भारत ड्रोन निर्माण का ग्लोबल हब बनेगा: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

Text of RM’s speech at the National Defence Industries Conclave in New Delhi.

सबसे पहले तो, मैं ‘Department of Defence Production’ को, ‘Advanced Manufacturing technologies’ जैसे important’ और relevant विषय पर conclave आयोजित करने के लिए बधाई देता हूँ।

वैसे तो इस तरह के dialogue, हमेशा ही अत्यंत उपयोगी रहे हैं; पर आज के समय में ऐसे संवाद, और भी उपयोगी हो गए हैं। जब policies बनाने वाले लोग, Industries से जुड़े लोग, start-ups से जुड़ा youth, Academia से जुड़े researchers एक साथ बैठते हैं, तब कई नए ideas जन्म लेते हैं।

अभी थोड़ी देर पहले, मुझे exhibition देखने का अवसर मिला। वहाँ मैंने अलग-अलग MSMEs, और innovators द्वारा विकसित किए गए, कई नए products और technologies को देखा। मुझे यह देखकर अच्छा लगा, कि हमारी small और medium industries, नई सोच और नई तकनीकों के साथ आगे बढ़ रहे हैं, और देश को आत्मनिर्भर बनाने में, अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

आज 100 से अधिक challenges के साथ, ‘Defence India Start-up Challenge’ का 14th edition भी जारी किया गया। DISC की अब तक की सफलता को देखते हुए, 100 से अधिक challenges, पहली बार हमारी DPSUs द्वारा दिए जा रहे हैं। मैं सभी innovators को, DISC के नए edition के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ।

साथियों, इस conclave का जो मुख्य लक्ष्य है, वह यही है, कि हम इस दिशा में सोचें, कि कैसे हमारे MSMEs को, defence manufacturing value chain के साथ, और अधिक जोड़ा जा सके। क्योंकि जब छोटे उद्योग, बड़े defence programmes का हिस्सा बनेंगे, तभी हम innovation की गति को तेज कर पाएँगे।

यदि हम थोड़ा पीछे जाकर देखें, तो स्पष्ट होता है कि MSMEs का concept भारत में कोई नया नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें हमारी traditional rural economy से गहराई से जुड़ी रही हैं। उन्नीसवीं सदी तक भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः आत्मनिर्भर गाँवों पर आधारित थी, जहाँ आजीविका के अधिकांश साधन स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध थे। गाँवों में छोटे उद्योग, कारीगरी और ग्रामोद्योग की सशक्त परंपरा थी, जिसने economy को लंबे समय तक स्थिर और मजबूत बनाए रखा।

ग्रामीण जीवन में अधिकांश जरूरतें, जैसे अनाज, दालें, कपड़े और दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुएँ, गाँव के भीतर ही पूरी हो जाती थीं, जिससे बाहरी निर्भरता बहुत कम थी। यह दिखाता है, कि उस समय की व्यवस्था कितनी संतुलित और संगठित थी।

कपड़े बनाने की हमारी कला इतनी उन्नत थी, कि भारतीय कपड़ों की पहचान दुनिया भर में थी। कई विदेशी यात्रियों ने लिखा है, कि भारत में इतने महीन कपड़े बनाए जाते थे, कि अच्छे-खासे length वाले कपड़ों को मुट्ठी भर में समेटा जा सकता था। इसी तरह यदि हम metallurgy की बात करें, तो भारत की यह परंपरा भी काफी समृद्ध रही है। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण दिल्ली में स्थित Iron Pillar है। सदियों बीत जाने के बाद भी, यह स्तंभ जंग से मुक्त खड़ा है।

लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदलने लगीं। जैसे-जैसे modern era की शुरुआत हुई, नए-नए inventions सामने आए, और industrial development की गति बढ़ने लगी। steam engine, electricity, और modern transport systems के विकास ने, आर्थिक गतिविधियों का स्वरूप बदलना शुरू कर दिया। Production का स्तर, national और global level तक फैलने लगा।

इस बदलाव के साथ, large-scale production, और global markets की अवधारणा सामने आई। Industries का विस्तार हुआ, technology का उपयोग बढ़ा, और आर्थिक गतिविधियाँ अधिक व्यापक हो गईं। लेकिन इन सभी बदलावों के बावजूद, छोटे उद्योगों और local entrepreneurs की भूमिका कमतर नहीं हुई। वो कल जितने important थे, आज भी उतने ही important हैं, और भविष्य में भी उतने ही महत्त्वपूर्ण रहेंगे। चाहे अर्थव्यवस्था कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, MSMEs हमेशा innovation, रोजगार सृजन और स्थानीय आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण आधार बने रहते हैं।

साथियों, जैसे-जैसे दुनिया में industrial development बढ़ा, competition का स्वरूप भी बदलने लगा। एक ओर हमारे पारंपरिक कारीगर थे, जो अपने कौशल और मेहनत से चीजें बनाते थे। दूसरी ओर मशीनों पर आधारित बड़े कारखाने सामने आने लगे, जहाँ mass production शुरू हो गया।

अब ज़रा सोचिए, जहाँ एक कारीगर कई दिनों की मेहनत से, एक साड़ी या कपड़ा बनाता था, वहीं मशीनों से एक ही दिन में सैकड़ों और हजारों कपड़े तैयार होने लगे। ऐसे में जाहिर सी बात है, कि उस competition का सामना करना, traditional कारीगरों के लिए आसान नहीं था। यही वह समय था, जब traditional production, और आधुनिक industrial production के बीच, बड़ा gap पैदा होने लगा।

आज़ादी के बाद, हमारे policy makers ने, इस स्थिति को समझा, और देश में industrialization को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया। बड़े उद्योग स्थापित किए गए, आधुनिक मशीनें लगाई गईं, और manufacturing sector को मजबूत बनाने की कोशिश की गई। साथ ही यह भी समझा गया, कि छोटे और मध्यम उद्योग, यानी MSMEs हमारी अर्थव्यवस्था की backbone हैं। इसलिए इस sector को बढ़ावा देने के लिए, अलग-अलग policies, और योजनाएँ बनाई गईं।

आज जब हम, advanced manufacturing, Artificial Intelligence, और नई technologies की बात करते हैं, तब भी MSMEs इस परिवर्तन की प्रक्रिया में, एक अहम भागीदार बनकर सामने आते हैं। आज के समय में, Automation, Artificial Intelligence, Robotics और Additive Manufacturing जैसे innovations, पूरी दुनिया में manufacturing को बदल रहे हैं। इसके साथ-साथ digital twins और simulation technologies भी नई संभावनाएँ खोल रही हैं। Digital twin, यानी कि किसी real system का, virtual model तैयार किया जाए। इस तरह की तमाम technologies, हमें complex systems को समझने, और बेहतर निर्णय लेने में मदद करती है। इसलिए यह आवश्यक है, कि हमारे MSMEs और start-ups इन technologies के साथ जुड़ें। ताकि उनके resources और उनकी क्षमता का optimum utilization हो सके।

MSMEs की क्षमता में कैसे वृद्धि हो, इसके लिए एक और महत्वपूर्ण विचार, integration का भी है। यह integration, दो तरीके से हो सकता है- Horizontal और Vertical. यदि हम horizontal integration की बात करें, तो इसका अर्थ है, कि अलग-अलग क्षेत्रों के MSMEs आपस में जुड़ें, एक-दूसरे के अनुभव से सीखें और मिलकर काम करें। वहीं vertical integration का मतलब है, कि MSMEs बड़े-बड़े उद्योगों के साथ मिलकर, नई-नई technology domains के साथ जुड़ें, और Artificial Intelligence, Automation, Robotics और additive manufacturing जैसे क्षेत्रों में अपनी expertise develop करें। एक line में मैं कहूँ, तो हमारी MSMEs को, Industry 4.0 के adoption की ओर आगे बढ़ना होगा। जब Horizontal और Vertical, दोनों तरह का integration होता है, तब एक मजबूत innovation ecosystem तैयार होता है।

साथियों, Economics के क्षेत्र में समय-समय पर अनेक विद्वानों ने विकास के विभिन्न model प्रस्तुत किए हैं। यहाँ मैं दो प्रमुख Economists, कॉलिन क्लार्क, और साइमन कुजनेट्स का उल्लेख करना चाहूँगा। इनके अनुसार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था सामान्यतः तीन चरणों से गुजरती है। पहले चरण में अर्थव्यवस्था का आधार agriculture होता है, दूसरे चरण में यह manufacturing sector की ओर आगे बढ़ती है, और तीसरे चरण में services का विस्तार होता है। सरल शब्दों में यह farm से factory और फिर services तक की यात्रा है।

दुनिया के कई देशों में यह model काफी हद तक देखने को मिलता है, लेकिन भारत की स्थिति कुछ भिन्न रही है। यहाँ ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर migration तो हुआ, परंतु बड़ी संख्या में लोग organized manufacturing में जाने के बजाय informal sector में ही लगे रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि manufacturing sector अपेक्षित गति से विकसित नहीं हो पाया।

आज भी भारत की GDP में industry का योगदान लगभग 15–16% के आसपास है, जो यह दिखाता है, कि MSMEs के आगे बढ़ने की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं। विशेष रूप से manufacturing के विस्तार के माध्यम से, अर्थव्यवस्था को और मजबूत बनाया जा सकता है। अब इस दिशा में आगे बढ़ने की जिम्मेदारी उद्योग जगत और innovators पर है। ये हम सबका राष्ट्र धर्म है।

साथियों, पिछले एक दशक में, सरकार ने MSME sector को मजबूत बनाने के लिए, कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 2014 के बाद, हमारे प्रधानमंत्री जी ने, इस sector के विस्तार पर लगातार ध्यान दिया है। MSMEs के registration और identification को आसान बनाने के लिए, Udyam Portal, और Udyam Assist Portal जैसे digital platforms शुरू किए गए हैं। ताकि छोटे industries को, formal economy से जोड़कर, उनतक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जा सके।

अगर मैं आँकड़ों की बात करूँ, तब भी यह परिवर्तन साफ दिखाई देता है। 2012-13 के आसपास देश में MSMEs की संख्या करीब 4.67 करोड़ थी। लेकिन आज, हाल के आँकड़ों के अनुसार, यह संख्या लगभग 8 करोड़ के आसपास पहुँच गई है। यानी पिछले लगभग एक दशक में इस sector में काफी विस्तार हुआ है। यह वृद्धि बताती है, कि हमारे प्रयासों के फलस्वरूप देश में, entrepreneurship की भावना लगातार बढ़ रही है, और छोटे उद्योग अब आर्थिक विकास में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

इस बार के बजट में भी आपने देखा होगा, कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में, सरकार ने MSMEs को मजबूत करने की दिशा में कई प्रयास किए हैं।

सरकार ने इस दिशा में एक और महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है, जिसकी चर्चा यहाँ मैं जरूरी समझता हूँ। जैसा कि हम सब जानते हैं, कि iDEX और ADITI, एक game changer initiative के रूप में हमारे सामने आए हैं। इसके माध्यम से start-ups, innovators और MSMEs को यह अवसर मिलता है, कि वे armed forces की जरूरतों के लिए, नए solutions develop करें। जब defence services को किसी खास technology या capability की requirement होती है, तो हमारे young innovators, उस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश करते हैं। अगर उनका solution सफल होता है, तो आगे उसके development, और procurement का रास्ता भी खुलता है।

अगर हम iDEX की अब तक की प्रगति देखें, तो यह पहल काफी प्रभावी साबित हुई है। मुझे यह बताते हुए ख़ुशी भी हो रही है, और गौरव की अनुभूति भी हो रही है, कि पिछले माह, यानि फरवरी 2026 के अंत तक, करीब 676 start-ups, MSMEs और individual innovators इससे जुड़ चुके हैं, 548 contracts sign हुए हैं, और 566 challenges launch किए जा चुके हैं। इनमें से 58 prototypes को procurement के लिए clearance मिल चुका है, जिनकी approximate value लगभग 3,853 करोड़ रूपये है। 45 procurement contracts भी साइन किए जा चुके हैं, जिनकी value करीब 2326 करोड़ रूपये है। ये आंकड़े बताते हैं, कि आज innovation धीरे-धीरे products और technologies के रूप में सामने आ रहा है, और इसमें हमारे start-ups और MSMEs की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।

साथियों, मुझे यह देखकर भी खुशी हुई, कि इस कार्यक्रम के sessions में ऐसे विषयों पर चर्चा हो रही है, जो पहले MSMEs से सीधे नहीं जोड़े जाते थे। पहले MSME का नाम लेते ही, हमारे मन में नट-बोल्ट, पाइप या छोटे mechanical parts की तस्वीर आती थी। लेकिन आज MSMEs, Artificial Intelligence, Robotics, Automation, और Advanced Manufacturing जैसे क्षेत्रों में भी काम कर रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव है।

दुनिया में कई, बड़ी कंपनियों की शुरुआत भी बहुत छोटे स्तर से हुई थी। कई innovations की शुरुआत, एक छोटे garage या workshop से हुई, और बाद में वही प्रयास बड़े global enterprises में बदल गए। इसका संदेश साफ है, कई बार बड़ा परिवर्तन एक छोटे विचार, और छोटे प्रयास से ही शुरू होता है। इसलिए आप सभी, जो अपने-अपने क्षेत्र में काम कर रहे हैं, यह मानकर चलिए, कि आपकी आज की छोटी शुरुआत कल बड़ी सफलता में बदल सकती है।

साथियों, किसी भी देश के डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम को बनाने में जहाँ पर बड़ी इंडस्ट्रीज, MSME, स्टार्टअप्स और innovators का हाथ होता है, वहीं सरकार की तरफ़ से देश की रक्षा जरूरतों के अनुसार clear policy push का भी हाथ होता है।

आज जब पूरी दुनिया रूस और यूक्रेन के साथ-साथ ईरान-इज़राइल के बीच ज़ारी संघर्ष को देख रही है तो हम साफ़ देख सकते हैं कि future warfare में ड्रोन्स और काउंटर ड्रोन technologies की बहुत बड़ी भूमिका है। आज भारत में एक ऐसे ड्रोन मैनुफैक्चरिंग इकोसिस्टम के निर्माण की ज़रूरत है, जिसमें हम पूरी तरह आत्मनिर्भर हों। यह आत्मनिर्भरता सिर्फ़ प्रोडक्ट के स्तर पर ही नहीं बल्कि component के स्तर पर भी ज़रूरी है। यानि ड्रोन के mould से लेकर, software, engine और batteries सभी भारत में ही बने। यह काम आसान नहीं है क्योंकि अधिकांश देशों में जहाँ ड्रोन्स बनते हैं वहाँ कई critical components एक देश विशेष (चीन) से import किए जाते हैं।

भारत की defence preparedness और strategic autonomy के लिए यह ज़रूरी है कि भारत ड्रोन मैनुफैक्चरिंग में पूरी तरह आत्मनिर्भर बने। इस काम में देश को आप अभी की ज़रूरत है। सरकार की तरफ़ से आपको हर तरह का समर्थन प्राप्त होगा। हम सबको मिलकर मिशन मोड में काम करना होगा ताकि अगले कुछ वर्षों में भारत भारत, indigenous drone manufacturing का ग्लोबल हब, बन जाये।

आए दिन हमें नए नए start ups की success stories देखने को मिलती हैं। आप सभी अवगत होंगे, अभी कुछ ही समय पहले कई start ups ने, हमारी services से procurement contracts secure किए। इसके अलावा भी, overall देखें, तो कभी कोई Start up, अपने बिल्कुल Unique idea से society में change लाने का माध्यम बन रहा है, कभी कोई start up बड़े ही कम समय में, Unicorn का दर्जा हासिल कर ले रहा है। आप में से भी, कल को कई Unicorns हमारे सामने उभर कर आएँगे, इतना तो मेरा पक्का विश्वास है। जरूरत है तो बस मेहनत, लगन और समर्पण के साथ लगातार काम करने की।

जब हम सभी मिलकर काम करेंगे, तभी एक मजबूत innovation ecosystem बनेगा। मिलकर काम करने की बात पर, मैं एक interesting example की चर्चा करना चाहूंगा। केरल में एक प्रसिद्ध नाव दौड़ होती है, जिसे वल्लमकली कहा जाता है। उसमें एक लंबी नाव होती है, और उसमें कई लोग, एक साथ बैठकर चप्पू चलाते हैं। जब सभी लोग एक ताल, और एक लय में चप्पू चलाते हैं, तभी वह नाव तेज गति से आगे बढ़ती है। यदि उनमें से कोई एक भी ढीला पड़ जाए, तो पूरी गति प्रभावित हो जाती है। हमारा यह innovation ecosystem भी कुछ वैसा ही है। हम सभी उस नाव में बैठे हुए नाविकों की तरह हैं, और हम सबके हाथ में एक-एक चप्पू है। यदि हम सभी मिलकर पूरी शक्ति और समर्पण के साथ आगे बढ़ें, तभी हम अपने लक्ष्य तक पहुँच पाएंगे।

इसी विश्वास के साथ, मैं आप सभी से कहना चाहूँगा, कि आप अपने-अपने क्षेत्र में पूरी ऊर्जा और उत्साह के साथ आगे बढ़ें, innovation करें, नई technologies को अपनाएँ, और देश को आत्मनिर्भर बनाने के इस अभियान में अपना योगदान दें। मैं इस conclave के सफल आयोजन के लिए, Secretary, Department of Defence Production, और उनकी पूरी team को बधाई देता हूँ, और यहाँ उपस्थित सभी प्रतिभागियों को अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ।

मुझे पूरा विश्वास है, कि यहाँ होने वाली चर्चाएँ और विचार आने वाले समय में देश के defence manufacturing ecosystem को और अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। इसी विश्वास के साथ, मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद!