Text of RM’s speech at the ‘Bhumi Pujan Samaroh’ for Garden Reach Shipbuilders & Engineers Ltd and Yantra India Ltd facilities in Kolkata.
बंगाल की धरती पर आज, defence के पाँच महत्त्वपूर्ण Projects का भूमिपूजन और शिलान्यास हो रहा है। इस अवसर पर सबसे पहले, मैं आप सभी को बधाई देता हूँ।
बंगाल की हवा में अब एक नई ख़ुशबू है।
यह महक केवल बदलाव की नहीं, बल्कि विकास, निवेश और नए अवसरों की है।
ये Projects इस बात का प्रमाण हैं, कि जब नीयत स्पष्ट हो, नीति सही हो और निवेश का भरोसा हो, तो विकास की गति को कोई रोक नहीं सकता।
आज का दिन इसलिए भी विशेष है, क्योंकि जहाँ कभी उद्योगों के बंद होने की खबरें आती थीं, वहाँ आज नए उद्योगों के विस्तार की खबरें आ रही हैं। यही बदलते बंगाल, और बदलते भारत की तस्वीर है। शुभेंदु जी के आने के बाद बंगाल में सब शुभ-शुभ ही हो रहा है, इसके लिए आप बधाई के अधिकारी हैं।
Health हो, education हो, Agriculture हो, Industry हो, साथ ही कानून व्यवस्था, महिलाएँ, बच्चे, युवा और बुज़ुर्ग, यानि सभी वर्गों के लोग, अब एक नए confidence के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इस confidence की बुनियाद, national security में निहित होती है, और इस national security को भी ensure करने में शुभेंदु सरकार ने अपनी बड़ी भूमिका निभाई है। महज़ 45 दिनों के भीतर-भीतर, अपने कहे अनुसार यहाँ की सरकार ने, Border Security के लिए 1100 एकड़ की भूमि उपलब्ध कराई है। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। इसके लिए यहाँ की डबल इंजिन सरकार बधाई की पात्र है।
साथियों, बंगाल ने देश को नए-नए विचार दिए हैं, आंदोलन दिए हैं, प्रतिभाएँ दी हैं, वन्दे मातरम जैसा राष्ट्र-मंत्र दिया है। अब समय है, कि बंगाल भारत की विकास यात्रा को नई ऊर्जा और नई गति दे। और मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ, कि बंगाल की धरती पर हो रहा यह निवेश, केवल आज का निवेश नहीं है; यह आने वाले कल के भारत का निवेश है।
बंगाल में, और खासकर कोलकाता में मेरा अक्सर आना होता है। पर इस बार का आना मेरे लिए बड़ा ख़ास है, क्योंकि आज एक साथ पाँच-पाँच projects की एक साथ नींव रखी जा रही है।
आज का यह दिन केवल GRSE, GRSE नहीं बल्कि अब तो ‘नवरत्न GRSE’,… यंत्र इंडिया लिमिटेड या बंगाल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए बड़ा ही महत्वपूर्ण है। यह भूमि पूजन और शिलान्यास समारोह, हमें हमारे विकसित भारत के संकल्प की ओर, ठोस कदम बढ़ाने की प्रेरणा दे रहा है।
साथियों, आज हम, लगभग साढ़े तीन हजार करोड़ रूपयों की लागत वाली पांच अत्यंत महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं का भूमि पूजन और शिलान्यास कर रहे हैं। इनमें GRSE की तीन नई ship building facilities – रायचक शिपयार्ड, टिम्बर पोंड हावड़ा ship building facility, और दामोदर complex ship building facility शामिल हैं। इसके साथ ही यंत्र इंडिया लिमिटेड की दो अत्याधुनिक metallurgical facilities, 3,000 टन क्षमता वाली हाइड्रोलिक ओपन डाई फोर्जिंग प्रेस और रेडियल फोर्जिंग प्लांट, का भी शिलान्यास हो रहा है। ये पांचों projects हमारी आत्मनिर्भरता, Make in India और Make for the World की भावना को बल देने वाली हैं।
साथियों, बंगाल की धरती, हमेशा से भारत के renaissance, hard work और nationalism की मधुर भाव की साक्षी रही है। यह धरती किसी जमाने में industrial revolution का केंद्र थी। और आज फिर एक बार यह धरती नए industrial रेनेसां की ओर बढ़ रही है। GRSE और यंत्र इंडिया लिमिटेड जैसे संस्थान, इस बात के प्रमाण हैं, कि बंगाल का industrial base फिर से मजबूत हो रहा है। यहां से शुरू होने वाले ये projects, Defence production को तो बढ़ाएंगे ही, साथ ही साथ MSMEs, allied industries और हजारों लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा करेंगे। एक तरह से देखें, तो ये projects, बंगाल की socio-economic progress के, नए chapter के रूप में सामने आने वाले हैं।
अभी कुछ दिनों पहले स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर, लाल किले की प्राचीर से, हमारे प्रधानमंत्री जी ने सप्तधारा की बात की थी। उन सप्तधारा में से एक प्रमुख धारा, रक्षा क्षेत्र के लिए उन्होंने कहा था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जब हम विकसित भारत बनेंगे, तब हमारा रक्षा क्षेत्र पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए। हम इस क्षेत्र में किसी भी देश पर निर्भर नहीं रह सकते। हमारी अपनी स्वदेशी कंपनियों और research Institutes को ही इस क्षेत्र में पूरी तरह dominance हासिल करना होगा। और आज के ये पांचों projects उसी strategic autonomy को reflect कर रहे हैं।
GRSE से मेरा एक गहरा जुड़ाव रहा है। पिछले कुछ वर्षों में, मुझे कई बार आपके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत करने का अवसर मिला है। और आप लोगों से मिलकर मैंने यह देखा है, कि आपका शिपयार्ड किसी भी चुनौती को स्वीकार करने, और देश को आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प के साथ, हमेशा तैयार दिखता है।
इसी शिपयार्ड में advanced guided missile frigate INS दूनागिरी भी निर्मित हुई है। जिसे इसी वर्ष माननीय प्रधानमंत्री जी ने, राष्ट्र को समर्पित किया। GRSE ने अब तक 800 से अधिक vessels बनाए हैं। और सबसे बड़ी बात यह है, कि आप आत्मनिर्भरता के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। यहां तक कि जो next generation offshore patrol vessels बन रहे हैं, उनमें भी 80 प्रतिशत से अधिक indigenous content होगा। यह दिखाता है, कि हम विदेशी dependence को तेजी से कम कर रहे हैं। मैं इस अवसर पर, GRSE को Navratna status मिलने पर भी, हार्दिक बधाई देता हूं।
साथियों, यंत्र इंडिया लिमिटेड, यानी YIL भी उतने ही गर्व से हमारी defence manufacturing capability का pillar बनकर खड़ा है। आज ईशापोर स्थित metal and steel factory में दो नई modern facilities का शिलान्यास हो रहा है। इनसे advanced weapons and strategic components की critical supply chain पूरी तरह secure होगी।
अक्टूबर 2021 में existence में आने के बावजूद, इतने कम समय में ही, इस कंपनी ने शुरुआती चुनौतियों को पार करते हुए, लगातार financial और regulatory excellence हासिल किया है। Traditional गोला-बारूद से आगे बढ़ते हुए, YIL research and development पर भी investment कर रहा है।
साथियों, YIL ने MSF ईशापोर में 750 करोड़ रुपये से अधिक का investment किया है। ये investment, 1976 से चली आ रही पुरानी प्रणालियों को बदलकर, Industry 4.0-capable precision manufacturing स्थापित करेगा। इससे हम और भी तेज गति से स्वदेशी हथियारों के निर्माण की ओर बढ़ेंगे।
साथियों, स्वदेशी हथियार हमारे लिए कितने जरूरी हैं, इसका example हमें Operation Sindoor के दौरान दिखा। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया ने भारत की स्वदेशी हथियार प्रणालियों की क्षमता देखी। और आगे भी, रक्षा मंत्रालय के साथ, हमारे labs, हमारे PSUs, और private stakeholders मिलकर, अपनी सेनाओं को स्वदेशी platforms से लैस करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। हमने यह साबित किया है कि आत्मनिर्भरता केवल एक policy नहीं है। आत्मनिर्भरता, battlefield capability का multiplier है। और इस पहल में GRSE, तथा यंत्र इंडिया लिमिटेड की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाली है।
साथियों, आज जब मैं आप सभी के बीच, इतने महत्त्वपूर्ण अवसर पर उपस्थित हूँ, तो मैं अपने कुछ विचार जरूर साझा करना चाहूँगा।
वह यह, कि आज जब हम एक सकारात्मक सोच के साथ, आत्मनिर्भरता के रास्ते पर बढ़ रहे हैं, तो मुझे लगता है, हमें shipbuilding sector में, Capacity Paradox को भी ध्यान में रखना होगा। Capacity paradox का विचार shipbuilding की दुनिया में चल रहे, एक बड़े बदलाव को समझने में मदद करता है।
जैसे आप देखिए, कि दुनिया भर में जहाजों की मांग लगातार बढ़ रही है। चाहे naval ships हों, commercial cargo vessels हों, oil tankers हों, logistics ships हों, fishing vessels हों, pollution control vessels हों या offshore platforms हों, हर category में demand बढ़ रही है। समुद्री व्यापार बढ़ रहा है, नौसैनिक शक्ति का विस्तार हो रहा है, और समुद्री सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। यानी demand side पर कोई कमी नहीं है।
दूसरी तरफ, जो UK, USA, नीदरलैंड और फ्रांस जैसे traditional जहाज निर्माता देश रहे हैं, इन्होंने Colonial era में ship-building के बल पर ही, अपनी colonies स्थापित की थीं। लेकिन पिछले कुछ दशकों में, ये देश अपनी shipbuilding capacity को धीरे-धीरे कम कर रहे हैं। कम कर रहे हैं या कम हो रहा है, यह दूसरा विषय है, पर इतना जरूर है कि इनकी shipbuilding capacity धीरे-धीरे कम हो रही है। इसके पीछे कई कारण हैं। जैसे labour cost बढ़ना, युवा पीढ़ी का इस क्षेत्र में न आना, नई frontier technologies पर ध्यान केंद्रित करना, और पुरानी shipyards का आधुनिकीकरण न हो पाना। इसका नतीजा यह निकला है, कि global shipbuilding capacity में एक gap पैदा हो रहा है।
तीसरी और सबसे interesting बात यह है, कि जहाज निर्माण में technology इतनी तेजी से बदल रही है, कि जब तक एक जहाज का design और development पूरा होता है, तब तक कई technologies outdated हो चुकी होती हैं। एक छोटे जहाज को भी डिजाइन से लेकर delivery तक आने में 5 से 10 साल लग जाते हैं। बड़े युद्धपोतों या advanced commercial vessels के मामले में तो 15 से 20 साल तक लग सकते हैं। इस बीच propulsion systems, sensors, weapons, automation, green fuel technology, सब कुछ काफी बदल जाता है। मतलब यह कि जहाज बनने से पहले ही, उसकी कुछ technologies पुरानी हो चुकी होती हैं। यह एक बहुत बड़ा challenge है।
इन तीनों स्थितियों को आप मिला दीजिए, बढ़ती demand, घटती traditional ship-building capacity और तेजी से बदलती technology, जब इन तीनों को मिलाएंगे, तो एक global ship-building vacuum पैदा हो रहा है। यह vacuum तीन क्षेत्रों में सबसे अधिक दिख रहा है: Design में, Manufacturing में और Maintenance, Repair and Overhaul यानी MRO में। यही वह golden period है, जिसे भारत capture कर सकता है।
पहले बात Design की करते हैं। Traditional shipbuilding nations के पास जो design expertise थी, वह धीरे-धीरे कम हो रही है। नई पीढ़ी इस क्षेत्र में कम आ रही है। दूसरी तरफ भारत के पास नई पीढ़ी के engineers की बड़ी संख्या है, IT talent है, stimulation और AI capabilities हैं। हम world-class ship-design hub बन सकते हैं। हम सिर्फ दूसरों के designs पर जहाज न बनाएं, बल्कि खुद नए designs तैयार करें, patents करें और दुनिया को export करें। यह पूरी तरह संभव है, do-able है, बशर्ते हम इस पर पूरा ध्यान दें।
दूसरी बात Manufacturing की आती है। ख़ास बात यह है, कि Shipbuilding Manufacturing के क्षेत्र में automation का scope कम है। कई developed countries, labour-intensive shipbuilding से पीछे हट रही हैं, क्योंकि वहां लागत बहुत बढ़ गई है, और skilled workforce की कमी है। हमारे पास इसके विपरीत स्थिति है। हमारे पास विशाल skilled workforce है, steel industry है, MSME base है, और अब नई तकनीक अपनाने की इच्छाशक्ति भी है। यदि हम अपनी manufacturing capacity को modern बनाएं और global quality standards पर काम करें, तो भारत दुनिया का अगला बड़ा shipbuilding hub बन सकता है।
और तीसरा क्षेत्र है MRO, यानी Maintenance, Repair and Overhaul. मैं इसे एक low-hanging fruit मानता हूं। MRO में न तो बहुत अधिक capital investment की जरूरत होती है, और न ही बहुत अधिक manpower की जरूरत होती है। जहाज बनाने में जो लंबा समय और बड़ा पैसा लगता है, MRO में वह नहीं लगता। बस quality, discipline और reliable timeline की जरूरत होती है। यदि हम Indian Ocean region में ship repair और overhaul का hub बन जाएं, तो विदेशी मुद्रा की बचत के साथ-साथ, हजारों रोजगार पैदा होंगे। आज भी हमारे बनाए warships, दुनिया के conflict regions से होकर हमारी energy supply को सुरक्षित रखने में मदद कर रहे हैं। लेकिन MRO के क्षेत्र में, हम और भी बहुत कुछ कर सकते हैं। मैं चाहता हूं, कि GRSE, इस दिशा में भी आगे बढ़ें। हालाँकि आप सब, पहले से ही इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अब हमें इन प्रयासों की गति, और भी तेज करनी होगी।
साथियों, आज का यह अवसर केवल, कुछ infrastructure projects का expansion ही नहीं है। यह global vacuum को भरने की दिशा में एक strategic कदम है। GRSE की रायचक facility, आपको 200 मीटर लंबे युद्धपोत बनाने की क्षमता देगी। इससे आप अगली पीढ़ी के destroyers के लिए भी bid कर सकेंगे, जिन्हें Navy भविष्य में बनाने की योजना बना रही है। टिम्बर पोंड हावड़ा और दामोदर कॉम्प्लेक्स की facilities भी जहाज निर्माण की पूरी value chain को मजबूत करेंगी।
यंत्र इंडिया लिमिटेड की दोनों forging facilities भारी तोपों, naval weapons और advanced defence equipment के लिए, high quality metals तैयार करेंगी। इससे हमारी Navy की operational readiness और maritime firepower को सीधा बल मिलेगा। आप लोग जानते होंगे, हमारे यहाँ पारस पत्थर की संकल्पना है। कहा जाता है, कि पारस पत्थर के संपर्क में जो धातु, यानि metal आ जाता है, वह सोना बन जाता है। YIL भी, मैं समझता हूँ, कि हमारे लिए वह पारस ही है। आपके संपर्क में भी जो metal आ जाता है, अंततः वह भी सोने से कम नहीं होता है। आपकी metallurgical techniques, एवं forging techniques द्वारा तैयार किया गया, iron एवं aluminium एक military grade metal के रूप में विकसित होता है, जिसकी कीमत सोने से भी कहीं अधिक होती है।
साथियों, यह सभी envisaged projects, हमारे economic development से भी जुड़े हुए हैं। एक जहाज जब बनता है, तो उसके साथ हजारों सपने भी आकार लेते हैं। जब हम अपने जहाज खुद बनाएंगे, तो विदेशी मुद्रा की बचत होगी और आर्थिक विकास को गति मिलेगी। जहाज निर्माण से industrial development होगा, MSMEs को बढ़ावा मिलेगा और बड़ी संख्या में direct तथा indirect रोजगार पैदा होंगे। यह बंगाल के लिए और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां की अर्थव्यवस्था को अब नई गति की आवश्यकता है।
GRSE के पास 800 से अधिक जहाजों के निर्माण का अनुभव है। आपके पास technical know-how है, skilled workforce है और अब extended capacity भी होगी। आपको इसका पूरा उपयोग करना होगा। मुझे बताया गया, कि आप अभी navy के orders के साथ-साथ, एक जर्मन कंपनी के लिए 12 cargo ships बना रहे हैं। यह बिल्कुल हमारी “Make in India, Make for the World” की vision के अनुरूप है। जैसे-जैसे आपकी capacity बढ़ेगी, आपको domestic और international दोनों ही markets में अधिक aggressive bidding करनी होगी।
अब हमारी सोच यह नहीं होनी चाहिए कि भारत को दुनिया से क्या खरीदना है; हमारी सोच यह होनी चाहिए कि दुनिया भारत से क्या खरीदना चाहती है।
आप पहले ही दो युद्धपोत export कर चुके हैं और कई friend nations भारत की ओर naval ships की मांग के लिए देख रहे हैं। यह अवसर हमें खोना नहीं है।
प्रधानमंत्री जी ने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में कहा था कि हमें competitive rates पर quality products deliver करने होंगे। शुरुआत में profit margins कम हो सकते हैं, लेकिन volume उसकी भरपाई कर देगा। हमें यही approach रखनी होगी। हमें लागत घटानी होगी, quality बढ़ानी होगी और timely delivery ensure करनी होगी। तभी हम global competition में टिक पाएंगे। हमारा लक्ष्य होना चाहिए, कि Quality ऐसी, कि दुनिया भरोसा करे, Cost ऐसी, कि दुनिया चुने, और Delivery ऐसी, कि दुनिया बार-बार order करे।
मैं जानता हूं कि आपके सामने challenges हैं। Vital components की आपूर्ति में कभी-कभी बाधाएं आती हैं, और private sector की भागीदारी अभी उस स्तर पर नहीं है, जिस स्तर पर होनी चाहिए। सरकार इन मुद्दों को हल करने के लिए लगातार काम कर रही है। जैसे-जैसे private sector की भागीदारी बढ़ेगी, कई बाधाएं अपने आप हल हो जाएंगी। यहां उपस्थित industry captains से मेरा आग्रह है, कि वे आगे आएं और इस यात्रा में भागीदार बनें। यह सही समय है। समुद्री क्षेत्र के विकास पर जो जोर दिया जा रहा है, उसे देखते हुए आपको कभी भी profit की कमी नहीं होगी।
साथियों, आज के इन पांचों projects का शिलान्यास इस बात का संकेत है, कि हम अपनी Defence manufacturing capabilities को हर स्तर पर विस्तार दे रहे हैं। यह केवल सरकार का प्रयास नहीं है, बल्कि इसमें हमारे public sector undertakings, private industry, MSMEs और academic institutions सभी की भागीदारी आवश्यक है। आप देखेंगे कि जो invest आज आप करेंगे, वह आने वाले वर्षों में कई गुना होकर वापस आएगा। सरकार आपके साथ है, और demand भी बढ़ रही है। ऐसे में, सबको एक साथ इस sector में आना चाहिए।
मैं GRSE, और यंत्र इंडिया लिमिटेड के सभी अधिकारियों, इंजीनियरों, कर्मचारियों और श्रमिकों को बधाई देता हूं। आप सभी के सम्मिलित परिश्रम से ही यह संभव हो रहा है। आने वाले समय में GRSE, The Great GRSE के रूप में हमारे सामने आएगा, इसमें कहीं कोई शक-शुबहा नहीं है।
मैं भारतीय नौसेना की भी सराहना करता हूं, जो स्वदेशी उत्पादों पर भरोसा कर रही है, और स्वदेशी जहाज निर्माण को प्रोत्साहन दे रही है।
यहाँ पर श्री संजीव कुमार, secretary, Defence production भी उपस्थित हैं। आपकी leadership में, defence production नित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है। आपका एक event खत्म नहीं होता, तब तक अगले कई events line में तैयार रहते हैं। इस निष्ठा और समर्पण के लिए आप सराहना के पात्र हैं।
मुझे विश्वास है, कि ये पांचों projects समय पर पूरे होंगे; और GRSE और YIL की टीमें इस चुनौती को पूरी निष्ठा से पूरा करेंगी। मुझे पूरा भरोसा है, कि आप सब मिलकर इस यात्रा को सफल बनाएंगे।
अंत में, एक बार फिर इस आयोजन के लिए आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए, मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद।