तक की बाजी लगाकर एरोप्लेन और उसमें सवार लोगों को बचाने के लिए प्रेरित करती है।

इसीलिए मानस की शुद्धि अत्यंत आवश्यक होती है, और उसके लिए समय-समय पर इस प्रकार के आयोजन आवश्यक होते हैं। ये कार्यक्रम उस धूल को हटाने का कार्य करते हैं। ये दर्पण की तरह हमारे मन को साफ करते हैं। ये हमें पुनः उसी शुद्धि की ओर ले जाते हैं, जिसे अरस्तु ने कैथार्सिस, अर्थात् मन का विरेचन कहा था। ये आयोजन हमें पुनः उस धारा से जोड़ते हैं, जिससे हम कट गए थे। ये आयोजन हमें पुनः वह मार्ग दिखाते हैं, जिस पर चलना हमारा धर्म है।

अब आप कहेंगे, कि मन की शुद्धि की आवश्यकता क्यों है? तो इसका उत्तर भी मैं आपको उदाहरणों से समझाता हूँ।

आपको महाभारत की कथा याद होगी। युद्ध समाप्त हो गया। सबने अपने-अपने तरीके से भगवान श्रीकृष्ण से कुछ माँगा। किसी ने राज्य माँगा, किसी ने वैभव माँगा। लेकिन माता कुंती ने कृष्ण से कुछ अलग माँगा। उन्होंने कृष्ण से कहा, मैं चाहती हूँ कि दुःख और विपदा मेरे जीवन में बार-बार आएं, ताकि हम आपका बार-बार स्मरण कर सकें, आपको देख सकें, क्योंकि आपको देखने का मतलब है, कि हम बार-बार जन्म और मृत्यु नहीं देखेंगे।

यानी माता कुंती ने भगवान कृष्ण से दुःख माँगा। यह सुनकर सब आश्चर्यचकित रह गए। कृष्ण ने भी पूछा कि आप दुःख क्यों माँग रही हैं। इसपर माता कुंती ने तर्क दिया, कि “जब मैं सुख में रहूँगी, तो मैं आपको भूल जाऊँगी। लेकिन जब मैं दुःख में रहूँगी, तो मैं सदैव आपका स्मरण करूँगी।” यह दरअसल मन के विरेचन की बात थी, मन की निर्मलता की बात थी।

और यही बात रामचरितमानस में भी कही गई है। भगवान् कहते हैं,

निर्मल मन जन सो मोहि पावा।

मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥

जब मन निर्मल होता है, जब मन में मोह का पर्दा हट जाता है, तो जीव और ब्रह्म एक हो जाते हैं। हमारे द्वैत और अद्वैत दर्शनों का सार भी तो यही है, कि ईश्वर और जीव एक ही हैं। केवल मन का पर्दा, माया का पर्दा, भ्रम का पर्दा, हमें अलग करता है। जब यह पर्दा हटता है, तो हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेते हैं।

इसी संदर्भ में भगवान बुद्ध का एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। यह प्रसंग भगवान बुद्ध के दो शिष्यों का है। उनका जो आश्रम था, उसमें स्त्रियों के स्पर्श की मनाही थी। क्योंकि ब्रह्मचर्य का पालन करना होता था। बताते हैं, कि एक दिन की बात है। पास की नदी में, एक स्त्री डूब रही थी। वो नदी के बहाव के साथ बहती चली जा रही थी। स्त्री को डूबते हुए देखकर दोनों शिष्यों को चिंता हुई। लेकिन एक शिष्य सोचने लगा कि यदि मैं डूबती स्त्री को बचाने गया, तो बिना स्पर्श किये, मैं बचा नहीं पाउँगा। और यदि स्पर्श किया, तो स्त्री को स्पर्श न करने का, ब्रह्मचर्य का नियम भंग होगा। वो ये सब सोच ही रहा था, कि तभी दूसरे शिष्य ने जाकर उस स्त्री को बचा लिया और किनारे लगा दिया। दूसरे दिन उस शिष्य की शिकायत भगवान बुद्ध से की गई, कि “भगवन, इसने तो धर्म भंग कर दिया। इसने स्त्री को स्पर्श किया।” बुद्ध मुस्कुराए और बोले, कि “वह तो उस स्त्री को कल ही नदी के किनारे छोड़ आया था। लेकिन तुम तो उसे आज तक अपने मन में धारण किए हुए हो, तुम तो उसे अभी तक नहीं छोड़ पाए।

साथियों, यही मन की शुद्धि की बात है। घटनाएँ घटती हैं, लेकिन उसका बोझ हमारे मन पर नहीं रहना चाहिए। यही विरेचन है। और यह केवल प्राचीन काल की बात नहीं है। हमारे धर्मशास्त्रों, पुराणों से लेकर आज तक, हमारे संविधान, हमारी भारतीय न्याय संहिता, ये सब भी हमारे समाज के मानस की शुद्धि का कार्य करते हैं। ये हमें बताते हैं, कि क्या उचित है, क्या अनुचित है। ये हमें दिशा देते हैं। ये हमें सभ्य बनाए रखते हैं।

लेकिन मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ, कि हम अपने प्रयासों से केवल मन की शुद्धि ही नहीं कर रहे हैं। हम अपने राष्ट्र को हर क्षेत्र में आगे भी बढ़ा रहे हैं। हम अर्थव्यवस्था को लगातार मजबूत कर रहे हैं। हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नए आयाम छू रहे हैं। हम मिसाइलों का परीक्षण कर रहे हैं। हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। यानी हम मानसिक मजबूती के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूती की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं।

मैं यह मानता हूँ, कि, भारत को केवल technologically advanced नहीं, morally advanced भी बनना है।

हमारे पास missiles हों, लेकिन मन में मर्यादा न हो, तो शक्ति अधूरी है। हमारे पास Artificial Intelligence हो, लेकिन national consciousness न हो, तो विकास अधूरा है। यही हमारी विशेषता है। यही भारत की शक्ति है।

और भारत की इसी शक्ति का परिणाम है, कि हम अपने मानस की शुद्धि तो करते ही हैं, पर किसी ने हमारी ओर आँख उठाकर देखा, तो हम उसे भी शुद्ध कर देने की कूव्वत रखते हैं। ऑपरेशन सिंदूर, इस शुद्धिकरण का एक बड़ा उदाहरण है।

हमारी सरकार ने, और भी कई प्रयासों से अपनी संस्कृति को संरक्षित और संवर्धित करने का प्रयास किया है। सरकार के प्रयासों से उज्जैन में बाबा महाकाल के भव्य कॉरिडोर का निर्माण किया गया। जो महाकाल समस्त सृष्टि के जीवनदाता हैं, उनके परिसर को नया रूप प्रदान कर, उनकी सेवा में एक पुष्प अर्पण करने का प्रयास किया गया।

दुनिया की प्राचीनतम नगरी, ज्ञाननगरी काशी में बाबा विश्वनाथ धाम के परिसर के पुनरुद्धार का कार्य किया गया। पहले दूर-दूर से आई जनता को भगवान के दर्शन से पहले अनेक कठिनाइयों के दर्शन होते थे। बूढ़ी माताओं-बहनों के लिए बाबा विश्वनाथ के पास तक पहुँचना दुष्कर था। लेकिन आज आप जाकर देखिए, घाट से एक भव्य कॉरिडोर सीधा बाबा के मंदिर तक बन गया है। अब गंगा जी, बाबा विश्वनाथ जी का सीधा-सीधा दर्शन करती दिखाई देती हैं।

इसी प्रकार राम मंदिर का उदाहरण देखिए। जो रामचंद्र जी देश के जनमानस में निवास करते हैं, उन रामजी को अयोध्या में निवास मिलना कितना मुश्किल कार्य हो गया था। जाने कितनी पीढ़ियाँ इस प्रतीक्षा में ही निकल गईं। लेकिन आज अयोध्या में राममंदिर अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा है।

साथियों, राष्ट्र में सांस्कृतिक उत्कर्ष का एक नया युग शुरू हो चुका है। और यह केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी अनेक पतितपावनी नदियों का भी पुनरुद्धार किया जा रहा है। देश-व्यापी अभियान चलाकर, उनकी सफाई और संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। हमारा हर प्रयास यही बताता है, कि हम अपनी संस्कृति और परंपरा को सहेजने और सुरक्षित रखने का कार्य कर रहे हैं। हमारे ये संकल्प हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखे हुए हैं। हमारे ये प्रयास हमारे मानस को शुद्ध कर रहे है। और यही वह मार्ग है, जो हमें विश्वगुरु बनने की ओर ले जा रहा है।

इसीलिए, इस प्रकार के कार्यक्रम आवश्यक हैं। ये हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं। ये हमें हमारी संस्कृति से जोड़ते हैं। ये हमें हमारे बलिदानियों से जोड़ते हैं। और यह बात ध्यान रखनी चाहिए, कि जो राष्ट्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वह कभी नहीं गिरता। जो राष्ट्र अपने बलिदानियों को स्मरण करता है, वह सदैव आगे बढ़ता है।

मैं त्रिवेणी सेवा मिशन के संस्थापक श्री अजय भाई जी को हृदय से धन्यवाद देता हूँ, कि उन्होंने मुझे इस पवित्र अवसर पर आमंत्रित किया। यह आयोजन बिल्कुल आपके भावों की तरह ही पवित्र है। मुझे पूरा विश्वास है, कि समाज को ही प्रभु का रूप मानकर, आप इसी प्रकार भविष्य में भी सेवा में रत रहेंगे।

इसी के साथ, मैं राष्ट्र मंदिर विश्व रामायण आश्रम समेत, राष्ट्र के सभी संतों को नमन करते हुए, अपना निवेदन समाप्त करता हूँ।

धन्यवाद!