हमारे संत सदियों से भारतीय सांस्कृतिक धारा के संरक्षक रहे हैं: रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह

आज, गुरुदेव स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज के, विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा, और मूर्ति स्थापना समारोह में, आप सबके बीच आकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। सबसे पहले, मैं इस पावन भूमि को नमन करता हूँ, माँ गंगा को नमन करता हूँ, उन ऋषियों को नमन करता हूँ, जिनकी तपस्या से भारत की आत्मा आज तक जीवित है। मैं, पूज्य स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज का पुण्य स्मरण करता हूँ, उन्हें नमन करता हूँ।

साथियों, भले ही स्वामी जी, अब देह रूप में हमारे बीच नहीं हैं, फिर भी उनकी साधना, उनका तप और उनका विचार, आज भी हमारे बीच जीवित है। उनकी प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा, उस चेतना को फिर से जाग्रत करने का प्रयास है, जिसे उन्होंने अपने पूरे जीवन में जिया है। आज यह दायित्व उनके ही शिष्य, पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज निभा रहे हैं। यह कितना सुखद है, कि एक गुरु की परंपरा को उनके शिष्य आगे बढ़ा रहे हैं। मुझे लगता है, कि गुरु-शिष्य परम्परा की यह बड़ी सुंदर अभिव्यक्ति है, जो आज इस युग में, हमें देखने को मिल रही है।

मुझे जब भी अवसर मिलता है, मैं पूज्य संतों के सान्निध्य में जाता हूँ। लेकिन उसमें भी विशेषकर, जब मैं हरिद्वार की पुण्यभूमि पर आता हूँ, तो यहाँ आते ही, मुझे एक प्रकार की दिव्यता का अनुभव होता है। हरिद्वार भारतीय चेतना का एक सजीव, स्पंदनशील केंद्र है। यह वह स्थान है, जहाँ गंगा मैया पर्वतों को पार कर मैदानों में प्रवेश करती हैं। यहाँ की हवा में व्याप्त आध्यात्मिकता, घाटों पर गूंजते मंत्र, साधु-संतों की तपस्या, और करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था, अपने आप में यह बताने के लिए पर्याप्त है, कि हरिद्वार भारत की सांस्कृतिक धारा का उद्गम स्रोत है। ऐसी भूमि पर आप सभी संतों के बीच आना, मेरे लिए गौरव का विषय है।

साथियों, आज जब मैं आपके बीच उपस्थित हुआ हूँ, तो एक श्रद्धालु होने के साथ-साथ, मैं देश के रक्षा मंत्री के रूप में भी आपके बीच उपस्थित हुआ हूँ। स्वाभाविक है, यह प्रश्न उठ सकता है, कि एक रक्षा मंत्री का, संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों से क्या संबंध है? आमतौर पर तो यही माना जाता है, कि रक्षा मंत्री का दायित्व केवल सीमाओं, सेनाओं और राष्ट्र की सुरक्षा तक सीमित है। यह बात एक तरह से सही भी है। लेकिन मेरा मानना है, कि राष्ट्र की सुरक्षा का अर्थ, केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं की रक्षा नहीं है। एक राष्ट्र की सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा, एक राष्ट्र की सभ्यतागत चेतना की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। एक राष्ट्र तब तक सुरक्षित नहीं कहला सकता, जब तक उसकी सांस्कृतिक नींव, उसके मूल्य, और उसकी पहचान सुरक्षित नहीं है। इतिहास गवाह है, कि जिन राष्ट्रों ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर होने दिया, वे चाहे कितने भी सैन्य शक्ति सम्पन्न क्यों न रहे हों, अंततः विघटित हो गए।

हमारी भारतीय संस्कृति कोई संग्रहालय में रखी प्राचीन वस्तु नहीं है। यह एक सजीव, विकासशील, और समावेशी शक्ति है। यह वह दर्शन है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” कहलाता है। यह वह जीवन पद्धति है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य सिखाती है। यह वह ज्ञान परंपरा है, जिसने शून्य दिया, आयुर्वेद दिया, योग दिया और विश्व को जीवन जीने की कला सिखाई।

लेकिन साथियों, आज यह संस्कृति, यह हमारा रक्षा कवच, एक अदृश्य युद्ध के मैदान में है। आज इस पर कई प्रकार के हमले हो रहे हैं। हमारी युवा पीढ़ी, अपने स्थानीय त्योहारों, भाषाओं और कलाओं से दूर हो रही है। एक ग्लोबल कल्चर की चकाचौंध हमारी सांस्कृतिक विविधता को धुंधली कर रही है।

हमारे गौरवशाली इतिहास, और महान विभूतियों को, जान-बूझकर विकृत किया जा रहा है, उपेक्षित किया जा रहा है। हमें अपने नायकों से विमुख करने का, एक सुनियोजित प्रयास दशकों से चल रहा है।

ऐसे में हमारे लिए, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ओर आगे बढ़ना एक अनिवार्यता बन जाती है। इसके लिए समाज में, आप सभी संतों से योग्य हमें कोई नहीं मिलेगा। आप सभी, भारत के सांस्कृतिक योद्धा हैं।

आप सभी संत और आचार्य, इस पुनर्जागरण के केन्द्र में हैं। आप सदियों से इस देश की सांस्कृतिक धारा के संरक्षक रहे हैं। आज जब भौतिकता का अंधकार फैल रहा है, तब आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता और अधिक है। आज जरूरत है, कि हमारे संत, राष्ट्र की युवा शक्ति से अपना संवाद और अधिक बढ़ाएं। आज जरूरत है कि हमारे संत, आधुनिक माध्यमों का उपयोग करके, सनातन ज्ञान को सरल और प्रासंगिक रूप में प्रस्तुत करें। आज जरूरत है कि हमारे संत,  सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के प्रबल प्रचारक बनें। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत, उसकी एकता में है, और इस सिद्धांत को, आपसे बेहतर कोई समझा नहीं सकता।

अब हमें राष्ट्रवाद से भी ऊपर उठकर, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर देखना होगा। भारत की विशेषता यही रही है, कि यहाँ राष्ट्र की कल्पना तलवार या सत्ता से नहीं बनी। यहाँ राष्ट्र ऋषियों की कुटिया से निकला, आश्रमों से निकला, गुरु और शिष्य के संवाद से निकला। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, कच्छ से लेकर कामरूप तक, भारत अगर एक है, तो सिर्फ इसलिए, क्योंकि हमारे संतों ने सदियों के प्रयास से इस भूमि को जोड़ा है।

हमारी संत परंपरा इस देश की सबसे बड़ी शक्ति रही है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य को ही देख लीजिए। बेहद कम आयु में उन्होंने पूरे देश में भ्रमण किया। काशी गए, कांची गए, बद्री गए, द्वारका गए। हर जगह जाकर लोगों से बात की, सवाल सुने, तर्क किए। उन्होंने किसी पर अपनी बात थोपी नहीं। उन्होंने संवाद किया। यही कारण है, कि अद्वैत वेदांत एक जीवन दृष्टि बन गया।

फिर रामानुजाचार्य जी आए, तो उन्होंने भक्ति के माध्यम से लोगों को समरसता का पाठ पढ़ाया। फिर माधवाचार्य जी आए। उनका दृष्टिकोण अलग था। उन्होंने द्वैत की बात कही। रास्ता अलग था, लेकिन गंतव्य एक ही था। इसके बाद कबीर आए। उन्हें भले ही शास्त्रों का ज्ञान नहीं था, लेकिन उन्होंने लोक की भाषा में लोगों से संवाद किया। गुरु नानक देव जी ने, इस भाव को यात्राओं के ज़रिये आगे बढ़ाया। उन्होंने अध्यात्म को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ा। महाराष्ट्र में संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर ने वही चेतना समाज में जगाई। पूर्वी भारत में चैतन्य महाप्रभु आए। उन्होंने भक्ति को उत्सव बना दिया। भारत की संत परंपरा को अगर एक वाक्य में समझना हो, तो कहा जा सकता है, कि यह अलगअलग शब्दों में बोला गया एक ही सत्य है। समय बदला, समाज बदला, भाषा बदली, लेकिन उसका तत्व, एक ही रहा।

अब यह तत्व क्या है? तत्व यह समझना है, कि जो मेरे सामने उपस्थित है, वह मुझसे अलग नहीं है। उसके भीतर भी वही चेतना है, जो मेरे भीतर है। जब यह भाव मन में उतरता है, तो टकराव अपने आप कम हो जाते हैं। फिर सामने वाला “दूसरा” नहीं रह जाता। फिर संवाद संभव होता है, सह-अस्तित्व संभव होता है।

यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल है। यह राष्ट्रवाद ज़मीन से शुरू होकर चेतना तक जाता है। यह दूसरों को अलग नहीं करता, बल्कि उनसे अंतर्मन को जोड़ता है। आज के समय में, जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है, जब पहचान को लेकर भ्रम पैदा हो रहा है, तब भारत की संत परंपरा हमें स्थिरता देती है। यह हमें याद दिलाती है,  कि हमारी जड़ें कितनी गहरी हैं, और हमारा आकाश कितना व्यापक है।

आज के समय में यह बात और भी ज़रूरी हो जाती है। जब दुनिया तेज़ी से बदल रही है, जब पहचान को लेकर भ्रम पैदा हो रहा है, तब भारत की संत परंपरा हमें स्थिरता देती है। यह हमें बताती है कि आधुनिक बनने का यह अर्थ नहीं है, कि आप अपनी जड़ों से ही अलग हो जाएँ। यह हमें सिखाती है, कि आगे बढ़ते हुए भी, अपनी आत्मा को बचाया जा सकता है। सोचिए, अगर शंकराचार्य केवल एक क्षेत्र तक सीमित रहते, अगर भारत के सारे संत केवल अपने आश्रमों तक सीमित रहते, तो क्या भारत आज ऐसा होता? हमारे संतों ने पूरे देश को अपना घर माना, तभी हम एक रह पाए। तभी हमारी संस्कृति बची रह पाई। यही भाव हमें आज भी चाहिए। आज हमें अपनी संस्कृति और राष्ट्र, दोनों को बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रखने की जरूरत है।

साथियों, जब हम सनातन संस्कृति और राष्ट्र रक्षा की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि ये दोनों अलग-अलग विषय नहीं हैं। जैसे शरीर और प्राण है, कि एक के बिना दूसरा अधूरा है, वैसे ही सनातन और राष्ट्र, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। सनातन संस्कृति हमें जीवन जीने का भाव देती है, और राष्ट्र उस जीवन को सुरक्षित, संगठित और सशक्त रूप देता है।

किसी भी राष्ट्र का भविष्य तभी सुरक्षित होता है, जब उसकी युवा पीढ़ी अपने अतीत को समझती हो, अपने मूल्यों को पहचानती हो और उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ती हो।

मैं मानता हूँ कि संस्कृति हमें जीवन जीने की दिशा देती है। हमें सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाती है। हमारे सामाजिक कर्तव्यों का बोध कराती है। हमारा इतिहास और परंपराएँ हमें आत्मविश्वास देती हैं। आध्यात्मिक मूल्य मनुष्य को नैतिकता और संवेदनशीलता देते हैं। इसलिए यदि विकास केवल तकनीक और अर्थव्यवस्था के स्तर तक ही सीमित रह जाए और संस्कृति से कट जाए, तो वह खोखला हो जाता है।

यह भी कहा जा सकता है कि संस्कृति का ज्ञान उतना ही आवश्यक है, जितनी आधुनिक शिक्षा और कौशल-विकास। क्योंकि Guided Missiles बनाने के लिए आधुनिक शिक्षा चाहिए, और व्यक्ति को Misguided होने से बचाने के लिए, संस्कार और संस्कृति चाहिए।

इसलिए हम कहते हैं “विकास भी, विरासत भी”। एक ओर जहां आधुनिक भारत, infrastructure का निर्माण कर रहा है, तकनीक के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, startup खड़े कर रहा है, आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर भारत की सांस्कृतिक चेतना को भी नई ऊर्जा मिल रही है।

साथियों, यदि हम अपने शास्त्रों की ओर नज़र डालें, तो हमारे शास्त्र भी हमें यही बताते हैं। हमारे शास्त्र और ग्रंथ कभी भी हमें कठिन और बोझिल दर्शन नहीं सिखाते। वे जीवन को सरल, करुणामय और लोकहित से जोड़ते हैं। सनातन परंपरा का मूल यही है कि व्यक्ति अकेले नहीं जीता, वह समाज के लिए जीता है। और समाज मिलकर राष्ट्र बनाता है। इसलिए हमारे ग्रंथों में धर्म और राष्ट्र की रक्षा को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही भाव से देखा गया है।

सनातन संस्कृति हमें यही सिखाती है, कि व्यक्ति का कल्याण समाज से जुड़ा है, और समाज की मजबूती राष्ट्र की रक्षा में निहित है। इसी धर्मध्वजा को लेकर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी महाराज चले थे, और आज उसी परंपरा को, अवधेशानंद गिरी जी महाराज आगे बढ़ा रहे हैं।

साथियों, आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ हमारे लिए राष्ट्र रक्षा और सनातन संस्कृति दोनों ही जरूरी हैं। हमें शक्ति और शील दोनों की आवश्यकता है। शक्ति सीमाओं की रक्षा के लिए, और शील संस्कृति की रक्षा के लिए। जब शक्ति और शील एक साथ चलते हैं, तभी राष्ट्र महान बनता है।

साथियों, हमारे प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारतीय ज्ञान परंपरा को भी बहुत बल मिला है। जैसे, आप देखिये, कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से, भारत की आध्यात्मिक परंपरा, आज विश्व को मार्गदर्शन दे रही है। भारतीय भाषाओं, ग्रंथों और परंपराओं पर नए सिरे से विमर्श हो रहा है। आज दुनिया आयुर्वेद का महत्व समझ रही है। यह सब एक व्यापक सांस्कृतिक जागरण का संकेत है।

आज हम अतीत से आशंकित नहीं हैं। वर्तमान के प्रति आत्मविश्वासी हैं। और भविष्य के प्रति भयभीत नहीं, बल्कि आशावादी हैं। हमारे युवा मान रहे हैं, कि आधुनिकता और संस्कृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

जब युवा अपनी विरासत पर गर्व करते हुए,  आधुनिक ज्ञान का प्रयोग करके, विकसित भारत के संकल्प की सिद्धि के लिए आगे बढ़ेंगे, तब ही भारत का पुनर्जागरण होगा।  किसी भी भवन की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है। यदि नींव कमजोर हो, तो ऊंची इमारत भी ढह जाती है। इसी प्रकार जीवन रूपी भवन की नींव है – हमारे विचार और आचरण।

यदि विचार शुद्ध नहीं हैं, तो आचरण कभी शुद्ध नहीं हो सकता। और यदि आचरण अशुद्ध है, तो जीवन में सुख, शांति और प्रगति नहीं आ सकती है। शुद्ध विचार और शुद्ध आचरण ही अच्छे जीवन की आधारशिला हैं। यह सत्य केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह परिवार पर लागू होता है, समाज पर लागू होता है, राष्ट्र पर लागू होता है, और विश्व में सभी पर लागू होता है।

मैं इस मंच से, देश के युवाओं से यह कहना चाहूँगा, कि आप इस राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति हैं। आपके हाथों में देश का भविष्य है। राष्ट्र निर्माण के लिए, आपको तीन चीज़ें ध्यान में रखकर चलना होगा। पहला-चरित्र, क्योंकि बिना चरित्र के कोई भी शक्ति टिकाऊ नहीं होती। दूसरा-कौशल, क्योंकि आधुनिक दुनिया में ज्ञान और तकनीक आवश्यक हैं। और तीसरा-कर्तव्यबोध, क्योंकि अधिकार तभी सार्थक होते हैं, जब उनके साथ दायित्व जुड़ा हो। यदि हमारे युवा, इन तीनों को अपने जीवन में उतार लें, तो भारत को कोई भी ताकत कमजोर नहीं कर सकती। आप तकनीकी ज्ञान से लैस हों, आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें, लेकिन अपने सांस्कृतिक मूल्यों को कभी न भूलें। अपने चरित्र को ऊँचा रखें। अपने जीवन में अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी जैसे मूल्यों को लाएँ, और राष्ट्र निर्माण में अपनी ऊर्जा लगाएं।

समाज में शिक्षक, विद्यार्थी, किसान, सैनिक या नागरिक, जिस भी रूप में, जो भी भूमिका हमें मिली है, उसे राष्ट्रधर्म समझकर निभाएँ। जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य को यज्ञ मान लेता है, तब राष्ट्र स्वतः ही सशक्त हो जाता है। यही सनातन संस्कृति का संदेश है, और यही राष्ट्र रक्षा का आधार है।

अंत में, मैं यही कहना चाहूंगा कि सनातन संस्कृति और राष्ट्र रक्षा का यह पवित्र बंधन ही हमारी शक्ति का स्रोत है। यह हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए।  आइए, हम सभी इस पवित्र भूमि के प्रति, हमारी सनातन विरासत के प्रति, और हमारे वीर सैनिकों के प्रति, कृतज्ञता का भाव रखते हुए, यह संकल्प लें कि हम, व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से राष्ट्र की एकता, अखंडता, संप्रभुता और सांस्कृतिक गौरव की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहेंगे। हम अपने अंदर उसी वीरता, त्याग और बलिदान की भावना को जाग्रत करेंगे, जिसने इस देश को सदियों तक गौरवान्वित किया।

मैं पूरे हृदय से अवधेशानंद गिरि जी महाराज का आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने इस आयोजन को भाव, विचार और दिशा दी। ऐसे संतों का मार्गदर्शन समाज को संतुलन देता है। इस अवसर पर उपस्थित सभी श्रद्धालुओं, आयोजकों और समाज के उन सभी लोगों का भी आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने इस क्षण को सार्थक बनाया।

आप सभी इसी प्रकार, भारत की सांस्कृतिक आत्मा के रक्षक, तथा संवर्धक की भूमिका निभाते रहेंगे। इसी विश्वास के साथ, मैं हमारे संतों के चरणों में प्रणाम निवेदित करते हुए, अपना निवेदन समाप्त करता हूँ।

धन्यवाद।