Text of RM’s speech at the book launch ceremony based on Shri Ram Bahadur Rai in New Delhi.
मित्रों, मैं आज जिस वक्त, और जिस मंच से, आपके समक्ष उपस्थित हूं, उसके पीछे दूर तक फैला हुआ पत्रकारिता का एक व्यापक संसार है, और उस पर अदम्य निष्ठा के साथ खड़ा एक पर्वत है। यह संसार है, हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस के इतिहास का, और यह अस्सी बरस का पर्वत जैसा व्यक्तित्व है ‘राम बहादुर राय’ का, इन दोनों की ओर देखते हुए मैं सम्मान और गर्व से भरा हुआ महसूस कर रहा हूं। इसलिए मैं दो सौ बरस की हिंदी पत्रकारिता, उसकी महान परंपरा और हमारे समय के अथक, बेलौस, बेलाग और निडर योद्धा पत्रकार राम बहादुर राय का अभिनंदन करता हूँ।
मित्रों, पत्रकारिता हमारे लोकतंत्र की पहरेदार है, इसे हम लोकतंत्र का ‘बैरोमीटर’ भी कह सकते हैं। पत्रकार जितना सबल होगा, लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ होगा। पहरेदार जितना जागरूक और निडर होगा, लोकतंत्र उतना ही चमकदार और मज़बूत होगा। शायद इसीलिए पत्रकारिता को संविधान का ‘चौथा खम्बा’ भी कहतें है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और ख़बर पालिका। साथियों, अपने समय और समाज की भरोसेमंद अभिव्यक्ति ही, सच्ची पत्रकारिता है। पत्रकारिता को जनता की समस्याओं और उनकी आकांक्षाओं का आइना होना चाहिए।
आप जानते हैं पत्रकारिता एक भरोसे का रिश्ता है, और ये रिश्ता एक दिन में नहीं बनता। इस भरोसे के पीछे सालों साल की कड़ी तपस्या होती है। विश्वसनीयता होती है, यह विश्वसनीयता ही पत्रकारिता की पूंजी है, और इसे बचाए रखना ही इस दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। अगर राम बहादुर राय जी, पर आज विमोचित किताब में, देशभर के सवा सौ चुनिंदा लोगों ने उनके बारे में लिखा है। और इस हॉल में इतने लोग इकट्ठा हैं, तो इसके पीछे विश्वसनीयता की वही तपस्या है। इस तपस्या की खातिर उन्होंने न कभी सत्ता की परवाह की, न सिस्टम की और न ही स्वयं के हितों की पूर्ति की।
आज लोकार्पित हुई किताब, राय साहब की बेदाग पत्रकारिता पर विस्तार से प्रकाश डालती है। मैंने भी इस किताब में छपे अपने लेख में, राय साहब के बारे में भरपूर कहा और बताया है। इसलिए मैं इस वक्त अपनी बात हिंदी पत्रकारिता, उसकी चुनौतियां, विश्वास का संकट, और इन सबके बीच राय साहब जैसे योद्धा, संन्यासी तक ही सीमित रखूंगा। जो हमारे लिए इस कठिन समय में रास्ता भी हैं, और उदाहरण भी।
मित्रों, हिंदी पत्रकारिता दो सौ बरस का सफ़र तय कर चुकी है। पर यह सफर सिर्फ हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस का इतिहास नहीं है, यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भी है। हिंदी भाषा का इतिहास भी है। हिंदी समाज के स्वाभिमान का इतिहास भी है। दो सौ बरस पहले जब भारत में हिंदी पत्रकारिता जन्म ले रही थी, उस वक्त समाज और देश कारा में थे। पूरी दुनिया बहुत तेजी से बदल रही थी। भारत गुलामी की नई नस्ल के चंगुल में अपने वजूद को पहचानने, बदलने और बनाने की कवायद कर रहा था। दो शताब्दी पहले हिंदी खड़ी बोली, हिंदी गद्य, और हिंदी पत्रकारिता, तीनों ने एक साथ चलना शुरू किया था। ऐसे में हिन्दी के पहले अख़बार ‘उदन्त मार्तण्ड’ का छपना एक युगान्तकारी घटना थी। भाषा अभी कच्ची थी, और देश तथा समाज गुलाम थे। हिंदी भाषा आकार ले रही थी, और पत्रकारिता ख़ुद नए प्रयोगों के आधार पर सीख और संवर रही थी।
ऐसे में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के जरिए हमें पत्रकारिता का मंगलाचरण मिला। पं. जुगल किशोर शुक्ल की दृष्टि और मेहनत ने हिंदी को एक नई विधा दी। यह विधा समाज में भाषा, लेखन, सूचना-संचार और लोक संवर्धन के मस्तक पर हिंदी का तिलक कर रही थी। इसने न सिर्फ एक नया रास्ता खोला, इस विधा ने आज़ादी की लड़ाई के लिए हिंदी समाज को एक नया हथियार थमा दिया था। हिंदी पत्रकारिता अब भाषा के साथ-साथ आज़ादी के हित में भी उठ खड़ी हुई थी।
और यकीन मानिए, 1947 में जब हम आज़ाद हुए तो उसमें नायकों, क्रांतिकारियों और महापुरुषों का योगदान तो है ही, हिंदी पत्रकारिता का भी महती योगदान है।
साथियों, हिंदी पत्रकारिता की इस परंपरा ने हमें ‘कविवचन सुधा’ दी, भारतेंदु जैसा उन्नायक दिया। जिन्होंने ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’ और ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’ जैसी मील की पत्थर पत्रिकाएं दी। बाबूराव विष्णु पराड़कर और महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे महान संपादक दिए। जिन्होंने सूचना, समाज और भाषा- तीनों की सेवा में अपना सारा जीवन झोंक दिया। आजादी के मतवाले गणेश शंकर विद्यार्थी के बलिदान को कौन भूला सकता है? इसी परंपरा ने देश को जगाया, लोगों तक सूचनाएं पहुंचाईं, संदेश भेजे और अपने क्रांतिकारी विचारों से लोगों को संगठित और संवर्धित भी किया। नए तरह के वाक्य। नई तरह की लेखन शैली। नए तरह के शब्द। कितना कुछ दिया है, हमें इस पत्रकारिता ने, आज़ाद भारत के नवनिर्माण में हिंदी पत्रकारिता का योगदान बेमिसाल है। आज अखबारों, पत्रिकाओं से निकलकर हिंदी पत्रकारिता रेडियो, टीवी और इंटरनेट के माध्यम से, वेबसाइटों, सोशल मीडिया तक आ पहुंची है।
इसी हिंदी और हिंदी पत्रकारिता ने हमें सिखाया है, कि कैसे ख़ुद के लिए उठ खड़ा होना ज़रूरी होता है। अंग्रेज़ी या दूसरी किसी भाषा की कृपा के सहारे हिंदी के इस अनंत समाज को न तो सिखाया जा सकता था और न जागरूक किया जा सकता था। यह हिंदी की ही क्षमता थी, और उसकी पत्रकारिता का गुण, जो आज एक पूरा समाज सीखते-समझते अपने 200 वर्षों के सफ़र के बाद दुनिया के सामने सिर उठाकर खड़ा है। इस समाज के पास कौशल है, विद्वत्ता है, दृष्टि है, विचार हैं, साहित्य है, समाज और राजनीति में दख़ल है, सामाजिक और सांस्कृतिक नवजागरण है, लोकतंत्र है, सिनेमा है और इन सबको पिरोने वाली एक भाषा है। और यह भाषा, पत्रकारिता के कंधे पर बैठकर ही चाय की दुकानों, सैलून, रेलगाड़ी के डिब्बों, स्कूलों-लाइब्रेरियों, बैठकखानों और मकानों तक लोगों को सिखाती-जगाती गई।
मित्रों, यह इंटरनेट का युग है। भाषा और गहरे तक, तेज़ी के साथ लोगों के जीवन में घुल चुकी है। सोशल मीडिया पर समाज के हर वर्ग की सक्रियता इसका जीवित प्रमाण है। लेकिन आप जानते है कि बहुत सजी हुई दुकानों के स्वाद पर भी अकसर संदेह हो जाता है। हिंदी की पत्रकारिता के सामने भी, आज उसी संदेह का संकट आ खड़ा हुआ है। जब हम हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों की यात्रा को याद कर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं, तो साथ ही इस चौथे स्तंभ में उभरती दरारें, विश्वास का संकट, उसकी गिरती साख और बिगड़ती तस्वीर हमें चिंतित भी करती है।
हमें चिंता है कि कहीं सूचनाओं के संसाधनों के इस भीड़ में हम अपने मूल से अलग तो नहीं होते जा रहे? कहीं हम उस वादे, उस नैतिकता और उस जुनून को भुला तो नहीं रहे, जो हिंदी पत्रकारिता के चितेरों का मंत्र बनकर समाज में प्राण फूंकते रहे? हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत देश के नवजागरण का उदघोष थी। हिंदी पत्रकारिता शिक्षा, साक्षरता के साथ-साथ समाज को मानवता, बराबरी, ईमानदारी, लोकतंत्र, अधिकारों और कर्तव्यों का पाठ पढ़ा रही थी। इस पत्रकारिता ने सिर्फ भाषा ही नहीं गढ़ी, एक ऐसा समाज गढ़ा, जो आधुनिक था, व्यवहारिक था, सरल था, सहज था, समावेशी था और साथ-साथ लोकतांत्रिक भी था। सच की स्याही कागज़ पर उतरकर निष्ठा, समर्पण और न्यायप्रियता का बीज लोगों में रोप रही थी। आज के माहौल को देखकर मुझे कभी-कभी संदेह होता है, कि कहीं ये मूल्य, ये आदर्श, ये कमिटमेंट हम भूल तो नहीं रहे? पत्रकारिता अपने शुरुआती मूल्यों से दूर तो नहीं जा रही है।
जब भी यह संदेह मुझे विचलित करने की कोशिश करता है, मेरे सामने आ जाता है, अस्सी बरस का एक विशाल व्यक्तित्व, जिसने सन्यासी की तरह पत्रकारिता के व्रत को निभाया है। जिसने समाज के उदाहरणों से सीखा भी, और ख़ुद को भी एक उदाहरण बना दिया। जिसने पत्रकारिता की चादर को कबीर की तरह निभाया है। जिसने कहने के कौशल को तुलसी की तरह बरता।
जिसने सच्चाई और समाचार को हरिश्चंद्र की तरह थामे रखा। जिसकी नज़र अर्जुन की तरह ख़बर पर रही, और किसी भी तरह की सजावट या प्रभाव उसे डिगा नहीं सके। जिसके लिए पत्रकारिता कभी भी पेशा नहीं रही, वह एक मिशन थी, मिशन है, और मिशन ही रहेगी। ऐसे हमारे प्रिय राम बहादुर राय जी के पत्रकारिता के प्रति उनके योगदान और समर्पण को जब भी मैं देखता हूं तो संदेह के सारे बादल छँट जाते हैं, और सामने उनके व्यक्तित्व का विशाल पर्वत खड़ा दिखाई पड़ता है। मेरा सिर सम्मान से झुक जाता है। मैं फिर से उन्हें प्रणाम करता हूं।
साथियों, आज जब हम राय साहेब की ज़िंदगी के अस्सी वर्ष उनकी गरिमामयी उपस्थिति में मनाने के लिए एकत्र हुए हैं, तो हमारे पास बादलों सी चुनौतियां हैं, लेकिन उन चुनौतियों का सीना चीरकर अडिग खड़े राय साहेब, जैसे महान पत्रकार भी दिखाई देते हैं। उनके जीवन के ये आठ दशक एक पाठ की तरह हैं। जिसका हर पन्ना हमें सिखाता है, कि पत्रकार होना किस तरह का जीवन-व्रत है। इसे निभाना कितना चुनौतीपूर्ण है, और इस पर चलते जाना समाज और देश के लिए कितना ज़रूरी।
इन अस्सी बरसों में राय साहब ने निष्पक्षता, निडरता, सटीकता और स्वतंत्रता के बुनियादी मूल्यों का पालन किया है। राम बहादुर राय शब्दों के साधक हैं। विचारों के यात्री हैं। साथ ही खोज में निरंतर प्रवाहित होने वाली चेतना हैं। उनका जीवन, संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और नैतिक साहस की ऐसी कथा है, जो स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक यात्रा के साथ-साथ चलती है। साथियों, उनके लिए पत्रकारिता पेशा नहीं, लोकसेवा का जरिया है। समाचार केवल सूचना नहीं, समाज की चेतना का दस्तावेज है।
राय साहब से मेरे गहरे और आत्मिक संबंध रहे हैं। वे जीवन के शुरुआती दिनों में मेरे मार्गदर्शक रहे हैं। मैं जिस दौर में विद्यार्थी परिषद में काम कर रहा था। उस वक्त राम बहादुर राय छात्र राजनीति की मशाल उठाए हुए थे। राजनीति में, मैं उन्हें अपना अग्रज मानता हूं। 1977 के बाद हमारे उनके रास्ते अलग-अलग हो गए, पर लक्ष्य एक ही था – ‘व्यवस्था परिवर्तन’। मैं समाज से जुड़ने के लिए, चुनावी राजनीति की तरफ बढ़ा और राय साहब ने समाज से जुड़ने का दूसरा रास्ता चुना ‘पत्रकारिता’। उनकी सबसे बड़ी ताकत है कि वह संवाद को महत्व देते हैं। असहमति को सम्मान देते हैं और विचारों की विविधता को लोकतंत्र की ताकत मानते हैं। यही गुण उन्हें पत्रकार से आगे समाज का मार्गदर्शक बनाता है।
अक्सर लोग यह कहते हुए मिल जाएंगे कि फलां तरह की पत्रकारिता कितनी उचित है? या पत्रकारिता का फलां तरीका ठीक नहीं है? या फलां पत्रकार ऐसी बात कह रहा है? इन सबके मूल में एक ही सवाल है, कि पत्रकारिता क्या है? मित्रों, मैं समझता हूं। पत्रकारिता का मतलब है समाज के लिए, भाषा और कलम के दम पर खड़े रहते हुए आमजन और लोकतंत्र के प्रति ज़िम्मेदार बने रहना, उत्तरदायी बने रहना और इस काम में मनुष्यता, देशहित और नैतिकता से कोई समझौता नहीं करना, आप जो कहें, जो लिखें, जो बोलें, जो दिखाएं, उसके प्रति ईमानदार रहें। इस बात का ध्यान रहे कि आपके लिखे का लोगों की धारणा और विचार पर क्या असर पड़ेगा। समाज उसे गंभीरता से लेगा। लोग उससे अपनी राय बनाएंगे और सरकारें उसकी ओर ध्यान देंगी। देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सामाजिक ढांचा उससे सुरक्षित महसूस करेंगे। इस जिम्मेदारी के प्रति सचेत रहना होगा।
साथियों, ज्यादातर लोग आज पेशे के तौर पर पत्रकारिता को देखते हैं। उनके लिए पत्रकारिता जीविका का साधन है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पेशा मानें या मिशन, कलम का ईमानदार होना ही सबसे ज़रूरी और पहली शर्त है। यह राम बहादुर राय से सीखना चाहिए, जब वे पत्रकारिता में आए, तो उनके पास संसद में जाने का भी विकल्प था। राजनीति की अगली कतार में शामिल होने का विकल्प भी था।
किसी सरकारी नौकरी में जाने का या शिक्षक बन जाने का विकल्प भी रहा होगा, पर पत्रकारिता की पाठशाला में क,ख,ग से शुरुआत करने का फैसला कर उन्होंने कठिन संघर्ष भी देखा और कंपटीशन भी, लेकिन वो बिना विचलित हुए ‘अ’ से ‘ज्ञ’ तक आए हैं। एक सचेत न्यायाधीश की तरह न तो उन्होंने अपने दोस्तों या परिचितों को अपने लेखन में छूट दी और न ही अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ कलम को एजेंडा बनाया।
साथियों, उनकी कलम अपनी विचारधारा के लोगों के ख़िलाफ़ भी चली और ईमानदार विरोधियों को भी साहस देती रही। बालेश्वर अग्रवाल, प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गजों से उन्होंने जो कुछ सीखा, उसे वो वचन की तरह निभाते हुए आगे बढ़े, और तब तक चलते रहे, जब तक वो स्वयं एक प्रतिमान नहीं बन गए। आज हम जिस पुस्तक के विमोचन और चर्चा के लिए एकत्र हुए हैं, वो राय साहेब की पत्रकारिता और जीवन के आठ दशकों के ऐसे ही तमाम पहलुओं और सच्चाइयों से हमें अवगत कराती है। इस किताब की कल्पना और संपादन के लिए, मैं हेमंत जी को बधाई देता हूं। मैं समझता हूं कि पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े हर व्यक्ति को, हर छात्र को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। मैं आग्रह करूंगा प्रभात प्रकाशन से कि इसका पेपरबैक संस्करण भी लाएं, ताकि विद्यार्थी भी इसे कम क़ीमत में ख़रीद सकें और प्रेरणा पा सकें।
पत्रकारिता और पत्रकारों के मन में जो संदेह आज गहरे हो रहे हैं, और हम जिस तरह की चुनौतियों को देख पा रहे हैं, उनका समाधान इस किताब में निहित है। ये किताब आपके लिए संजीवनी है। प्रेरणापुंज है, इसे पढ़ना ही आपको उस ऊर्जा और स्पष्टता से भर देगा, जो आज की पत्रकारिता और पत्रकारों के लिए ज़रूरी होती जा रही है।
आप सभी को इस पुस्तक के विमोचन की बहुत-बहुत बधाई। बधाई प्रभात प्रकाशन को, इसे लोगों तक पहुंचाने के लिए, बधाई इस पुस्तक के संपादक और लेखकों को, जिन्होंने अपने अनुभवों, विचारों और संस्मरणों से इसे सजाया है, और पुनः राय साहब का अभिनंदन है, जिन्होंने पत्रकारिता का जीवन इतनी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ निभाया है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।
बहुत बहुत धन्यवाद।