सरदार पटेल के लिए पद नहीं, देशसेवा सर्वोपरि थी: रक्षामंत्री

सरदार पटेल की 151वीं जयंती के अवसर पर रक्षा मंत्री के संबोधन का मूल पाठ।

साथियो,

आज, हम सरदार वल्लभभाई पटेल जी की 151वीं जयंती मना रहे हैं। इस अवसर पर, सबसे पहले, मैं लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल जी की पावन स्मृति को शीश झुकाकर नमन करता हूँ। उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

साथियो, इस कार्यक्रम का आयोजन ‘भारत भारती’ के तत्त्वावधान में हो रहा है। ‘भारत भारती’ संस्था का अपने शुरुआती दिनों से ही यह प्रयास रहा है कि अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और परंपराओं से जुड़े लोगों को एक साथ लाया जाए। ताकि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत साझा करें और समाज में एकता बढ़े।

सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों के माध्यम से, यह संस्था राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का काम भी करती रही है। मैं इस प्रयास के लिए इस संस्था से जुड़े सभी लोगों की सराहना करता हूँ।

साथियो,

मैं मानता हूँ कि आज का यह कार्यक्रम दो वजहों से बहुत खास है।

पहली वजह यह है कि यह सम्मेलन ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी महिला महाविद्यालय’ में आयोजित किया जा रहा है।

सरदार पटेल और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दोनों ही लोगों ने, राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। दोनों ही लोग, महान राष्ट्रभक्त थे। और दोनों ही लोगों ने, भारत की एकता और अखंडता को मजबूत करने में बहुत बड़ा योगदान दिया।

जब सरदार पटेल जी की मृत्यु हुई तब बहुत से लोगों का मानना था कि उनके बाद अगर कोई व्यक्ति देश की अखंडता को मज़बूत रखने का दायित्व निभा सकता था तो वे सिर्फ़ डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही थे।

दूसरी वजह यह है कि, 1928 के बारडोली सत्याग्रह के बाद ही, वहाँ की महिलाओं ने श्री वल्लभभाई पटेल जी को ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा था। और आज हम सरदार पटेल जी की 151वीं जयंती एक ‘महिला महाविद्यालय’ में मना रहे हैं।

यह बहुत ही सुखद संयोग है।

साथियो,

संत तुकाराम महाराज ने एक वीर पुरुष को पहचानने का तरीका हीरे की मिसाल देकर समझाया है। उन्होंने कहा है कि एक नकली हीरा, असली हीरे की तरह चमक सकता है। लेकिन जब नकली हीरे पर हथौड़े से चोट की जाती है तो वह टूटकर बिखर जाता है। उसकी चमक भी खत्म हो जाती है। लेकिन असली हीरा सारी चोटें सहकर भी, न तो टूटता है और न ही अपनी चमक खोता है।

ऐसे ही, असली वीरता और शौर्य की पहचान भी इसी बात से होती है हम संघर्षों और चुनौतियों के सामने झुके नहीं, टूटे नहीं और अडिग रहें। सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन इस बात का सबसे जीवंत उदाहरण था।

आज़ादी से पहले गुजरात के खेड़ा में किसानों के लिए आंदोलन करना हो या आज़ादी के बाद देश को एकजुट रखना हो, संघर्ष हमेशा बड़ा था। पर उन संघर्षों से बड़ा था सरदार पटेल का हौसला।

गांधी जी ने जो सोचा, सरदार पटेल ने उसे कर के दिखाया। गांधी जी द्वारा शुरू किए गए कई आंदोलनों को सफल बनाने का श्रेय भी सरदार पटेल को दिया जा सकता है।

साथियो,

जब हमारा देश आज़ाद हुआ, तो हमारे सामने बहुत सी चुनौतियाँ खड़ी थीं। और इन सभी में, सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि साढ़े पाँच सौ से अधिक रियासतों को भारत में कैसे जोड़ा जाए? कैसे उन्हें भारत का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए?

यह काम लगभग असंभव सा लग रहा था। सैकड़ों रियासतें थीं। सैकड़ों राजा और नवाब थे। उन सभी की सैकड़ों मांगे थीं। उनमें से कई तो अपना खुद का देश चाहते थे।

ऐसे में इन सभी रियासतों को भारत का हिस्सा बनाना अगर किसी के बस की बात थी तो सिर्फ़ सरदार पटेल के ही थी। और यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ, बल्कि स्वयं महात्मा गांधी ने कही थी।

महात्मा गाँधी ने कहा था कि रियासतों की समस्या इतनी कठिन थी कि उसका समाधान केवल सरदार पटेल ही कर सकते थे। और सरदार पटेल ने अपनी सूझ-बूझ, साहस, दूरदृष्टि, मज़बूत नेतृत्व और संकल्प-शक्ति से यह करके भी दिखाया।

सबसे ज्यादा समस्याएं हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर के विलय में आईं। हम सभी जानते हैं कि तमाम मुश्किलों के बावजूद सरदार पटेल ने जूनागढ़ और हैदराबाद का भी विलय भारत में कराया।

लेकिन कश्मीर के मामले में सरदार पटेल की बात नहीं मानी गई। कश्मीर का भारत में विलय तो हुआ, लेकिन कुछ लोगों ने उस मुद्दे को बेवजह उलझा दिया। पेचीदा कर दिया।

सरदार पटेल ने स्वयं कहा था कि यदि जवाहरलाल नेहरू, कश्मीर के मुद्दे पर हस्तक्षेप नहीं करते तो वे उसे हैदराबाद की तरह ही आसानी से सुलझा लेते।

साथियो,

सरदार पटेल से एक बार किसी ने कहा था कि आप भारत के इतिहास पर किताब क्यों नहीं लिखते हैं। सरदार पटेल ने इस बात पर मुस्कुराते हुए कहा था कि “हम इतिहास लिखते नहीं हैं, बल्कि इतिहास बनाने का काम करते हैं”। और इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि सरदार पटेल ने वाकई में इतिहास बनाने का काम किया।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने कहा था कि अगर आज भारत अखंड है, एक है, एकजुट है; तो उसका श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है। उनकी दूरदर्शिता को जाता है। उनके असाधारण नेतृत्व को जाता है।

बहुत से लोग यह बात मानते हैं कि अगर सरदार पटेल भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री बनते तो हमारे देश के विकास की दिशा बेहतर होती। मैं फिर से कहता हूँ, यह बात मैं नहीं बल्कि आज़ादी की लड़ाई के कई महानायकों ने कही है। जैसे  चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी ने तो लिखा भी है कि यदि सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता तो निस्संदेह बेहतर होता।

लेकिन सरदार पटेल को कभी भी, किसी भी पद की, कोई लालसा नहीं थी। उन्होंने कभी भी प्रशंसा पाने के लिए काम नहीं किया। देशसेवा और जनसेवा उनके लिए केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प था।

मैं आपको इसका एक उदाहरण देता हूँ।

1927 में गुजरात में भयंकर बाढ़ आई थी। सरदार पटेल ने उस समय राहत कार्यों के लिए बहुत काम किया था। कई लोगों की जान बचाई थी। उनके इस योगदान के लिए अंग्रेज़ उन्हें ‘सर’ की उपाधि देना चाहते थे।

एक अंग्रेज अधिकारी ने सरदार पटेल को इस बारे में बताया तो यह बात सुनकर वे हँस पड़े। उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

साथियो, सरदार पटेल को न उपाधियाँ चाहिए थीं। न ही उन्हें पदवियाँ चाहिए थीं। सरदार पटेल को न ही सत्ता का मोह था, न ही किसी पद का।

सरदार पटेल ने एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं बल्कि चार बार; गाँधी जी के कहने पर कांग्रेस के अध्यक्ष पद से अपना नामांकन वापस लिया था।

इतिहास गवाह है कि 1946 में 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियां, सरदार पटेल को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहती थी। यह भी लगभग तय था कि जो अध्यक्ष बनता, वही भारत का पहला प्रधानमंत्री भी बनता। एक भी प्रांतीय कमेटी ने नेहरू जी के नाम का समर्थन नहीं किया था।

लेकिन गांधी जी चाहते थे कि नेहरू जी कांग्रेस  के अध्यक्ष और देश के प्रधानमंत्री बनें। सरदार पटेल ने गांधी जी की बात का सम्मान करते हुए न केवल अपना नामांकन वापस लिया बल्कि पंडित नेहरू के नाम को अपना समर्थन भी दिया।

आप जानते हैं कि गांधी जी ने सरदार पटेल से अध्यक्ष पद के चुनाव से अपना नाम वापस लेने के लिए क्यों कहा था? इसकी कई वजहें थीं। उनमें से एक बड़ी वजह यह थी कि गांधी जी मानते थे कि पंडित नेहरू कभी भी दूसरे नंबर के पद के लिए राज़ी नहीं होंगे। इससे कांग्रेस पार्टी में टकराव बढ़ेगा। इससे स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रनिर्माण के काम में बाधा आएगी।

वहीं गांधी जी को यह विश्वास था कि सरदार पटेल किसी पद पर रहें या न रहें, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वे हमेशा देश की सेवा करते रहेंगे। सरदार पटेल के जीवन में पद से बड़ा देशहित था। कुर्सी से बड़ा कर्तव्य था।

साथियो,

सरदार पटेल ने राष्ट्रीय एकता को केवल रियासतों के विलय तक सीमित नहीं रखा। उनके लिए राष्ट्रीय एकता का मतलब समाज में भाईचारा भी था। लोगों के बीच विश्वास कायम करना भी था।

एक प्रसंग है जो उनकी इस सोच को साफ दर्शाता है। विभाजन के समय, दिल्ली में जब शरणार्थियों को बसाने की बात आई तो कुछ लोगों का यह मानना था कि मुस्लिम-बहुल मोहल्लों में खाली पड़े मकान गैर-मुस्लिमों को न दिए जाएँ।

सरदार पटेल ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका मानना था कि लोगों को धर्म के आधार पर अलग-अलग बसाकर शांति कायम नहीं की जा सकती। ऐसा करने से लोगों के बीच अविश्वास और दूरी बढ़ेगी। उन्होंने चेताया था कि इस तरह पूरी दिल्ली में छोटे-छोटे ‘पाकिस्तान’ और ‘हिंदुस्तान’ बन जाएँगे।

सरदार पटेल की सोच साफ थी कि धर्म के आधार पर देश का बँटवारा एक बार हो चुका है, अब भारत का हर नागरिक सबसे पहले भारतीय है, और बाद में हिन्दू या मुसलमान है।

सरदार पटेल जाति-व्यवस्था और भेदभाव के भी सख्त खिलाफ थे। उन्होंने जाति के आधार पर भेदभाव के खिलाफ सिर्फ बात ही नहीं की बल्कि अपने आचरण से  भी सामाजिक समरसता का संदेश भी दिया।

1922 की बात है। गुजरात के काठियावाड़ में एक राजनीतिक सम्मेलन हो रहा था। उस सम्मेलन में सरदार वल्लभभाई पटेल भी शामिल हुए थे। सरदार पटेल जब वहाँ पहुंचे तो देखा कि उस सम्मेलन में दलित समाज के लोगों के बैठने के लिए अलग व्यवस्था की गई थी।

सरदार पटेल को यह बात बहुत बुरी लगी। उन्होंने इस बात का विरोध किया। वे सम्मेलन के मुख्य पंडाल में नहीं गए। बल्कि वे सीधे उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ दलित समाज के लोगों को अलग बैठाया गया था। और उनके बीच जाकर बैठ गए। जब सरदार पटेल की भाषण देने की बारी आई, तो वहीं से उन्होंने अपना पूरा भाषण दिया।

सरदार पटेल मानते थे की सामाजिक एकता हमारी सोच में ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी दिखना चाहिए। वे मानते थे कि राष्ट्रनिर्माण तभी संभव है, जब हर नागरिक को समान सम्मान मिले और समाज भेदभाव से ऊपर उठकर एकजुट हो।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी जब ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और सबका प्रयास’ की बात करते हैं तो वह सरदार पटेल के आदर्शों का ही सम्मान है।

साथियो,

सरदार पटेल के व्यक्तित्व में कुछ ऐसी चट्टान जैसी बात थी जिससे असाधारण विश्वास पैदा होता था। लेकिन सरदार पटेल को जिन लोगों ने समझा और जिन लोगों ने उनके साथ काम किया, वे सभी लोग यह बात भी मानते थे कि लोहे जैसे कठोर सरदार पटेल का हृदय सोने जैसा था। वे मानवता, करुणा और स्नेह के भंडार थे।

सरदार पटेल कितने उदार व्यक्तित्व के धनी थे इसके अनेक उदाहरण हैं। लेकिन मैं आपको एक विशेष प्रसंग बताना चाहता हूँ।

विभाजन के समय देश सांप्रदायिकता की अग्नि में झुलस रहा था। देश में कई जगहों पर दंगे हो रहे थे। उस समय भोपाल के नवाब की बेटी अपने पिता के घर भोपाल में थी। उनके पति हरियाणा के पटौदी में रहते थे। वो अपने पति के पास जाना चाहती थीं। लेकिन दंगों की वजह से रास्ता बहुत असुरक्षित था।

यह बात सरदार पटेल को पता चली। तो उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि रास्ते में उन्हें कोई खतरा न हो। यहाँ तक कि जब वह अपने पति के पास पहुँच गई तो, वहाँ भी सरदार पटेल ने उन दोनों की सुरक्षा के इंतज़ाम किए।

ऐसे थे सरदार पटेल। दृढ़ लेकिन उदार।

साथियो,

सरदार पटेल के एक-एक शब्द उनके मजबूत इरादों की गवाही देते थे। उनकी हर बात में बड़ा संदेश होता था। मैं आपको इसका एक उदाहरण देता हूँ।

आज़ादी से पहले की बात है। पंडित जवाहरलाल नेहरू कश्मीर जा रहे थे। उस समय जम्‍मू-कश्‍मीर के प्रधानमंत्री राम चंद्र काक थे। राम चंद्र काक के आदेश पर पंडित नेहरू को हिरासत में ले लिया गया। इस बारे में एक व्यक्ति ने सरदार पटेल से पूछा कि सरदार साहब अब काक का क्या होगा? तो सरदार पटेल ने जवाब दिया कि ‘काक’ अब जल्द ही ‘खाक’ में मिल जाएँगे।

साथियो,

आज मैं एक और महत्वपूर्ण विषय के बारे में बात करना चाहता हूँ।

आपने सुना होगा कि आज कांग्रेस और उनके कुछ साथी देश में ‘Regime Change’ करने  की बात कर रहे हैं। Regime Change का मतलब तो आप सब जानते ही होंगे। नहीं जानते हैं तो गूगल कर लीजिए। Regime Change का मतलब होता है तख़्तापलट करना। Regime Change का मतलब होता है हिंसा, अराजकता और गृहयुद्ध।

लोकतंत्र में इस शब्द का इस्तेमाल करना भी पाप है।

जब इस शब्द के इस्तेमाल पर लोगों ने आपत्ति जताई तो तुरंत कांग्रेस के लोग कहने लगे कि हम तो सरकार बदलने की बात कर रहे हैं।

मैं उनसे पूछता हूँ कि सरकारें चुनाव से बदलती है या सड़कों पर अराजकता फैला कर? सरकारें जनमत से बदलती है या हिंसा करके? सरकारें लोगों का विश्वास जीत कर बनाई जाती हैं या युवाओं को भटका कर?

Regime Change की बात करने वालों और भारत के टुकड़े करने की सोच रखने वालों को मैं एक बात याद दिलाना चाहता हूँ। हैदराबाद का निज़ाम दुनिया का सबसे अमीर आदमी माना जाता था। उसने भारत से लड़ने के लिए रज़ाकारों की सेना बना ली थी। उन रज़ाकारों के मुखिया ने यह तक कह दिया था कि अगर भारत की सेनाएं हैदराबाद में आयीं, तो डेढ़ करोड़ हिन्दुओं की केवल ‘हड्डियाँ और राख’ मिलेगी।

इतिहास गवाह है कि कैसे सरदार पटेल ने ऐसे मंसूबे रखने वाले निज़ाम को उसके घुटनों पर ला दिया था।

ऐसे में अगर कोई भारत को तोड़ने या अराजकता फैला कर तख्ता पलटने का ख़्वाब देख रहा है, तो उसे यह याद रखना चाहिए कि मोदी जी भी उसी धरती पर जन्मे हैं जिस धरती ने सरदार पटेल को जन्म दिया।

मोदी जी ने गुजरात में सिर्फ़ सरदार पटेल की सबसे विशाल मूर्ति ही नहीं बनाई है, उन्हें अपना मार्गदर्शक भी बनाया है। सरदार पटेल की राष्ट्र की एकता बनाए रखने की प्रतिज्ञा को भी अपनाया है।

सरकार से सवाल पूछना सभी का अधिकार है। लोकतंत्र में चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने और बनाने का मौक़ा भी सभी को मिलता है।

मैं मानता हूँ ऐसे में, जब सत्ता हासिल करने के लिए लोकतांत्रिक तरीक़े मौजूद हैं, तब Regime Change की बातें करना न केवल लोकतंत्र को चुनौती देना हैं बल्कि यह राष्ट्रद्रोह है।

साथियो,

सरदार पटेल ने एक बार कहा था—“मैं नेता नहीं हूँ, मैं तो एक सैनिक हूँ।” और जीवन भर उन्होंने एक सैनिक की तरह ही कार्य किया। बिना विचलित हुए, एक सैनिक की तरह उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन किया। अनुशासन से जीवन जिया। देशहित को सबसे ऊपर रखा।

सरदार पटेल को बहुत से लोगों ने मुस्लिम-विरोधी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की। लेकिन सरदार पटेल किसी के विरोधी नहीं थे। वे तो सिर्फ ‘राष्ट्र प्रथम-सदैव प्रथम’ के पक्षधर थे।

उन्होंने आज़ादी के बाद, एक बार कहा था कि अब सबको एक ही नाव पर सवार होकर साथ चलना है। अगर पार उतरेंगे तो सब पार उतरेंगे और डूबेंगे तो सभी साथ डूबेंगे।  यानी वे सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे।

मैं आपको एक और उदाहरण देता हूँ। 1947 की बात है। सरदार पटेल को पता चला कि भारत से पाकिस्तान जा रहे  लोगों पर अमृतसर में हमला हो सकता है, तो वे तुरंत वहाँ पहुँचे। उन्होंने वहाँ के नेताओं से मुलाकात की। उन्होंने लोगों को समझाया और मुस्लिमों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। उनकी अपील का असर भी हुआ।

साथियो,

आज इस कार्यक्रम में अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों की प्रस्तुतियाँ हो रही हैं। ऐसे में सरदार पटेल के भाषा के बारे में विचारों को भी याद करना चाहिए।

आज़ादी से पहले रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में उर्दू भाषा का बहुत अधिक इस्तेमाल होता था। आज़ादी के बाद कुछ लोग चाहते थे कि उर्दू से पूरी तरह दूरी बनाई जाए क्योंकि पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी राष्ट्रीय भाषा बना लिया था।

लेकिन सरदार पटेल इस बात से सहमत नहीं हुए। उन्होंने साफ कहा था कि उर्दू किसी एक क्षेत्र की भाषा नहीं है; देश के कई हिस्सों में लोग उर्दू बोलते हैं।

उन्होंने यह साफ कर दिया था कि जिन क्षेत्रों में उर्दू बोली जाती है, वहाँ ‘ऑल-इंडिया-रेडियो’ के कार्यक्रमों में उर्दू का इस्तेमाल हो।

यानी बात भाषा की हो या आम लोगों की सुरक्षा की; सरदार पटेल ने कभी भी उसे हिन्दू-मुस्लिम के नजरिए से नहीं देखा।

साथियो,

सरदार पटेल की विरासत बहुत बड़ी है। आज का मजबूत और आत्मविश्वास से भरा भारत उनकी विरासत है। अगर हमारे पास सक्षम प्रशासन है—तो यह भी सरदार पटेल की विरासत है।

अगर किसान हमारे राष्ट्रीय चिंतन के केंद्र में हैं—तो यह भी सरदार पटेल की विरासत है। अगर सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और शुचिता को महत्व दिया जाता है—तो यह भी सरदार पटेल की विरासत है।

यदि राष्ट्र हित को व्यक्तिगत हित से ऊपर रखने की संस्कृति आज भी जीवित है—तो यह भी सरदार पटेल की सबसे महान विरासत है।

और उनकी सबसे बड़ी विरासत आज का भारत है जो एक झंडे के नीचे साँस लेता है। जो आज एकजुट है। और अखंड है।

साथियो,

लंबे समय तक बहुत से लोगों ने सरदार पटेल की विरासत को छिपाने और मिटाने का कार्य किया है। मैं आपको इसके कुछ उदाहरण देता हूँ।

ये तो हुआ पहला उदाहरण। मैं आपको एक और उदाहरण देता हूँ।

हम सभी इस बात से सहमत होंगे कि सरदार पटेल का भारत की आज़ादी की लड़ाई में और बाद में स्वतंत्र भारत के निर्माण में बहुत ही बड़ा योगदान था। अगर सरदार पटेल न होते तो शायद भारत कई छोटी-छोटी रियासतों में बंटा होता।

इसलिए, जब उनकी मृत्यु हुई, तो उनके सम्मान में एक भव्य राष्ट्रीय स्मारक बनना चाहिए था। उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए था। लेकिन साथियो, ऐसा नहीं हुआ।

उनके देहांत के बाद जनता ने श्रद्धापूर्वक उनके स्मारक के लिए धन भी एकत्र किया था। लेकिन जब यह बात पंडित नेहरू तक पहुंची तब उन्होंने यह कह दिया कि सरदार पटेल तो किसानों के नेता थे, इसलिए यह धन गाँवों में कुएँ और सड़क बनाने में खर्च कर दिया जाए।

मैं पूछता हूँ कि कुएँ और सड़क बनाने का काम तो सरकार का होता ही है। क्या उसके लिए स्मारक के पैसे का इस्तेमाल करने का सुझाव बेतुका नहीं था?

नेहरू जी जब प्रधानमंत्री थे तब ही उन्हें ‘भारत रत्न’ मिल गया था। सरदार पटेल के निधन के लगभग चार दशक बाद 1991 में उन्हें भारत रत्न दिया गया।

मैं आपको एक और उदाहरण देता हूँ। वर्ष 1989 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्म के 100 वर्ष पूरे हुए। इस अवसर को बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। देशभर में हजारों होर्डिंग लगाए गए। टीवी पर कार्यक्रम चलाए गए। रैलियाँ आयोजित की गयीं।

लेकिन जब 1975 में सरदार पटेल के जन्म के 100 वर्ष पूरे हुए, तब क्या किया गया। कुछ भी नहीं। इस मौके को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

इससे सिर्फ एक बात साफ होती है कि लंबे समय तक सरदार पटेल की महान विरासत को दबाने की कोशिश की गई। उसे छिपाने की कोशिश की गई। उसे मिटाने की कोशिश की गई।

लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने गुजरात के केवड़िया में सरदार पटेल की लगभग 600 फुट ऊंची मूर्ती का निर्माण कराकर, सरदार पटेल और उनकी समृद्ध विरासत को सम्मान देने का कार्य किया है। पिछले वर्ष उनके 150वें जन्मदिवस को पूरे देश में खूब धूमधाम से मनाया गया।

2014 के बाद से सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के उपलक्ष्य में ‘राष्ट्रीय एकता दिवस’ मनाया जाता है। ‘रन फॉर यूनिटी’ और ‘एकता मार्च’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

सरदार पटेल तो महान थे ही। मैं समझता हूँ कि इन कार्यों से उनका नहीं, भारत का मान बढ़ा है।

साथियों,

सरदार पटेल ने आज़ाद भारत को राजनीतिक और भौगोलिक एकता के सूत्र में पिरोया था। आज उन्हीं के मूल्यों से प्रेरणा लेकर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में लगातार काम कर रहे हैं। “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” के मूल्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं। विकसित भारत के निर्माण के लिए पूरी ताक़त से काम कर रहे हैं।

आज देश से नक्सलवाद समाप्त हो चुका है। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हट चुका है।

साथियो,

इतिहास गवाह है कि सरदार पटेल ने रियासतों को भारत में जोड़ने के लिए सबसे पहले बातचीत का रास्ता चुना। लेकिन जो लोग बातचीत की भाषा नहीं समझे, उन्हें दूसरी भाषा में समझाया गया।

आज हमने भी दुनिया को यह साफ कर दिया है कि शांति और सद्भावना की भाषा नहीं समझने वाले लोगों को हम उन्हीं की भाषा में जवाब देना जानते हैं।

साथियो,

सरदार पटेल ने सेना के आधुनिकीकरण पर बहुत जोर दिया था। शायद वे आजाद भारत के पहले राजनेता थे जिन्होंने हथियार और गोले-बारूद को देश में ही बनाने पर जोर दिया था।

आज रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने में सरदार पटेल के विचार हमारे मार्गदर्शक बन रहे हैं।

आज हमारा स्वदेशी रक्षा उत्पाद लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। आज हम 100 से अधिक देशों को रक्षा उत्पाद निर्यात कर रहे हैं।

आप सोचिए, आज भारतीय सेना के पास लगभग 175 तरीक़े के गोले-बारूद और हथियार हैं। आप को जान कर ख़ुशी और गर्व होगा की इसमें से 159 गोले-बारूद और हथियार स्वदेशी हैं।

साथियो,

सरदार पटेल की आर्थिक नीति की समझ बहुत व्यावहारिक और सटीक थी। सरदार पटेल का मानना था कि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए Private Sector का सहयोग जरूरी है।

उनका मानना था कि जिन लोगों को व्यापार करने का ज्ञान और अनुभव है, उन्हें ही वह काम करना चाहिए। अगर आजादी के बाद सरदार पटेल की सलाह को मान लिया जाता, तो शायद भारत आज एक विकसित राष्ट्र होता।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में हमने सरदार पटेल के Vision को आगे बढ़ाया है। हमने ‘योजना आयोग’ को समाप्त कर दिया है। हमने देश हित में Private Sector को विकास का भागीदार बनाया है।

2014 के बाद आज हमारा देश दुनिया की Top 5 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। और Top 3 में शामिल होने की ओर बढ़ रहे हैं। और यह बात सिर्फ मैं नहीं कह रहा हूँ। यह बाद विश्व के बड़े-बड़े आर्थिक विशेषज्ञ और IMF और World Bank जैसी संस्थाएं कह रही हैं।

साथियो,

सरदार पटेल कहते थे कि जो हमारा नहीं है वो हमें बिल्कुल भी नहीं चाहिए। लेकिन जो हमारा है उसे हम किसी भी कीमत पर छोड़ेंगे भी नहीं।

भारत आज इसी मूल्य के साथ आगे बढ़ रहा है। भारत किसी की जमीन पर कब्जा नहीं करेगा। किसी से युद्ध नहीं शुरू करेगा। लेकिन जो हमारा हक है वो हम लेकर रहेंगे। जो हमारा अधिकार है उसे हम बिल्कुल लेकर रहेंगे।

आज जब हम सरदार पटेल की 151वीं जयंती मना रहे हैं तो उनकी कही एक बात हमें याद रखनी चाहिए। उन्होंने एक बार कहा था कि हमारी आंतरिक कलह ही विदेशी आक्रमणों के समय हमारी पराजय का कारण बनी है। और हमें यह गलती नहीं दोहरानी है।

इसी आशा के साथ और इसी विश्वास के साथ कि हम भारत की एकता और अखंडता को चुनौती देने वाले लोगों से सावधान रहेंगे और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कार्य करते रहेंगे, मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ।