Text of RM’s speech at the Foundation Day Event of Bhupal Nobels’ University, Udaipur.
‘भूपाल नोबल्स संस्थान’ के 103 वें स्थापना दिवस के इस खास मौके पर, आप सभी के बीच आकर मुझे संतोष और हर्ष दोनों का अनुभव हो रहा है। संतोष इसलिए कि कई महीनों से यहां आने का कार्यक्रम बन नहीं पा रहा था। आज यह संभव हुआ है, इसलिए संतोष का अनुभव हो रहा है। और हर्ष का अनुभव इसलिए क्योंकि मुझे छात्रों और युवाओं से संवाद करने में विशेष आनंद की अनुभूति होती है।
किसी भी संस्थान का Foundation Day केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि भविष्य में और भी बेहतर करने और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की प्रतिबद्धता को दोहराने का दिन भी है। मैं, इस संस्थान को, भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए अपनी शुभकामनाएं देता हूँ।
आपका यह स्थापना दिवस, एक शताब्दी से अधिक की सफल यात्रा का प्रतीक है। इसके लिए मैं इस संस्थान से जुड़े सभी लोगों को हार्दिक बधाई देता हूँ।
इस संस्थान की यात्रा, मात्र दो छात्रों और एक शिक्षक के साथ ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्स स्कूल’, के रूप में शुरू हुई थी। महाराणा भूपाल सिंह जी ने वर्ष 1947 में ही मेवाड़ में विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रयास भी किए थे।
हालांकि कुछ कारण वश, कई दशकों तक वह सपना पूरा नहीं हो पाया। लेकिन अथक प्रयासों के बाद, वर्ष 2016 में भूपाल नोबल्स विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ महाराणा भूपाल सिंह जी का स्वप्न साकार हुआ।
इसलिए जब आप इस विश्वविद्यालय का इतिहास देखते है तो आपको यह याद रखना चाहिए कि इसकी स्थापना में समय और धैर्य दोनों की परीक्षा हुई है। साथ ही यह आपको बताता है कि जब लक्ष्य तय कर लिया तो उसकी प्राप्ति तक न तो विचलित होना चाहिए, न टूटना चाहिए।
साथियों,
मुझे सार्वजनिक जीवन में बहुत से महत्वपूर्ण संस्थानों के कार्यक्रमों में जाने का मौका मिलता है। लेकिन मुझे सबसे सुखद अनुभव विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच जाकर होता है। इसलिए मैं हमेशा शिक्षण संस्थानों के कार्यक्रमों को बहुत प्राथमिकता देता हूँ। मैं स्वयं भी एक शिक्षक रहा हूं और मेरे भीतर का शिक्षक अभी भी जीवित है। राजनीति में तो आना एक संयोग रहा है। हमारे यहां कहते हैं कि फिसल पड़े तो हर गंगे। मेरा राजनीति में आना भी कुछ ऐसे ही हुआ है।
मेरे द्वारा विश्वविद्यालयों के कार्यक्रमों को प्राथमिकता देने का कारण यह है कि अन्य संस्थानों को चलाने के लिए जिस Human Resource की आवश्यकता होती है वह विश्वविद्यालयों में तैयार होता है।
इसलिए विश्वविद्यालयों को, Institutions of Institutions भी कहा जा सकता है। यानि अन्य संस्थानों को चलाने के लिए जरूरी मानव संसाधन को, तराशने वाले संस्थान हैं, हमारे शिक्षण संस्थान।
साथियों,
मुझे बताया गया है कि भूपाल नोबल्स यूनिवर्सिटी के Vision में भी ऐसी शिक्षा प्रदान करने की बात की गई है जिससे विद्यार्थी आत्मनिर्भर बन सकें। आत्मनिर्भर होना जीवन की एक बड़ी उपलब्धि होती है। आत्मनिर्भरता से मनुष्य में मान, सम्मान, स्वाभिमान की भावना भी बलवती होती है। आज हम भारत को आत्मनिर्भर करने के लिए काम कर रहे हैं। इसके पीछे यही भाव है।
इस संस्थान का नाम मेवाड़ के महाराणा श्री भूपाल सिंह जी के नाम पर है। महाराणा श्री भूपाल सिंह जी सिर्फ एक शासक नहीं थे, बल्कि वे एक शिक्षाविद् भी थे। उन्होंने चित्तौड़ में हिंदी विश्वविद्यालय, उदयपुर में कृषि महाविद्यालय तथा कई अन्य स्कूल स्थापित किए। उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए भी अनेक स्कूल स्थापित किए। वर्ष 1940 तक उनके प्रयासों से, राज्य में साक्षरता को दस गुना तक बढ़ा दिया था।
महाराणा भूपाल सिंह जी एक सच्चे देशभक्त भी थे। आजादी के बाद जब 565 रियासतों के भारत में विलय की बात आई तब महाराणा भूपाल सिंह जी ने साफ शब्दों में कहा था “I am with India.” उनके लिए सबसे पहले देश का भाव बहुत महत्व रखता था।
साथियों,
महाराणा भूपाल सिंह जी के लिए जीवन में शौर्य और राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि थे। वे ऐसे लोगों के साथ भोजन करते थे जिनके पूर्वजों और परिजनों ने मेवाड़ के महाराणाओं के नेतृत्व में मुगलों के विरुद्ध युद्ध किया और मातृभूमि के लिए वीरतापूर्वक अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह कार्य भूपाल सिंह जी द्वारा, देश के लिए लड़ने और बलिदान देने वाले वीरों के प्रति गहन सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक था।
इसी तरह से हमारी Armed Forces में बड़ा खाना करने की एक परंपरा है। रक्षा मंत्री के रूप में जब मैं सशस्त्र बलों के “बड़ा खाना” कार्यक्रम में सम्मिलित होता हूँ तो मुझे विशेष कृतज्ञता, आत्मीयता और प्रसन्नता का अनुभव होता है। इस कार्यक्रम में, मैं बिना किसी Protocol या औपचारिकता के सेना के जवानों और अधिकारियों के साथ बहुत ही सहज वातावरण में बात कर पाता हूँ। उनके जीवन के अनुभवों को और निकटता से जान पाता हूँ। सैनिकों के साथ बिताये हुए ये पल मेरे लिए हमेशा बहुत ही खास होता है।
साथियों,
आज का भारत अपने अतीत पर गर्व करता है। अपनी परंपराओं का सम्मान करता है। अपनी महान सांस्कृतिक विरासत को समझता है। भारत की धरती ने चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, माधव, पाणिनि, पतंजलि, नागार्जुन, पिंगल, मैत्रेयी, गार्गी तथा तिरुवल्लुवर जैसे महान विद्वानों को जन्म दिया है। भारत ने दुनिया को श्रेष्ठ वैज्ञानिक, गणितज्ञ, डॉक्टर ही नहीं दिए बल्कि महान संत और दार्शनिक भी दिए हैं।
प्राचीन काल से ही Indian Knowledge System, असाधारण रूप से समृद्ध और अद्वितीय रहा है। इसमें आस्था और विज्ञान, लौकिक और आध्यात्मिक, कर्म और धर्म, तथा भोग और त्याग के बीच एक अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। यही संतुलन भारतीय चिंतन को बौद्धिक के साथ जीवन उपयोगी भी बनाता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, भारत की शिक्षा व्यवस्था में इसी दृष्टि के साथ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं। यह नीति Indian Knowledge System को शिक्षा के केंद्र में स्थापित करती है। और हमारी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के पुनर्जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है। आधुनिक ज्ञान को पारंपरिक विवेक से जोड़ती है। Multidisciplinary और Interdisciplinary समझ को बढ़ाने का रास्ता खोलती है। और समकालीन सामाजिक चुनौतियों के समाधान हेतु एक समग्र दृष्टिकोण विकसित करने के लिए आधार प्रदान करती है।
साथियों,
हम सभी इस बात से सहमत होंगे कि किसी भी सशक्त और प्रभावी शिक्षा व्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ शिक्षक होते हैं। वर्ष 2018 में प्रकाशित एक Report के अनुसार भारत में बहुत अधिक अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षक बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इस अध्ययन के अनुसार, भारत में 54 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे शिक्षक बनें। इसका कारण स्पष्ट है- भारत में शिक्षक को सदैव सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। यहाँ तक की उनकी तुलना भगवान से की जाती है।
भारत में सबसे बड़े सामाजिक परिवर्तनों के जनक शिक्षक रहे हैं—चाहे वह स्वामी दयानंद सरस्वती हों या स्वामी विवेकानंद। उन्होंने समाज की चेतना को जागृत किया, राष्ट्र को दिशा दी। यही हमारी परंपरा है और यही हमारी शक्ति। जब समाज शिक्षक को सम्मान देता है, तभी शिक्षा राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनती है।
इसलिए शिक्षकों को सशक्त, सक्षम और स्वायत्त बनाने के लक्ष्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। क्योंकि हमारा मानना है कि सशक्त शिक्षक- सशक्त भारत के माध्यम हैं।
साथियों,
भारत में शिक्षा केवल पाठ्यक्रम और परीक्षाओं तक सीमित नहीं रही है। हमारी शिक्षा प्रणाली, वेदों की मौखिक परंपरा से लेकर नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों तक, आत्मबोध, जिज्ञासा और समाज-निर्माण की यात्रा रही है।
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में ही आकार लेता है। आज की शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं हो सकता है, बल्कि इसका उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना होना चाहिए जो विचारशील हों, संवेदनशील हों और देश का नेतृत्व करने में सक्षम हों।
इसी सोच को दिशा देने के लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनायी गई है। यह नीति Rote Learning से आगे बढ़कर Multidisciplinary Education, Critical Thinking, और Innovation पर बल देती है। इसका उद्देश्य ऐसे युवा तैयार करना है जो समस्याओं से डरें नहीं, बल्कि उनका समाधान खोजें; जो भारत की प्रगति के सिर्फ़ सहभागी ही नहीं, वाहक भी बनें।
साथियों,
पिछले 11 वर्षों में, हमारे देश में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2014-15 में देश में 51,000 से अधिक उच्च शिक्षा के संस्थान थे जो जून 2025 तक बढ़कर 70,000 से अधिक हो गए हैं। पिछले 11 सालों में IIT, AIIMS, IIM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की संख्या में वृद्धि हुई है।
आज हमारे विश्वविद्यालय, कुशल मानव संसाधन तैयार करने के साथ-साथ, विश्व भर में ख्याति और प्रसिद्धि भी प्राप्त कर रहे हैं। दुनिया भर में टॉप यूनिवर्सिटीज की रैंकिंग बनाने वाली संस्था क्यूएस ग्लोबल रैंकिंग 2026 में शामिल भारत के विश्वविद्यालयों की संख्या में 2015 के मुकाबले पांच गुना वृद्धि हुई है। वर्ष 2015 में जहां इस रैंकिंग में देश के केवल 11 संस्थानों को जगह मिली थी, वहीं 2026 की रैकिंग में यह संख्या 54 हो गई है। भारत से सर्वाधिक 8 नए विश्वविद्यालयों को पहली बार रैंकिंग में स्थान दिया गया है। यह अपने आप में ही एक बड़ी उपलब्धि है।
मित्रों,
हमारी संस्कृति में ज्ञान और विद्या को प्रतिभा के साथ-साथ चरित्र निर्माण से भी जोड़ा जाता है। हितोपदेश में कहा गया है- “विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥” अर्थात विद्या से विनय आता है, विनय से योग्यता, योग्यता से समृद्धि, समृद्धि से धर्म और अंततः धर्म से सच्चा सुख मिलता है। यही शिक्षा की पूर्ण यात्रा है।
कोई भी शिक्षा व्यवस्था, जो इस उद्देश्य को पूरा नहीं करती—जो ज्ञान के साथ विनय, चरित्र और धर्मबोध नहीं देती-उसे सफल नहीं कहा जा सकता। क्योंकि धर्म और नैतिकता से विहीन शिक्षा समाज के लिए उपयोगी नहीं, बल्कि कभी-कभी घातक भी सिद्ध हो जाती है।
शायद यही कारण है और बहुत बड़ी विडंबना है कि बहुत शिक्षित लोग भी आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाए जाते हैं। आज ‘White Collar Terrorism’ जैसी चिंताजनक प्रवृत्तियाँ सामने आ रही हैं, जहाँ अत्यंत शिक्षित लोग, समाज और राष्ट्र के विरुद्ध कार्य करते हैं। पिछले दिनों जब एक आतंकी माड्यूल पकड़ा गया तो उसमें डॉक्टर्स का शामिल होना यह बताता है कि केवल डिग्री लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि संस्कार भी चाहिए। वरना जो डॉक्टर पर्चे पर हमेशा Rx लिखते है, वो RDX कैसे लिख सकते है।
यह हमें आत्ममंथन के लिए विवश करता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल Professional Success नहीं, बल्कि सदाचार, नैतिकता और एक मानवीय व्यक्तित्व का निर्माण भी है। यही भारतीय शिक्षा दर्शन की मूल आत्मा है जिससे समाज में समरसता और शांति बढ़ती है। हमारा प्रयास है कि हम भारतीय शिक्षा के मूल स्वरूप को बनाए रखते हुए, उसे नए युग के साथ तालमेल बिठाने लायक भी बनाए।
साथियों,
आज हम 4th Industrial Revolution के साक्षी बन रहे हैं। इसके कारण बहुत तेजी से टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में बदलाव आ रहे हैं। इस Revolution के कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और अन्य नई तकनीकें हमारे जीवन और काम करने के तरीकों को पूरी तरह बदल रही हैं। हमें इन तकनीकों का सकारात्मक उपयोग करके भारत के विकास को नई गति प्रदान करनी है।
भारत इन New Technologies में तभी प्रगति कर सकता है, जब हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में R&D एवं Innovation को बढ़ावा दें। इन तेज़ी से बदलते नवाचारों के बारे में लगातार जानना, पढ़ना और उन्हें अपनाना होगा। इसके लिए हमें लगातार सीखने की प्रकृति अपनानी होगी।
मैं मानता हूँ कि एक दीपक, जिसकी अपनी लौ ही बुझी हुई हो, दूसरे दीपक को प्रकाशित नहीं कर सकता है। ठीक उसी तरह, जो व्यक्ति स्वयं सीखना बंद कर देता है, वह न तो नवाचार कर सकता है, न समाज को बेहतर बना सकता है। वह केवल पुरानी, नीरस और अप्रासंगिक बातें ही दोहरा सकता है।
अक्सर लोग औपचारिक शिक्षा समाप्त होते ही, सीखने की प्रक्रिया की भी समाप्ति मान लेते हैं—जो एक बड़ी भूल है। तर्कशक्ति और रचनात्मकता के विकास के लिए निरंतर अध्ययन अनिवार्य है। यह बात केवल विद्यार्थियों पर ही नहीं, बल्कि शिक्षकों पर भी लागू होती है।
इसलिए मेरा यहाँ सभी उपस्थित शिक्षकों और विद्यार्थियों से अनुरोध है कि अपने अंदर के विद्यार्थी को हमेशा जीवित रखें। नए-नए प्रयोग करें, ताज़ा शोध पत्र पढ़ते रहें और स्वयं को निरंतर अपडेट रखें।
साथियों,
आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ Knowledge, Data और Information की कमी नहीं है। लेकिन Wisdom की कमी है। अक्सर कहा भी जाता है Data is not information, information is not knowledge, knowledge is not understanding, understanding is not wisdom.
साथ ही आज पूरी दुनिया के सामने Climate Change, Public Health, Governance और Digital Ethics जैसी समस्याएं हैं, जो Borderless तो हैं ही, साथ ही, किसी भी एक Discipline द्वारा इनका समाधान नहीं ढूंढा जा सकता है। सभी Disciplines के संयुक्त प्रयास ही समाधान ढूँढने में मददकारी हो सकते हैं।
विद्यार्थियों में Critical, Independent और Ethical Thinking के विकास के बिना हम 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएंगे। इसलिए, आज विश्वविद्यालयों की भूमिका विद्यार्थियों को सिर्फ यह सिखाने की नहीं है कि ‘क्या सोचना है?’, बल्कि यह सिखाने की है कि ‘कैसे सोचना है?’ इसलिए विश्वविद्यालयों को ऐसा वातावरण प्रदान करना होगा जहाँ विद्यार्थी Disciplines के Silos को तोड़कर Holistic तरीके से सोच पायें।
साथ ही, विश्वविद्यालयों में की जा रही Research का अंतिम लक्ष्य सिर्फ Journals में Publish होने तक सीमित नहीं हो सकता है। Research का अंतिम लक्ष्य धरातल पर, उपयोगी परिवर्तन लाना होना चाहिए। चाहें वो Policy बनाने में हो, Start-ups और नई Industry बनाने में हो। या अन्य किसी भी प्रकार से किसी सामाजिक समस्या का समाधान ढूँढने में।
इसलिए, विश्वविद्यालयों को ऐसी Solution Driven Research को बढ़ावा देना चाहिए, जो स्थानीय ज़मीनी हकीकत से भी जुड़ी हुई हो और Global Standards पर भी खरी उतरे।
साथियों,
आज, भारत एक Knowledge Economy के रूप में उभर रहा है। Global Innovation Index में जहां 2014 में भारत की Rank 76 थी, वह 2024 में सुधर कर 39 हो गई है। डिजिटल अर्थव्यवस्था का National Income में योगदान बढ़ा है। 1.59 लाख स्टार्टअप्स के साथ, भारत अब विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। यह सब परिवर्तन संभव हुआ है, Strong Institutional Frameworks और Visionary Policy Reforms के कारण।
विश्वविद्यालय भी इस परिवर्तन के केंद्र में हैं। Startups, Innovation Ecosystems, Public Policy और Governance—इन सभी क्षेत्रों में आज विश्वविद्यालय, Nation-building Spaces के रूप में उभर रहे हैं। आज के विद्यार्थी केवल Knowledge के Passive Receivers नहीं हैं; वे Ideas, Research और Innovation के Co-creators हैं। इसलिए हमें भारत की इस युवा पीढ़ी को वह ताकत देनी है, जो एक विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए काम कर सके।
साथियों,
आज भारत, दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हम 2030 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहे हैं। इस गति को बनाए रखने के लिए हमें Skilled Human Resource में संस्कारित व्यक्तियों की भी आवश्यकता है, और इसमें विश्वविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक बार स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मुझे यदि मेरे जैसे 100 व्यक्ति मिल जायें तो मैं भारत की तस्वीर बदल सकता हूं।
स्वामी विवेकानंद जैसी प्रतिभा और क्षमता कम लोगों में होती है, फिर भी मैं मानता हूं कि हमारे देश की युवा शक्ति, एक साथ मिलकर स्वामी विवेकानंद के स्वप्न को साकार करने का सामर्थ्य रखती है। इसी आशा और विश्वास के साथ कि जब आप विश्वविद्यालयों से निकल कर समाज में काम करेंगे तो आपकी आंखों में यही एक सपना पल रहा होगा कि हमें 2047 तक विकसित भारत का निर्माण करना है, जो धनवान भी हो, शक्तिमान भी हो और ज्ञानवान भी हो। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना निवेदन समाप्त करता हूं।
धन्यवाद!