जब धर्म को साकार रूप में देखना हो, तो श्रीराम का चरित्र अपने आप सामने आ खड़ा होता है: रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह

Text of RM’s speech at the ‘Pratishtha Dwadashi Samaroh’ in Ayodhya.

 

आज, प्रतिष्ठा द्वादशी के इस पुनीत अवसर पर, आप सभी पूज्य संतों, पूज्य मनीषियों, भगवान श्रीराम के हृदय में निवास करने वाले अवधवासियों, तथा मेरे देश के समस्त नागरिकों को, भारत के धार्मिक पुनरुत्थान के केंद्र, श्रीअयोध्या धाम से, मेरा सादर … जय श्रीराम।

आज इस पावन भूमि पर आकर, मैं अत्यंत भावुक और अभिभूत हूं। मेरे हृदय में भावनाओं का ऐसा ज्वार उमड़ रहा है, कि शब्द स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे हैं। इस क्षण मुझे बस यही अनुभव हो रहा है, कि…

नाथ आजु मैं काह पावा।

आज मुझे क्या नहीं मिल गया। यह दिन पाकर मुझे सब कुछ मिल गया है। ऐसा लग रहा है, जैसे मेरे राघवेंद्र सरकार ने स्वयं इस दिन के लिए मुझे चुना था।

साथियों, आज से दो वर्ष पूर्व, हमारे प्रभु श्रीराम, सदियों की प्रतीक्षा के उपरांत, अपने दिव्य मंदिर में विराजमान हुए। अपनी अद्भुत, और तेजस्वी छवि के साथ, वे आज केवल अयोध्या ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व को कीर्ति प्रदान कर रहे हैं। उस कीर्ति की विशालता को समझने और शब्दों में बाँधने का सामर्थ्य मुझ जैसे व्यक्ति में कहाँ। परंतु प्रभु की कृपा से, आज मैं आप सभी के समक्ष खड़ा हूँ, और मुझे लगता है, कि आज का दिन, मेरे जीवन के सबसे सौभाग्यशाली दिनों में से एक है।

आज, हनुमानगढ़ी में विराजमान श्रीमंत हनुमंत जी महाराज, उल्लास से परिपूर्ण हैं; जैसे अपने प्रभु को पुनः वैभव के साथ, सिंहासन पर आसीन देखकर, उनका हृदय कृतार्थ हो उठा हो। कनक भवन में कनक बिहारी जी आह्लादित हैं, दशरथ महल में चक्रवर्ती महाराज दशरथ, अपनी तीनों रानियों के साथ, संतोष और गौरव से निहाल हैं। आज, पतित पावनी माता सरयू, अपनी लहरों में वात्सल्य भरकर बह रही हैं, जैसे अपने लाडले पुत्र का अभिषेक स्वयं अपने आँचल से कर रही हों। आज अयोध्या की हर गली, हर चौक, हर द्वार, हर श्वास राममय होकर आनंदित है। और यह आनंद केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है। आज पूरा अवध क्षेत्र, आज सम्पूर्ण भारतवर्ष, और आज विश्व का प्रत्येक वह हृदय, जो राम को जानता है, राम को मानता है, राम को जीता है, सब एक साथ आह्लादित है।

साथियों, आज का दिन हम सभी के लिए, अत्यंत गौरव का क्षण है। वह ऐतिहासिक क्षण, जब भगवान श्रीरामचंद्र ने स्वयं अवध की धरती पर, पुनः अपने भक्तों को दर्शन देने का समय निश्चित किया था, उसके दो वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। यह वही अयोध्या है, वही भूमि है, जो वर्षों तक रक्तरंजित रही, जिसने अपने राम के लिए, अपने राजा के लिए, अपने आराध्य के लिए, असहनीय प्रतीक्षा की। जिसने अपमान सहे, पीड़ा सही, लेकिन फिर भी अपनी आस्था को डगमगाने नहीं दिया। आज जब प्रभु श्रीराम के आगमन के दो वर्ष पूर्ण होने पर हम सभी यहाँ साक्षी बने खड़े हैं, तो यह उन सदियों की प्रतीक्षा के पूर्ण होने का उत्सव है। दो वर्ष पूर्व पौष, शुक्लपक्ष की द्वादशी को, जो प्राण प्रतिष्ठा हुई थी, वह केवल राम लला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा नहीं थी, अपितु वह एक लंबे समय के बाद भारत के जनमानस में पुनः हुई आध्यात्मिक प्राण प्रतिष्ठा थी।

साथियों, हमारे प्रधानमंत्री जी कहते हैं, कि आज इस देश में जो कुछ भी हो रहा है, और आने वाले कुछ वर्षों में इस देश में जो कुछ भी होगा, वह भविष्य के हजार वर्षों की नींव रखेगा। भगवान रामलला के मंदिर का, चाहे स्थापत्य हो, या फिर इसकी भावना, उसी कथन को चरितार्थ कर रहा है। बिना लौह धातु के, केवल विशिष्ट शिलाओं से निर्मित यह मंदिर, आगामी हजारों वर्षों तक, प्रभु श्रीराम के चरित का गुणगान, विश्व सम्मुख करता रहेगा।

साथियों, हम सभी पिछली अनेक पीढ़ियों में, सबसे सौभाग्यशाली पीढ़ी में जन्मे हैं, और यह हमारे पूर्व जन्मों का फल है, कि हम यह दिव्य दृश्य देख रहे हैं। इस दुनिया से जाते समय, हम सबके लिए यह सबसे बड़ा सन्तोष का विषय होगा, कि हमने अयोध्या में अपने राम को आते देखा। सैकड़ों वर्षों से अयोध्या अपने राम का इंतजार कर रही थी। न जाने कितनी आँखें अपने प्रभु का इंतज़ार करते हुए पथरा गईं। लेकिन हमारी आंखों ने वह दृश्य देखा। हमारे बच्चों ने वह दृश्य देखा। भगवान राम के प्राण प्रतिष्ठा का वह दृश्य इतना सुंदर था, कि हमारी आने वाली पीढ़ियां, हमारी आँखों में झाँककर वह दृश्य देखेंगी और खुद को भाग्यशाली समझेंगी।

मैं कई बार सोचता हूं, कि राम मंदिर का जो आंदोलन रहा है, उस आंदोलन के बारे में न जाने क्या-क्या कहा गया, क्या क्या बातें प्रचारित की गईं। जबकि मुझे ऐसा लगता है, कि राम मंदिर आंदोलन, दुनिया के सबसे grand narrative में से एक है।

मैं इसको Grand narrative इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि geography और time, दोनों के हिसाब से राम मंदिर आंदोलन दुनिया का सबसे बड़ा आंदोलन है। Geography के हिसाब से आप देखिये, तो भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, इंडोनेशिया, वियतनाम, थाईलैंड, और ऐसे अनेक देश हैं, जहाँ हिंदुओं के अलावा भी कई ऐसे समुदाय हैं, जो राम को पूजते हैं, जो जन्मभूमि पर मंदिर बनते देखना चाहते थे। इतनी बड़ी geography, किसी एक आराध्य के लिए बहुत कम ही देखने को मिलती है।

Geography के अलावा, time के हिसाब से भी आप देख लीजिए, तो दुनिया के किसी भी हिस्से में, किसी समुदाय ने, अहिंसक तरीके से, लगातार 500 वर्षों तक अपने ही आराध्य की जन्मभूमि पर उनके भव्य मंदिर के निर्माण का इंतज़ार, शायद ही किया हो। इसलिए, Geography and Time, दोनों ही मामलों में आप देखें, तो राम मंदिर आंदोलन से बड़ा grand narrative, आपको दुनिया में कहीं देखने को नहीं मिलेगा।

हम उस grand narrative की सफलता का भी उत्सव मना रहे हैं। वह narrative इतना सफल हुआ, कि न सिर्फ राम अपने मंदिर में आए, बल्कि आज उस मंदिर पर धर्म की ध्वजा भी लहरा रही है। कितने ही विदेशी आक्रांता इस देश आए। सबने सनातन के इस केसरिया ध्वज को गिराने की चेष्टा हमेशा की। अब राम मंदिर के शिखर पर जब यह केसरिया ध्वज लहरा रहा है, तो इस ध्वज से टकराने वाली हवाएं दुनिया भर में जाकर यह संदेश देंगी, कि हमारी ओर गौर से देखो, हम वही सभ्यता हैं, जिसे मिटाने के लिए न जाने कितने आक्रांता आए। आज उन आक्रांताओं के कहीं अवशेष भी नहीं बचे, और हमारे ध्वज समंदर पार भी गगन से बातें कर रहे हैं।

साथियों, जब हम भगवान श्री राम के चरित्र को पढ़ते हैं, रामायण, श्रीरामचरितमानस या रामकथा के अन्य प्रसंगों को समझते हैं, तो एक बात बार-बार सामने आती है, कि जब-जब इस धरती पर ऋषियों ने यज्ञ करने का संकल्प लिया, तपस्या का मार्ग चुना, धर्म की स्थापना का प्रयास किया, तब-तब कुछ आसुरी शक्तियाँ आईं और उस यज्ञ को भंग करने का प्रयास किया। यही इतिहास है, यही सत्य भी है। वैसा ही दृश्य हमने अपने जीवनकाल में भी देखा। जब रथ यात्रा शुरू हुई, और अयोध्या से लेकर पूरे भारत के संत, महंत, वैरागी और कारसेवक एक स्वर में खड़े हुए, तब उन पर भी वही आसुरी शक्तियाँ टूट पड़ीं। मैं खुद भी उन तमाम घटनाओं का साक्षी रहा हूँ। गोलियाँ चलीं, लाठियाँ बरसीं, रास्ते रोके गए, और प्रभु राम का नाम लेने वालों को, अपराधी घोषित करने तक का प्रयास किया गया।

पर साथियों, हमने प्रभु श्री राम से ही सीखा है, कि समय सबका न्याय करता है। जिसने राम का साथ दिया, जिसने रामराज्य का साथ दिया, जिसने अयोध्या और अवध के विकास का साथ दिया, वह आज प्रभु की कृपा से निरंतर इस राष्ट्र की सेवा में लगा हुआ है। और जिन्होंने रामकाज के मार्ग में अवरोध खड़े किए, जिन्होंने संतों, वैरागियों और नागा साधुओं तक पर गोलियाँ चलवाईं, जिन्होंने त्याग और तपस्या को कुचलने का पाप किया, उनकी स्थिति भी दुनिया देख रही है।

साथियों, कोई भी सामाजिक आंदोलन अचानक शून्य से जन्म नहीं लेता। वह समाज की चेतना से निकलता है, समाज के भीतर पलता है, और समाज के बदलाव के अनुसार खुद को बदलते हुए आकार भी लेता है। और जब आंदोलन आगे बढ़ता है, तो वह समाज की दिशा तय करता है। मंदिर निर्माण का आंदोलन भी ऐसा ही एक आंदोलन रहा है, जिसने न केवल इतिहास को झकझोरा, बल्कि वर्तमान को दिशा दी और भविष्य की नींव रखी। यह संघर्ष कोई एक दिन का नहीं था। यह पांच शताब्दियों से अधिक समय तक चला हुआ धैर्य, तपस्या और आस्था का संघर्ष था। लेकिन मुझे याद आता है, जिस तीव्रता, जिस चेतना और जिस व्यापक जनजागरण के साथ यह आंदोलन 90 के दशक में सामने आया, उसने पूरे राष्ट्र को आंदोलित कर दिया। हम सबने भगवान राम के मंदिर के लिए चले उस आंदोलन को अपनी आँखों से देखा भी है, और जीया भी है।

संयोग देखिए, कि वही 90 का दशक भारत के लिए परिवर्तन का दशक भी बना। आर्थिक मोर्चे पर देश ने नए रास्ते खोले, निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। सामाजिक स्तर पर वंचितों, शोषितों, पिछड़ों और मातृशक्ति के स्वाभिमान की नई आवाज़ सुनाई देने लगी। मैं यह नहीं कहता, कि ये सारे परिवर्तन केवल मंदिर आंदोलन के कारण हुए, लेकिन इतना अवश्य कहता हूँ, कि जब समाज जागता है, तो उसका असर हर क्षेत्र पर पड़ता है। चेतना कभी एक दिशा में नहीं बहती, वह पूरे समाज को अपने साथ बहा ले जाती है। वही चेतना हमें आज भी समस्त भारत में दिखाई दे रही है।

आज, डबल इंजन सरकार के सशक्त नेतृत्व में, अयोध्या अभूतपूर्व परिवर्तन की साक्षी बन रही है। हमारे प्रधानमंत्री जी की दूरदर्शी सोच के अनुरूप, आस्था, संस्कृति और इतिहास को संजोते हुए, यहाँ विश्व-स्तरीय आधारभूत संरचना का निर्माण हो रहा है। राम मंदिर निर्माण के बाद, करोड़ों श्रद्धालुओं के आगमन ने, अयोध्या को वैश्विक धार्मिक पर्यटन का केंद्र बना दिया है। सड़कों, आवास, हरित क्षेत्रों, हवाई अड्डे और रेलवे के विकास से, अयोध्या एक आधुनिक, सुरक्षित और समृद्ध मॉडल शहर के रूप में उभर रही है। यह विकास केवल अयोध्या का नहीं, बल्कि समूचे भारत के गौरव का प्रतीक है। इसके लिए मैं, श्री हनुमान जी के प्रत्यक्ष कृपापात्र, उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को भी विशेष बधाई देता हूँ।

साथियों, भारतीय परंपरा में धर्म को किसी संकीर्ण आस्था या कर्मकांड तक सीमित नहीं किया गया, बल्कि उसे जीवन की संपूर्ण व्यवस्था के रूप में देखा गया है। और जब धर्म को साकार रूप में देखना हो, तो श्रीराम का चरित्र अपने आप सामने आ खड़ा होता है। महर्षि वाल्मीकि ने भी राम को ‘विग्रहवान धर्मकहा है, अर्थात् धर्म स्वयं यदि देह धारण करे, तो वह राम होगा। कर्तव्यपरायणता के कोई साक्षात् स्वरूप हैं, तो वह हैं राम। नीति के कोई साक्षात् स्वरूप हैं, तो वह हैं राम। मर्यादा के कोई साक्षात् स्वरूप हैं, तो वह हैं राम। और धर्म के कोई साक्षात् स्वरूप हैं, तो वह हैं राम। राम यानि सत्य, राम यानि संयम, राम यानी संकल्प, राम यानी सुशासन, और राम यानि संघर्ष।

राम का जीवन किसी चमत्कार या अलौकिकता का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि वह निरंतर कठिन परिस्थितियों में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की कथा है। वे धर्म के रक्षक ही नहीं, बल्कि धर्म के अनुशीलक हैं। उनका धर्म स्थिर नहीं है, उनका धर्म परिस्थितियों के साथ प्रश्न करता है, स्वयं को कसौटी पर रखता है, और फिर भी मूल्यों से विचलित नहीं होता। राम की महानता इसी में है, कि वे कभी अपने कर्तव्य को सरल नहीं बनाते, बल्कि स्वयं को कठोर बनाकर कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।

कहना मैं यह चाहता हूं, राम किसी कथा का विषय नहीं हैं, राम किसी ग्रंथ के अध्याय नहीं हैं, राम वह चेतना हैं, जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती है। जहाँ निर्णय लेना कठिन हो जाता है, वहाँ राम आदर्श बनकर खड़े होते हैं। जहाँ शक्ति उन्माद बनने लगती है, वहाँ राम मर्यादा बनकर उसे रोकते हैं। जहाँ अधिकारों की बात आती है, वहाँ राम कर्तव्य बनकर सामने आते हैं। राम वहाँ हैं, जहाँ मन स्वार्थ से ऊपर उठकर, विवेक का हाथ थाम लेता है। राम उस धर्म का स्वर हैं, जो जीवन के हर संघर्ष में उतरता है। वन की धूल में राम हैं, राजसिंहासन की गरिमा में राम हैं, निषादराज के आलिंगन में राम हैं, और शबरी की प्रतीक्षा में भी राम हैं। जहाँ किसी ने आखिरी आशा छोड़ी नहीं, वहाँ राम उपस्थित हैं। जहाँ किसी ने अन्याय सहकर भी अधर्म नहीं चुना, वहाँ राम जीवित हैं।

जब हमलोग भगवान राम की मर्यादा पर चर्चा कर रहे हैं, तो मैं उनकी मर्यादा का हम भारतीयों पर जो असर पड़ा है, उस पर भी आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा। मैं हमेशा कहता हूँ, कि राम हमारी चेतना में बसे हैं। वो हमारी चेतना में ऐसे रचे-बसे हैं, कि उनकी मर्यादा हमारी पहचान बन गई है। भगवान राम हमारे इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में से एक थे, लेकिन उतने महान होने के बावजूद, उन्होंने युद्ध में भी एक किस्म की मर्यादा रखी।

राम शत्रु से युद्ध करते हुए भी, अपनी मर्यादा नहीं लाँघते हैं। जब युद्धभूमि में राम नागपाश जैसे दिव्यास्त्रों के प्रभाव में आते हैं, तो वे उसे अस्वीकार नहीं करते, बल्कि उसकी शक्ति और नियमों को स्वीकार करते हैं। युद्ध के बीच भी राम मर्यादा नहीं छोड़ते। रावण जब निहत्था होता है, राम युद्ध स्थगित कर देते हैं। राम जानते हैं कि मर्यादा टूटे तो विजय भी पराजय बन जाती है।

ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के दौरान भारत ने भी, भगवान राम के इसी मर्यादा का पालन किया। जैसे राम का लक्ष्य रावण का संहार नहीं, बल्कि अधर्म का अंत था। हमारा भी वही लक्ष्य था, कि हम आतंकियों और उनके आकाओं को सबक सिखा कर आएँगे, और हमने बस वही किया। हमने अंधाधुंध प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि सीमित, नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण कार्रवाई की। राम की मर्यादा हमें सिखाती है, कि युद्ध में भी मूल्य जीवित रहने चाहिए। ऑपरेशन ‘सिंदूर’ ने भी सिद्ध किया, कि आधुनिक भारत राम की उस मर्यादा का सच्चा उत्तराधिकारी है। राम विनम्र हैं। राम शीलवान हैं। राम कृपालु हैं। लेकिन जहाँ आवश्यकता पड़ती है, वहाँ वही राम… “आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं“… यानि रामजी वहाँ दुष्टदलन की भूमिका में भी आ जाते हैं। Operation Sindoor के दौरान, हमने भगवान राम की उसी प्रेरणा के तहत काम किया।

साथियों, इस भव्य मंदिर के प्रांगण में, मुझे एक और बात स्मरण हो रही है। अयोध्या में आज माता शबरी मंदिर, निषादराज मंदिर, सुग्रीव मंदिर, वाल्मीकि मंदिर जैसे अनेक मंदिर न केवल दिव्यता के, बल्कि सर्वसमावेशिता के भी प्रत्यक्ष उदाहरण के रूप में, हमारे सम्मुख विद्यमान हैं। जो सामाजिक समरसता हम श्रीराम जी के जीवन में देखते हैं, वही समरसता आज हमें श्रीराम जी के मंदिर के प्रांगण में दिखाई दे रही है। इसके अलावा साथियों, जहाँ भी प्रभु राम का जिक्र आता है, वहाँ माता सीता का जिक्र स्वतः ही आ जाता है। आप लोग अवगत होंगे, कि इस मंदिर के अतिरिक्त, माता जानकी के जन्मस्थान सीतामढ़ी के पुनौरा धाम को भी, भव्य बनाने के लिए हमारी सरकार लगातार प्रयासरत है।

वैसे तो मेरी इच्छा है, कि सरस्वती मेरी जिह्वा पर कृपा करें, और मैं ऐसे ही घंटों तक प्रभु के बारे में बोलते रह जाऊँ। लेकिन जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है, करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥

यानि, मैं श्री रघुनाथजी के गुणों का वर्णन तो करना चाहता हूँ, लेकिन एक तरफ तो उनका चरित्र इतना अथाह है, और दूसरी तरफ मैं अपनी लघु मति से, उनका क्या ही वर्णन कर पाऊँगा। भाव इतने विशाल हैं कि वाणी उनका भार नहीं उठा पाएगी। पर यही तो राम की विशेषता है। हर बार लगता है कि इतना कुछ कह दिया उनके बारे में, और फिर लगता है, कि कुछ भी नहीं कहा। इसलिए आज और कुछ न कहते हुए, मैं अपनी आँखों में इन दृश्यों को, और अपने मस्तिष्क में इन स्मृतियों को संजो लेना चाहता हूँ।

मैं आप सभी पूज्य संतों की उपस्थिति में, ईश्वर से यह प्रार्थना करता हूँ, कि यावत चंद्र दिवाकरौ’, यानी जब तक सृष्टि में सूर्य और चंद्र विराजमान रहें, युगों-युगों तक इस मंदिर की धर्मध्वजा यूँ ही लहराती रहे। मैं प्रभु श्रीराम से प्रार्थना करता हूँ, कि उनकी कृपा हम सभी पर समान रूप से बरसे। वे सबका कल्याण करें, विश्व को शांति दें, मानवता को करुणा दें, और समाज को मर्यादा का मार्ग दिखाएँ।

इसी कामना के साथ, आप सभी भक्तजनों, और समस्त देशवासियों को इस दिव्य अवसर पर हृदय से नमन करते हुए, पुनः सादर उद्घोष करता हूँ… जय श्री राम।