Text of RM’s speech at the ‘Khatik Samaj Garjana Sammelan’ in Agra.
देवियो और सज्जनो,
मैं लगभग तीन महीने पहले ही आगरा की धरती पर आया था और महाराणा प्रताप जी की प्रतिमा का अनावरण किया था। आज एक बार फिर, आगरा में आप सभी के बीच ‘खटीक गर्जना सम्मेलन’ में आकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।
सबसे पहले मैं, संत श्री दुर्बलनाथ जी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और उनकी पावन स्मृति को नमन करता हूँ। इस वर्ष उनका 165 वां अवतरण दिवस भी है।
इसलिए, जब मुझे इस कार्यक्रम का आमंत्रण मिला, तो मैंने बिना एक सेकंड का टाइम लिए, सोच लिया कि, मैं इस कार्यक्रम में जरूर जाऊंगा।
लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजकों से, मेरी एक शिकायत भी है।
मुझे यहाँ आमंत्रित करने के लिए जो पत्र दिया गया था, उसमें इस कार्यक्रम का विवरण देते हुए लिखा गया था ‘खटिक समाज के संत शिरोमणि श्री दुर्बलनाथ जी के चित्र पर दीप प्रज्वलन’।
दुर्बलनाथ जी केवल खटिक समाज के ही संत नहीं हैं। वे पूरे हिन्दू और सनातन समाज के पूज्य संत हैं। उन्हें सिर्फ एक समाज तक सीमित मत कीजिए। वे और उनके द्वारा दिए गए संदेश पूरे भारतीय समाज के लिए आदर्श हैं।
साथियो,
खटीक समाज की पहचान केवल किसी एक पेशे या किसी एक भूमिका तक सीमित नहीं रही है। खटीक समाज वैदिक काल से ही धर्म से जुड़े महत्वपूर्ण काम करता आ रहा है। यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों को कराने में इस समाज की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
खटीक समाज के लोग धर्म के लिए समर्पित भी रहे हैं और उसकी रक्षा के लिए हमेशा तत्पर भी रहे हैं। भारत में कई बार बाहर से हमला हुआ है। हमारी संस्कृति और सभ्यता को मिटाने की कई बार नाकाम कोशिशें की गई हैं। लेकिन खटीक समाज के वीरों ने भारत की सनातन और शाश्वत सभ्यता की रक्षा की है।
खटीक समाज धर्म और कर्म के साथ-साथ आर्थिक कार्यों में भी महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। हम सभी जानते हैं कि खटीक समाज के बहुत से लोग फलों और सब्जियों का व्यवसाय करते हैं। यानी यह कहा जा सकता है कि खटीक समाज, समय की जरूरत के हिसाब से सार्थक भूमिका निभाने वाला समाज है।
इससे एक बात और साफ हो जाती है कि सनातन और हिन्दू धर्म को केवल जाति के चश्मे से देखने वाले लोग, उसके मूल भाव को नहीं समझ पाते हैं। हमारी कर्म-आधारित व्यवस्था है। इसमें एक ही व्यक्ति के कई कर्तव्य हो सकते हैं। और कई लोगों का एक ही कर्तव्य भी हो सकता है। लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है। और वह है धर्म और राष्ट्र की रक्षा करना।
साथियो,
खटीक समाज के गौरवशाली इतिहास के साथ कभी न्याय नहीं किया गया। इतिहासकारों ने या तो खटीक समाज के बारे में लिखा ही नहीं। और अगर लिखा भी तो इस समाज के योगदान को सही तरीके से सामने नहीं रखा। उसे सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया।
आप सोचिए, प्राचीन समय में खटीक समाज के लोगों की पहचान खड्ग चलाने वाले वीरों के रूप में होती थी। जब-जब भारत और सनातन धर्म पर संकट आया, तब तब ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे के साथ, खटीक समाज के वीर रणभूमि में उतरे। जब-जब हमारे मंदिरों पर हमले हुए, तब-तब इस समाज के लोगों ने अपने खड्ग से दुश्मन को खंड-खंड करने का काम किया है।
देवियो और सज्जनो,
प्राचीन भारत में राजाओं की चतुरंगिणी सेना होती थी। यानी सेना के चार अंग होते थे- गज सेना यानी हाथियों की सेना, घुड़सेना, रथसवार, और पैदल सेना। और सेना का ऐसा कोई अंग नहीं होता था, जिसमें खटिक जाति के सैनिक न हों। और तो और, ऐसा भी कहा जाता है कि खटिक सैनिकों की बहादुरी के कारण उन्हें सेना में सबसे आगे रखा जाता था।
कुछ विद्वान मानते हैं कि खटिक जाति की पहचान प्राचीन काल में ‘कठ जाति’ के रूप में होती थी। खटीक समाज को ‘कठिक’ भी कहा जाता रहा है। दुनिया जीतने का सपना लेकर निकले सिकंदर और उसके सैनिकों को कठिकों ने ही भारत से उल्टे पाँव भागने पर मजबूर किया था।
भारत पर जब मुहम्मद गौरी के भानजे सैमद सलार मसूद गाजी और उसकी डेढ़ लाख की सेना ने आक्रमण किया था, तब महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में पासी और खटिकों ने मिलकर ही उनको धूल चटाई थी।
जब औरंगजेब के शासन में लोगों पर बहुत अत्याचार किया जा रहा था, जबरन धर्म परिवर्तन कराने की कोशिशें की जा रही थीं, तब भी खटीक समाज के लोगों ने यातनाएं सहीं, लेकिन अपना धर्म नहीं छोड़ा।
1857 में, जब मेरठ में स्वतंत्रता की पहली लड़ाई लड़ी गई तब खटिक समाज के लोगों ने बहुत वीरता से अंग्रेजों का मुकाबला किया था। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में खटीकों का बहुत उत्पीड़न किया। लेकिन खटीकों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व दिया।
1946 में जब Direct Action Day की घोषणा की गई और बंगाल में हिंदुओं का निशाना बनाना शुरू किया गया, तब गोपाल पाठा के नेतृत्व में खटिक जाति के बहुत से लोगों ने मोर्चा संभाला था और हिंदुओं की रक्षा करने का काम किया था।
आजादी के बाद भी खटीक समाज सदैव देशसेवा और धर्म के कार्यों में सबसे आगे रहा है।
साथियों, हमें कई सौं वर्षों तक अयोध्या जी में भगवान राम के मंदिर के लिए इंतज़ार करना पड़ा। इसके लिए भारतीयों को बहुत संघर्ष करना पड़ा। अपने ही देश में, आंदोलन करना पड़ा। इस आंदोलन में समाज के हर वर्ग ने अपनी भूमिका निभाई। खटीक समाज के लोगों ने भी राम मंदिर आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था।
यानी समय चाहे कोई भी रहा हो, चुनौती कैसी भी रही हो और शत्रु कितना भी शक्तिशाली रहा हो; खटीक समाज ने धर्म और देश के स्वाभिमान की रक्षा से कभी पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
ऐसा भी कहा जा सकता है कि खटीक वो है, जो खौफ को भी डरा दे। खटीक वो है जो खतरे में सबसे आगे खड़ा रहे। खटीक वो है जो खुद कठिनाई सहकर भी दूसरों की रक्षा करे।
साथियो,
उत्तर भारत में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में खटीक समाज ने त्याग और पराक्रम की मिसाल कायम की है। जैसे मैं आपको दक्षिण भारत से एक उदाहरण देता हूँ।
दक्षिण भारत में एक संत हुए है जिनका नाम है कन्नप्पा नयनार। संत कन्नप्पा को महान शिवभक्तों में गिना जाता है। एक कथा के अनुसार उन्होंने भगवान शिव को अपनी आँख निकालकर अर्पित कर दी थी। कुछ परंपराएँ कन्नप्पा को खटीक समुदाय से जोड़ती हैं।
यह प्रसंग दो बातें बताता है। एक तो यह कि खटीक समाज पूरे भारत में भक्ति, बलिदान और समर्पण के लिए जाना जाता रहा है। और दूसरा यह कि सनातन धर्म उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक पूरे भारत को एक सूत्र में जोड़ता है। यानी सनातन और हिन्दू धर्म भारत की एकता और अखंडता का भी एक आधार है।
साथियो,
खटीक समाज, आपदा और विपदा में, सहायता करने में सबसे आगे रहा है। आजादी के समय पाकिस्तान से लाखों परिवार अपना घर-बार छोड़कर भारत आए थे। 1961 का Census Volume 1 पढ़ने पर पता चलता है कि तब खटीक समाज ने बहुत सेवा कार्य किए थे। और शरणार्थियों की मदद का काम किया था।
मैं, आपको लखनऊ का एक उदाहरण देता हूँ। वहाँ खटीक पंचायत ने एक Welfare Fund की शुरुआत की थी। इसका नाम था ‘धर्मखाता’। बताया जाता है कि इस Fund में हर दिन करीब 100 से 500 रुपये तक जमा होते थे। यह पैसा शरणार्थी शिविरों में खाने की व्यवस्था करने में लगाया जाता था।
साथियो,
खटीक शब्द सिर्फ वीरता और सेवा का ही पर्याय नहीं हैं, ज्ञान की धारा भी इस समाज से प्रवहित होती रही है। अब कुछ लोग पूछेंगे कि कैसे?
आप सभी ने नचिकेता और यम की कहानी सुनी होगी। यह कहानी जिस उपनिषद में है उसका नाम है- कठोपनिषद। एक विद्वान ने कहा है कि इस उपनिषद को शब्द रूप में लाने में ‘कठ’ नामक ऋषि का योगदान था। यानी इससे पता चलता है कि वैदिक काल में वर्तमान खटिक जाति के लोग तत्त्व ज्ञानी थे और धर्म पुरोधा थे।
मैं आपको एक और उदाहरण देता हूँ। आप सभी ने ‘व्याध-गीता’ के बारे में सुना होगा। महाभारत में ‘व्याध-गीता’ का महत्व उतना ही है, जितना श्रीमद्भगवद्गीता का। ‘व्याध-गीता’ में एक धर्मव्याध (मांस का व्यापार करने वाला व्यक्ति), एक उच्च कुल के व्यक्ति को धर्म, कर्म और सत्य का उपदेश देते हैं। ऐसा माना जाता है कि धर्मव्याध, खटिकों के पूर्वज थे।
साथियो,
मैंने बहुत समय पहले मुंशी प्रेमचंद जी का उपन्यास ‘गबन’ पढ़ा था। उसमें एक पात्र है—देवीदीन खटीक। देवीदीन के दोनों बेटे स्वदेशी आंदोलन में देश के लिए शहीद हो जाते हैं। देवीदीन खटीक अपने जवान बेटों की मौत पर रोता नहीं है। बल्कि गर्व करता है। आपको पता है देवीदीन अपने बेटों की मौत पर क्या कहता है? वह कहता है कि जिस देश में रहते हैं, जिसका अन्न-जल खाते हैं, उसके लिए इतना भी न कर सकें तो जीवन पर धिक्कार है।
साथियों, यह सिर्फ एक कहानी या उपन्यास नहीं है। यह स्वतंत्रता से पहले के समाज की झलक भी दिखाती है। यह कहानी हमें बताती है कि खटीक समाज, देश के लिए क्या भाव रखता है? इतिहासकारों ने भले ही न लिखा हो, लेकिन मुंशी प्रेमचंद जी ने इस कहानी से बता दिया कि देश की आजादी की लड़ाई में खटीक समाज के लोगों का बहुत बड़ा योगदान था।
साथियों,
देश में खटीक समाज के बहुत से परिवार, पीढ़ियों से वराह पालन का काम करते आए हैं। सनातन परंपरा में तो भगवान विष्णु के ‘वराह अवतार’ का विशेष महत्व है। जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को संकट में डाल दिया, तब भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण करके पृथ्वी की रक्षा की।
यानी जिस पशु को समाज अक्सर हीन नजर से देखता है, उसी वराह रूप में भगवान विष्णु ने अवतार लिया। इससे यह भी संदेश मिलता है कि हम प्रकृति और ईश्वर के बनाए हर जीव को सम्मान दें। हमें यह समझना चाहिए कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता है और कोई जीव तुच्छ नहीं होता।
साथियो,
खटीक समाज ने पीढ़ियों से समाज की जरूरतें पूरी की हैं। लेकिन अब समय है कि मेहनत की इस परंपरा को शिक्षा और सशक्तिकरण से और जोड़ा जाए। जो काम पिछली पीढ़ी ने किया, उसका सम्मान करते हुए, अगली पीढ़ी के लिए नए रास्ते खोले जाएँ।
आज, बाबासाहेब अंबेडकर के मंत्र ‘शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित हो’ को याद करने की जरूरत है। डॉ. आंबेडकर ने दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने संघर्ष का मार्ग चुना। लेकिन उनके लिए संघर्ष करने का मतलब सड़क पर उतरकर हिंसा करना और अराजकता फैलाना नहीं था। उनके लिए संघर्ष का मतलब था अन्याय को देखकर भीतर से बेचैन होना और बाकी लोगों को भी जागरूक करना। इसके बाद संवैधानिक तरीके से बदलाव लाने का काम करना।
मैं आप सभी से आग्रह करूंगा कि अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दीजिए। क्योंकि सामाजिक उत्थान के लिए शिक्षा सबसे पहली शर्त है। जब शिक्षा आएगी तो आर्थिक सशक्तिकरण होगा और सामाजिक स्थिति भी सुधरेगी। इससे आप अपने फैसले खुद लेने में और सक्षम हो पाएंगे और अपना भविष्य भी खुद तय कर पाएंगे।
साथियो,
आज देशभर में हमारी सरकार, विकास की मुख्यधारा में पीछे रह गए लोगों को, समान अवसर देने के लिए काम कर रही है। जैसे बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति दी जा रही है। उच्च शिक्षा और विदेश में पढ़ाई के लिए भी आर्थिक मदद की जा रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, लाल किले से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने सभी गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग शुरू करने की घोषणा की है।
इसके साथ ही युवाओं को रोजगार से जोड़ने का काम हो रहा है। और जो युवा अपना कारोबार शुरू करना चाहते हैं, उन्हें भी आगे बढ़ने के लिए हर संभव मदद मिल रही है।
यानी हमारी कोशिश यह है कि पैसों के अभाव किसी भी बच्चे की पढ़ाई न रुके। अवसर के अभाव के कारण, कोई युवा पीछे न रहे। और हर व्यक्ति शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्भरता के रास्ते पर आगे बढ़े।
साथियो,
आज प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में हमारी सरकार अंत्योदय और सर्वोदय के भावना के साथ काम कर रही है। सर्वोदय यानी समाज में सभी लोगों का उत्थान होना चाहिए। और ‘अंतोदय’ यानि समाज की अंतिम सीढ़ी पर जो व्यक्ति है, उसका उदय होना चाहिए। अगर एक Line में कहना हो तो “सबका साथ, सबका विकास” ।
आज उत्तर प्रदेश भी, डबल इंजिन की सरकार के साथ, तेजी से विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। आप याद कीजिए, एक समय था जब उत्तर प्रदेश में माफिया राज चलता था। ऊबड़-खाबड़ सड़कें होती थीं। असुरक्षा का माहौल था। लोग भय में जी रहे थे। हर दिन दंगे होते थे।
लेकिन आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने यह तस्वीर बदल दी है। उत्तर प्रदेश आज विकास के लिए जाना जा रहा है। विश्वस्तरीय Infrastructure के लिए जाना जा रहा है। जो प्रदेश कभी अपराधियों के लिए सुर्खियों में रहता था, आज औद्योगिक कॉरिडोर बना रहा है। मेट्रो रेल का Network फैला रहा है। और अब तो आगरा मेट्रो के विस्तार का काम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
अब, उत्तर प्रदेश ‘One District, Many Mafia’ की पहचान को पीछे छोड़ चुका है। और ‘One District, One Dish’ और ‘One District, One Product’ जैसी पहलों के लिए जाना जा रहा है। यानी आज हाथरस की हींग, फ़िरोजाबाद में बनी काँच की मूर्तियाँ, मथुरा का पेड़ा, अलीगढ़ के ताले; दुनिया भर में जाने जा रहे हैं।
और आगरा के पेठे को कौन भूल सकता है? आगरा का पेठा अपनी मिठास के लिए मशहूर है। ‘One District, One Product’ योजना के तहत आगरा के पेठे को पूरी दुनिया में पहचान मिली है और विदेशों में भी लोग इसके स्वाद का लुत्फ उठा रहे हैं ।
साथियो,
हमारे संविधान के पहले पेज पर, यानि प्रस्तावना में एक शब्द है- Fraternity या बंधुत्व। इसका मतलब है एक-दूसरे के साथ भाईचारे से रहना, मित्रवत व्यवहार करना, और सम्मान की भावना रखना।
जब समाज में यह भावना मजबूत होती है, तब यह भाव भी बढ़ता है कि हम सभी भारतीय एक परिवार हैं। तब ही लोकतंत्र भी मजबूत होता है। और हमने तो “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया है। यानी हमने तो पूरी दुनिया को ही अपना परिवार माना है।
आप खुद सोचिए, जब हमारी सोच पूरे विश्व को परिवार मानने की रही है, तो अपने ही समाज और अपने ही देश के लोगों के बीच क्या कोई दीवार हो सकती है? बिल्कुल नहीं हो सकती है।
लेकिन फिर भी कुछ लोग, अपने राजनैतिक हित साधने के लिए, लोगों को भड़काने की कोशिश करते हैं। कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, कभी हिन्दू ग्रंथों और परंपराओं को गलत तरीके से पेश करके; हमारे समाज में दरार पैदा करने की कोशिश करते हैं।
लेकिन, हमें यह संकल्प लेना है कि हम किसी के भड़कावे में नहीं आएंगे। किसी के बहकावे में नहीं आएंगे। समाज को बंटने नहीं देंगे। समाज में प्रेम हो, सहयोग हो, एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े होने की भावना हो; इसके लिए हम सभी मिलकर प्रयास करेंगे।
याद रखिए टूटने से बिखरेंगे, जुड़ने से निखरेंगे।
जब समाज में समरसता बढ़ेगी, तब ही शांति बढ़ेगी। जब समाज में शांति बढ़ेगी, तब ही समृद्धि बढ़ेगी। जब समृद्धि बढ़ेगी, तब ही विकास और प्रगति के कार्य और तेज गति से आगे बढ़ेंगे। और हमारा देश विकसित देश बनेगा।