Text of RM’s speech at Rashtra Prahari Samman Samaroh in New Delhi.
इस सम्मान समारोह में सम्मिलित होकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। अपनी बात शुरू करने से पहले, मैं आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की पुण्य स्मृति को नमन करता हूँ। आचार्य जी केवल जैन समाज के संत नहीं थे, वे पूरे देश के लिए प्रेरणा स्रोत थे। उनके जीवन का हर क्षण और उनके शरीर का हर कण; धर्म, संस्कृति और देश के लिए सदैव समर्पित रहा।
यह बड़ी ही प्रसन्नता और सौभाग्य की बात है कि आज हमें आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य, मुनि श्री विनम्रसागर जी महाराज ससंघ और अन्य मुनिजन का आशीर्वाद मिल रहा है। इस चातुर्मास में आप सभी का आशीर्वाद और सान्निध्य मिलना मेरे लिए अत्यंत हर्ष, गौरव और आध्यात्मिक आनंद का विषय है।
जैन धर्म में कहा गया है—“कामो कसायो खवे जो, सो मुणी – पावकम्म-जओ।” अर्थात जो व्यक्ति काम और कसायों यानी क्रोध, अभिमान, माया और लोभ आदि पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही सच्चे अर्थों में मुनि होता है।
जिस देश को ऐसे आचार्यों, संतों और मुनिजन का आशीर्वाद और सान्निध्य मिलता है, उस देश की संस्कृति कभी तिरोहित नहीं होती है। वह हर युग में नए रूप में पुनर्जीवित होती रहती है।
देवियो और सज्जनो,
आज हम देश के वीर सैनिकों और उनके परिवारजनों को सम्मानित करने के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं। मैं ‘श्री विद्या समय विनम्र चातुर्मास समिति’ को इस ‘वीरोदय अखिल भारतीय राष्ट्र प्रहरी सम्मान समारोह’ को आयोजित करने के लिए हार्दिक बधाई देता हूँ।
अभी हाल ही में मैंने एक Retired Army Officer की किताब में एक बहुत ही रोचक प्रसंग पढ़ा। एक कार्यक्रम में उन Army Officer से एक Student ने पूछा कि Army की Job कितनी Challenging होती है? तो उन्होंने बिना एक पल सोचे जवाब दिया कि Army एक Job नहीं है, मोहब्बत है। और मोहब्बत में Challenges नहीं होते, अफसाने होते हैं। (यह बात रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल कंवल जीत सिंह ढिल्लों जी की पुस्तक ‘कितने ग़ाज़ी आए, कितने ग़ाज़ी गए’ में लिखी हुई है)
मुझे लगता है, हमारे सैनिकों के जीवन को समझने के लिए इससे सुंदर बात नहीं हो सकती है। हमारे सैनिकों के लिए सेना में जाना नौकरी नहीं है। यह राष्ट्रसेवा का संकल्प है, मातृभूमि की रक्षा का प्रण है। वे सभी सुख-सुविधाओं को छोड़कर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हैं। उनका एक ही उद्देश्य होता है और वह है देश की आन-बान-शान कायम रखना।
देवियो और सज्जनो,
जब जवान सीमा पर दुश्मन से लड़ रहे होते हैं, तब एक, दूसरे तरह की लड़ाई उनका परिवार घर पर लड़ रहा होता है।
एक जवान की माँ हर पल अपने बेटे की सलामती की चिंता करती है। पिता को हर फोन की घंटी बजने पर डर लगता है। पत्नी की हर प्रार्थना में अपने पति की सुरक्षा की दुआ होती है। लेकिन वे कभी भी उस जवान को यह अहसास नहीं होने देते कि वे उसके लिए चिंतित हैं। क्योंकि वे नहीं चाहते हैं कि उनकी कोई भी बात उस जवान के मन में घर की चिंता पैदा कर दे।
यानी जब जवान सीमा पर गोलियों के बीच खड़े होते हैं, तो उनके परिवार अपने घरों में हर पल चिंता और इंतजार के बीच खड़े रहते हैं।
सैनिकों और उनके परिवारों का पूरे देश पर जो ऋण है वह कभी नहीं चुकाया जा सकता है। हम बस उनका मान-सम्मान कर सकते हैं। इसलिए आज का यह कार्यक्रम अत्यंत सराहनीय है।
देवियो और सज्जनो,
मैं अपनी वाणी की सीमाओं को जानते हुए भी, इस अवसर पर, जैन धर्म के बारे में अपने अंतर्मन की कुछ बातें आप सबके सामने रखना चाहूँगा। जैन धर्म के पूज्य मुनियों और विद्वानों के बीच जैन दर्शन पर बोलने का, मैं स्वयं को अधिकारी तो नहीं मानता हूँ। फिर भी, जैन धर्म की महान परंपरा से मैंने जो थोड़ा-बहुत समझा है, जो बातें मेरे मन को छूती हैं और जिनसे मुझे प्रेरणा मिलती है, उन बातों को आज आप सभी के साथ साझा करने का प्रयास कर रहा हूँ।
देवियो और सज्जनो,
जैन शब्द के मूल में “जिन” शब्द है। जिन माने विजेता। विजेता वह है जिसने हर बुराई पर विजय प्राप्त कर ली हो। विजेता वह है जिसने सभी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली हो। और इस विजय को प्राप्त करने का मार्ग, हमारे सभी पूजनीय जैन तीर्थंकरों ने हमें दिखाया है। तीर्थंकरों के बताए तीन रत्न और पंच महाव्रत, यदि कोई भी व्यक्ति अपना लेता है, तो उसे मोक्ष मिल जाता है। कर्मों और जन्मों के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।
मैं कहता हूँ कि इन सभी सिद्धांतों को जानना और अपनाना बहुत बड़ी बात है। सिर्फ कुछ सिद्ध व्यक्ति ही यह कर पाते हैं। लेकिन जैन धर्म की तीन बातें या सिद्धांत ऐसे हैं, जिन्हें सही मायने में समझ लेने मात्र से दुनिया की लगभग सभी समस्याओं का हल हो सकता है।
वे तीन सिद्धांत हैं “परस्परोपग्रहो जीवानाम” का सिद्धांत, अनेकांतवाद का सिद्धांत और अपरिग्रह का सिद्धांत।
पहला सिद्धांत “परस्परोपग्रहो जीवानाम” जैन धर्म के प्रतीक चिन्ह में भी अंकित है। इसका अर्थ है कि इस संसार में हर चीज एक-दूसरे पर आश्रित है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, प्रकृति और हम इंसान—सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं। एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कोई भी व्यक्ति या कोई भी जीव अकेला नहीं जी सकता है।
सोचिए, अगर सभी को यह बात समझ आ जाए तो समाज में कितना सामंजस्य होगा। हर व्यक्ति यह समझेगा कि उसकी तरक्की, दूसरों की तरक्की पर निर्भर है। उसकी सुरक्षा, दूसरे की सुरक्षा से अलग नहीं है। वह प्रकृति से अलग नहीं है। यही सोच परिवार में हो, समाज में हो, देशों के बीच हो, तो बहुत-से झगड़े शुरू होने से पहले ही खत्म हो सकते हैं।
इसी तरह जैन धर्म का दूसरा सिद्धांत अनेकांतवाद, हमें सिखाता है कि सामने वाले के Point of View को भी समझो। हर बात को केवल अपनी नज़र से मत देखो।
महात्मा गांधी इस बात को समझाने के लिए अक्सर एक कथा का उल्लेख करते थे। एक बार कई नेत्रहीन लोग हाथी को छूकर महसूस करते हैं। और अपने अनुभव के आधार पर बताते हैं कि हाथी कैसा होता है। जिस व्यक्ति ने हाथी की पूँछ को छुआ, उसे हाथी रस्सी के जैसा लगा। जिस व्यक्ति ने सूँड छुई, उसने हाथी की साँप से तुलना की। जिसने पैर पकड़ा, उसने हाथी को पेड़ बताया।
यानि सब अपने-अपने अनुभव के हिसाब से बता रहे थे कि हाथी कैसा होता है। सभी के अनुभव सही थे। लेकिन किसी का भी अनुभव पूर्ण सत्य नहीं था। यही अनेकांतवाद का सार है कि, हमारे अनुभव हमारे लिए सही हो सकते हैं, सच हो सकते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि वह दूसरों के लिए भी सही हों, सच हों।
इसलिए यह आवश्यक है कि दूसरों की बातों को भी सुनें। उनका Perspective भी समझें। आज दुनिया में कई विवाद इसलिए पैदा होते हैं, क्योंकि लोग दूसरे की बात सुनना ही नहीं चाहते हैं। समझना ही नहीं चाहते हैं।
अनेकांतवाद सहनशीलता के मूल्य को बढ़ावा देता है। उदारता को बढ़ाता है। और मैं अक्सर कहता हूँ कि मन बड़ा रखने पर ही हमें परमानंद मिलता है। मैं मानता हूँ कि अनेकांतवाद का सिद्धांत हमारे मन को बड़ा बनाता है। हमें Large Hearted बनाता है।
तीसरा सिद्धांत है—अपरिग्रह। अपरिग्रह का सरल अर्थ है कि संचय मत करो और इच्छाओं पर संयम रखो। एक जैन आगम में लिखा है “जहा लाहा तहा लोहो, लाहा लोहो पवडुई” यानी ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों-त्यों लोभ भी बढ़ता जाता है। इच्छाओं का कोई अंत नहीं है।
अपरिग्रह का सिद्धांत हमें संतोष, संयम और त्याग की भावना सिखाता है। आज लोग अक्सर ज्यादा पाने की दौड़ में लगे रहते हैं- और अधिक धन, अधिक सुविधाएं, और अधिक संपत्ति। लेकिन अपरिग्रह का सिद्धांत, यह याद दिलाता है कि जीवन में सुख इच्छाओं को पूरा करने से नहीं, इच्छाएं सीमित करने से मिलता है।
ये तीनों सिद्धांत क्या बताते हैं? पहला कहता है—सभी से जुड़कर चलो। दूसरा कहता है—सभी को समझकर चलो। तीसरा कहता है— सभी की जरूरतों का सम्मान करो और संचय मत करो। एक हमें रिश्ते की कीमत बताता है, दूसरा विनम्र बनाता है, तीसरा हमें त्याग और संतुलन का रास्ता दिखाता है।
अब आप ही बताइए—अगर हम सब अपने जीवन में इन तीन बातों को अपना लें, तो क्या हमारे परिवारों में रिश्ते मजबूत नहीं होंगे? क्या समाज में आपसी सामंजस्य और सहयोग नहीं बढ़ेगा? क्या पर्यावरण में संतुलन नहीं बढ़ेगा? क्या दुनिया में शांति और सद्भाव नहीं बढ़ेगा? जवाब हम सभी जानते हैं—निश्चित रूप से बढ़ेगा।
अगर दुनिया सिर्फ इन तीनों बातों को ही अपना ले तो हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
देवियो और सज्जनो,
आज आधुनिक विज्ञान Matter को समझने के लिए Atom, Electron, Proton, Quark और Higgs Boson जैसे Particles की बात करता है। लेकिन जैन धर्म और दर्शन में Modern Science से बहुत पहले Nature और Matter को लेकर बहुत गहरा और सूक्ष्म चिंतन किया गया है।
जैसे, जैन धर्म और दर्शन में ‘पुद्गल’ की अवधारणा है। पुद्गल शब्द Modern Science में Use होने वाले Matter शब्द का पर्यायवाची है। यह बात गौर करने वाली है कि जब न Modern Labs थी और न ही Modern Equipments, तब जैन आचार्य Matter की सूक्ष्मता और उसकी संरचना पर गहरा चिंतन कर रहे थे।
यानी भारत की परंपरा जिज्ञासा की परंपरा है, प्रश्न पूछने की परंपरा है, और सत्य को जानने की परंपरा है। यह बात हमें अपनी भारतीय ज्ञान परंपरा पर गर्व करने का एक और कारण देती है।
देवियो और सज्जनो,
जैन परंपरा में जीवन के हर पक्ष को संतुलित रखने की बात की गई है। जैसे मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। जैन परंपरा में भोजन पर बहुत विचार किया गया है। क्या खाना है? कितना खाना है? और कब खाना है?
इन सभी बातों पर जैन ग्रंथों और आचार्यों ने विस्तार से बात की है। आज जब गलत खान-पान और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, तब जैन परंपरा का संयमित भोजन और अनुशासित जीवन का विचार बहुत प्रासंगिक है।
अगर एक शब्द में जैन धर्म को समझाना हो, तो वह शब्द है—‘सम्पूर्ण’। क्योंकि जैन धर्म केवल पूजा करना नहीं सिखाता, बल्कि यह बताता है कि जीवन कैसे जीना है। दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना है। क्या आचरण सही है? और क्या आचरण गलत है? प्रकृति और हर जीव के प्रति हमारा व्यवहार कैसा हो? और जीवन को सार्थक क्या बनाता है।
यानी जैन धर्म केवल धर्म नहीं है, बल्कि जीवन को समझने और सही से जीने की समग्र दृष्टि है।
देवियो और सज्जनो,
आचार्य श्री विद्यासागर जी का एक प्रसिद्ध महाकाव्य है ‘मूकमाटी’। वह एक बार सभी को पढ़ना चाहिए। उस महाकाव्य में आचार्य जी बड़ी से बड़ी बात भी बहुत सरल तरीके से समझाते हैं।
जैसे ‘मूकमाटी’ में एक जगह आचार्य जी ने लिखा है— “सत्-युग हो या कलियुग, बाहरी नहीं, भीतरी घटना है यह। सत् की खोज में लगी दृष्टि ही, सत्-युग है!, और असत्-विषयों में डूबी, सत् को असत् मानने वाली दृष्टि, स्वयं कलियुग है!”
आप सोचिए, यह कितनी गहरी बात है। सतयुग और कलियुग सिर्फ समय के दो कालखंड नहीं हैं। यह हमारे मन और हमारी सोच की स्थिति भी है। अगर हमारे मन में सच्चाई है, प्रेम है, करुणा है, संवेदनशीलता है तो हमारे भीतर सतयुग है। लेकिन अगर मन में लालच, ईर्ष्या और अहंकार आ जाए, तो समझिए कि मन के भीतर ही कलियुग है।
इसे हम भक्त प्रह्लाद के उदाहरण से समझ सकते हैं। भक्त प्रह्लाद का जन्म सतयुग में हुआ। उनके मन में भगवान विष्णु की भक्ति थी। और सच्चाई थी। इसलिए उनके भीतर भी सतयुग था। वहीं दूसरी ओर भक्त प्रह्लाद के पिता हिरण्यकशिपु के मन में अहंकार और क्रोध था। इसलिए भले ही हिरण्यकशिपु का जन्म सतयुग में हुआ था, लेकिन उसके मन में कलियुग ही था।
इसलिए अगर युग बदलना हो या समाज बदलना हो तो उसका सबसे पहला कदम है—अपने भीतर के युग या मन को बदलना। अगर हर व्यक्ति अपनी सोच को सही कर ले, तो समाज अपने आप बेहतर हो जाएगा।
देवियो और सज्जनो,
भारत की धरती से भगवान महावीर ने पूरी दुनिया को अहिंसा, करुणा और सत्य का संदेश दिया है। अहिंसा का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि किसी को मारा न जाए। अहिंसा का अर्थ है— मन, वचन या कर्म से— किसी भी रूप में, किसी को भी पीड़ा न पहुँचाई जाए।
लेकिन अहिंसा के मूल्य को हमारी कमजोरी समझने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए। अहिंसा और शांति हमारी संस्कृति हैं। लेकिन अपने देश की सुरक्षा और सम्मान के लिए खड़े होना हमारा कर्तव्य है।
करुणा और शौर्य का यह सुंदर संगम भारत की महान परंपरा की पहचान है। आप जैन समाज का इतिहास उठाकर देख लीजिए। जब-जब देश की रक्षा का सवाल आया, तब-तब जैन समाज के लोग सबसे आगे खड़े मिले हैं। वे अपने तन-मन-धन और ज्ञान से भारत की रक्षा करते रहे हैं।
आप सभी ने सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का नाम सुना होगा। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने बहुत विशाल साम्राज्य की नींव रखी। भारत की शक्ति को बढ़ाया। एकता को बढ़ाया। और भारत को बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षित रखा। अपने अंतिम दिनों में उन्होंने जैन धर्म की दीक्षा ली थी।
महाराणा प्रताप के कठिन समय में उनकी मदद करने वाले भामाशाह भी जैन धर्म से थे। जब महाराणा प्रताप संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे तो भामाशाह ने अपनी सारी संपत्ति महाराणा प्रताप के चरणों में रखकर कहा था— “यह सब मातृभूमि के लिए है, राणा।”
इसी तरह 16वीं शताब्दी में रानी अब्बक्का (Abbakka) ने पुर्तगालियों आक्रमणकारियों को धूल चटाई थी। जब पुर्तगालियों ने उल्लाल पर कब्जा करने का प्रयास किया तो, रानी अब्बक्का ने उनके हर हमले को विफल कर दिया। तीरंदाजी और तलवारबाजी में उनका कोई सानी नहीं था। वे भी जैन समाज से आती थीं।
और जैन समाज की यह परंपरा आधुनिक भारत में भी दिखाई देती है। स्क्वाड्रन लीडर मोहिंदर कुमार जैन ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अद्भुत साहस का परिचय दिया। और देश की सेवा करते हुए, अपने प्राणों का बलिदान दिया।
जैन धर्म से आने वाले Dr D. S. Kothari रक्षा मंत्रालय के पहले वैज्ञानिक सलाहकार थे। Dr D. S. Kothari ने Basic Science Laboratory की स्थापना की थी जिसने Defence Research and Development Organisation के गठन को आधार प्रदान किया।
यानी जैन समाज के लोग देश की रक्षा के लिए सबसे आगे रहे हैं। वे देश के लिए अपना सर्वस्व देते रहे हैं। और वे धर्म और कर्म दोनों को निभाते रहे हैं।
देवियो और सज्जनो,
आपमें से बहुत लोगों ने स्वामी विवेकानंद जी के उस ऐतिहासिक भाषण के बारे में सुना होगा, जो उन्होंने 1893 में शिकागो की ‘विश्व धर्म संसद’ में दिया था। स्वामी विवेकानंद जी ने भारत की आध्यात्मिक और सनातन परंपरा का परिचय पूरी दुनिया को कराया था।
उसी धर्म संसद में भारत के एक और महान व्यक्ति की आवाज गूंजी थी। वे व्यक्ति थे श्री वीरचंद गांधी। वीरचंद जी ने अपने ओजस्वी भाषण से पूरी दुनिया को जैन धर्म और भारतीय चिंतन से परिचित कराया था।
लेकिन जब भारत और हिंदू धर्म के बारे में वहाँ कुछ गलत बात कही गई, तब वीरचंद जी ने करारा जवाब दिया था। उन्होंने दुनिया को बताया था कि हिन्दू धर्म वह धर्म है जिसकी प्रशंसा में ग्रीक लोग यह कहते थे कि हिन्दू धर्म का कोई व्यक्ति झूठ बोल ही नहीं सकता है। परसों यानी 25 अगस्त को वीरचंद जी की जयंती भी है। मैं वीरचंद जी को नमन करता हूँ।
देवियो और सज्जनो,
जैन धर्म भारत की सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का गौरव है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में हमारी सरकार ने भारत की जैन परंपरा और धरोहर को संरक्षित करने का कार्य किया है।
बीते कुछ वर्षों में, 20 से अधिक पूजनीय तीर्थंकरों की मूर्तियाँ जो कभी न कभी चोरी की गई थीं, विदेशों से भारत वापस लाई गई हैं।
भगवान महावीर ने अपनी शिक्षाओं के प्रचार के लिए प्राकृत भाषा को अपनाया था। हमारी सरकार ने प्राकृत भाषा को Classical Language का Status प्रदान किया है।
जब नया संसद भवन बना, तब प्रधानमंत्री मोदी जी ने यह सुनिश्चित किया है कि जैन धर्म की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को वहाँ विशेष स्थान मिले। नए संसद भवन में स्थापत्य गैलरी में ‘सम्मेद शिखर’ दिखता है। लोक सभा के प्रवेश द्वार पर पूजनीय तीर्थंकर की मूर्ति है। संविधान गैलरी की छत पर भगवान महावीर की पेंटिंग है। साउथ बिल्डिंग की दीवार पर सभी तीर्थंकरों के चित्र हैं।
जैन धर्म की महान विरासत केवल जैन समाज की विरासत नहीं है, यह पूरे भारत की विरासत है। इस विरासत का सम्मान भारत के पुनर्जागरण का प्रतीक है। यह इस बात का प्रतीक है कि भारत अपनी जड़ों से भी जुड़ा है और विकसित बनने की ओर भी आगे बढ़ रहा है।
देवियो और सज्जनो,
कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं, लेकिन समय की अपनी सीमाएं हैं। मैं एक बार फिर ‘वीरोदय अखिल भारतीय राष्ट्र प्रहरी सम्मान’ जैसी पहल के लिए ‘श्री विद्या समय विनय चातुर्मास समिति’ को बहुत बधाई देता हूँ। और अपनी बात समाप्त करता हूँ।
धन्यवाद।