भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 16 मई 1952 कोपहली लोकसभा को संबोधित करते हुए, संसद सदस्यों कोउनके लोकतांत्रिक दायित्वों की गंभीरता का स्मरण कराया था।उन्होंने स्पष्ट किया था कि संविधान के लागू होते ही, राष्ट्रपतिके निर्वाचन और पहले आम चुनाव के साथ स्वतंत्र भारत कीलोकतांत्रिक यात्रा का प्रथम चरण पूरा हो चुका है और देश अबऐसे दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा है, जिसमें कोई विराम नहींहोगा। उनके अनुसार दूसरे चरण की लोकतान्त्रिक यात्रा तभीसफल होगी जब राज्य और शासन व्यवस्था जन–आकांक्षाओंकी पूर्ति के लिए पूरी तरह समर्पित होगा।
हमारे संविधान निर्माताओं ने शासन व्यवस्था के केंद्र में इसनैतिक दायित्व को स्थापित करके, राज्य और नागरिकों के बीचके संबंध को पुनः परिभाषित किया था। अब भारत के लोगकिसी शासक की प्रजा नहीं, बल्कि अधिकारों से युक्त नागरिकबन चुके थे।
लोकतंत्र की एक परिभाषा के अनुसार, लोकतंत्र का अर्थ होता है“ऑफ द पीपल, बाय द पीपल और फॉर द पीपल” यानि“जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए” शासन।
हमारे संविधान की प्रस्तावना में यह साफ है कि हमारे देश मेंसंप्रभुता जनता के हाथों में हैं और यह संविधान भारत के लोगो नेही स्वयं के लिए गढ़ा हैं। इसलिए संविधान के अंगीकरण केसाथ ही ‘ऑफ द पीपल’ का सिद्धांत, साकार हो गया था।
दूसरा सिद्धांत– बाय द पीपल, वर्ष 1952 के पहले आम चुनावोंके साथ स्थापित हुआ जब लोकसभा और विधानसभाओं केसदस्यों का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर हुआ।
लेकिन लोकतंत्र का तीसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत– फॉर द पीपल, एक निरंतर प्रक्रिया है। इसी निरंतर प्रक्रिया की बात डॉ राजेन्द्रप्रसाद ने की थी जब उन्होंने भारत की दूसरे चरण की यात्रा मेंकोई विराम न होने की बात कही थी।
इन सारे तथ्यों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि संविधानऔर लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था के केंद्र में ‘हम भारत के लोग’ हैंऔर उनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान का ध्येय है।
यह ध्येय हमेशा भारत की राजनीतिक चेतना का अभिन्न अंगरहा है। प्राचीन भारत में “योग–क्षेम” का सिद्धांत व्यक्ति केकल्याण और सुरक्षा से जुड़ा हुआ था। महात्मा गांधी के“सर्वोदय” के विचार के केंद्र में भी सभी का उत्थान है। पंडितदीनदयाल उपाध्याय का “एकात्म मानववाद” और “अंत्योदय” के सिद्धांत भी व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास और वंचित वर्गों केउत्थान पर केंद्रित हैं। विकास के केंद्र में नागरिकों को रखने कीयह परंपरा वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति “सबकासाथ, सबका विकास” में भी निहित है।
वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जनता केंद्रित शासन व्यवस्था की यह सोच सरकार की नीतियों और कार्यों में स्पष्टदिखायी देती है। इससे संवैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति को गतिऔर शक्ति मिली है।
संविधान में मौजूद नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत राज्य परश्रमिकों के लिए मानवीय और न्यायपूर्ण परिस्थितियाँ सुनिश्चितकरने का दायित्व है। इसी दिशा में कार्य करते हुए हाल में ही केंद्र सरकार ने 29 श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में पिरोयाहै। यह श्रमिकों के लिए बेहतर आर्थिक और सामाजिक सुरक्षाप्रदान करने की दिशा में बड़ा कदम है।
संविधान राज्य को यह निर्देश देता है कि वह आर्थिकअसमानताओं को कम करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। इसउद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है, जब समाज के हर वर्ग को शिक्षाऔर रोजगार के समान अवसर उपलब्ध हों। पिछले वर्षों में लिएगए कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों के चलते आज अवसरों कीयह समानता हर स्तर पर बढ़ी है।
इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण स्टार्टअप इंडिया पहल है, जिसके हाल ही में दस वर्ष पूरे हुए हैं। इसके अंतर्गत प्रदान कियेजाने वाले नीतिगत सहयोग, आर्थिक मदद, और मेंटरशिप केमाध्यम से, आज किसी भी व्यक्ति के लिए एक उद्योग शुरूकरना बहुत आसान हुआ है। दिसंबर 2025 तक देश में दो लाखसे अधिक DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की स्थापना, इसबात का प्रमाण है कि समान अवसरों की नीति किस तरहसमावेशी आर्थिक विकास को गति दे सकती है। इस पूरे क्रम मेंसबसे अधिक प्रेरक बात यह है कि इन स्टार्ट–अप्स को शुरूकरने वालों में बड़ी संख्या में पहली पीढ़ी के उद्यमी हैं।
आर्थिक प्रगति तभी समावेशी बनती है, जब अवसरों कीसमानता हो। यह आय असमानता को कम करने में महत्वपूर्णभूमिका निभाती है। पिछले 12 वर्षों में सभी आर्थिक नीतियाँइसी विचार से प्रेरित रही हैं। इसी का परिणाम है कि आजभारत की आर्थिक प्रगति का लाभ प्रत्येक नागरिक तक समानरूप से पहुंच रहा है।
विश्व बैंक के स्प्रिंग 2025 पावर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ के अनुसार, भारत ने पिछले दशक में 17.1 करोड़ लोगों को ‘अत्यधिकगरीबी’ (Extreme Poverty) से भी बाहर निकाला है।सामाजिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को भी आरक्षण का लाभ दिया गया है।
केंद्र सरकार ने समावेशी विकास के साथ–साथ लोगों के लिएगरिमापूर्ण जीवन और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने पर भीनिरंतर ध्यान केंद्रित किया है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 जैसे कानूनों के माध्यम से सामाजिक न्यायको और भी मजबूती मिली है।
गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने की इसी भावना का एकअच्छा उदाहरण स्वच्छ भारत मिशन (SBM) भी है। इस मिशनका नेतृत्व लोग स्वयं कर रहे हैं। और उन्होंने इसे जनांदोलन का स्वरूप प्रदान किया है। यह केवल स्वच्छता तक सीमित पहलनहीं थी, बल्कि उन करोड़ों लोगों की गरिमा को पुनर्स्थापितकरने का प्रयास था, जो दशकों तक खुले में शौच करने कोमजबूर थे।
जनकल्याण की यही भावना ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्नयोजना’ और ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ जैसीपहलों में भी साफ दिखती है। ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्नयोजना’ के तहत 80 करोड़ से अधिक लोगों को निःशुल्कखाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं, ‘प्रधानमंत्री जीवनज्योति बीमा योजना’ कठिन समय में लाखों भारतीय परिवारों केलिए आशा की किरण बनकर उभरी है। इस योजना की 53 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएँ हैं और 72 प्रतिशत से अधिकलाभार्थी ग्रामीण भारत से आते हैं। यह सामाजिक सुरक्षा केसमावेशी होने का प्रमाण है।
जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का आह्वानकिया था, तो वह केवल अर्थव्यवस्था के स्तर तक ही सीमितनहीं था, बल्कि नागरिकों के अंदर आत्म निर्भरता की भावना बढ़ाने का भी प्रयास था। इसलिए मुद्रा योजना और स्किलइंडिया मिशन जैसी पहलों के माध्यम से नागरिकों को स्वावलंबीऔर उद्यमशील बनाने पर बल दिया गया है। इन योजनाओं केकेंद्र में “आत्मनिर्भर नागरिक” बनाना है जो “आत्मनिर्भर भारत” का आधार भी बन रहे है।
इसी क्रम में आयुष्मान भारत योजना एक महत्वपूर्ण पहलसाबित हुई है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को बहुतलाभ हुआ है जो धन के अभाव में अच्छी स्वास्थ्य सेवा से वंचितथे। इसी तरह जन धन योजना ने बड़ी संख्या में नागरिकों कोफॉर्मल बैंकिंग से जोड़कर वित्तीय सुरक्षा प्रदान की है।
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के माध्यम से लोकसभा औरराज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षणका प्रावधान किया गया है। इस अधिनियम में लोकतंत्र के तीनोंसिद्धांत सशक्त अभिव्यक्ति पाते हैं क्योंकि विधायी संस्थाओं मेंमहिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने से संप्रभुता का सामाजिकआधार तो बढ़ेगा ही, नीति–निर्माण भी ज्यादा समावेशी होगा।
यानि लोकतांत्रिक सिद्धांत का तीसरा सूत्र– फॉर द पीपल, जिसके केंद्र में जन–कल्याण है, एक सतत दायित्व है, जिसे हरपीढ़ी को अपने समय में निभाना पड़ता है। गणतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती सिर्फ इस बात पर ही नहीं निर्भर है कि उसकी संस्थाएं कितनी मजबूत और दीर्घजीवी है बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती हैं कि शासन व्यवस्था जनता के जीवन में कैसा बदलाव लाती है। हमें यह स्मरण रखना है कि भारतीय गणतंत्र की यात्रा सतत जारी रहनी चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी भी है। यह 77वां गणतंत्र दिवस सिर्फ़ इस दायित्व को स्मरण करने काही अवसर नहीं हैं, बल्कि उससे आगे बढ़ कर यह संकल्प लेनेका भी है कि “हम भारत के लोग” अपने लोकतांत्रिक औरगणतांत्रिक मूल्यों को और अधिक गहराई से आत्मसात करें, उन्हें आचरण में उतारें, और यह सुनिश्चित करें कि शासन की हरदिशा और हर निर्णय के केंद्र में जनता और उसका कल्याण हीसर्वोपरि रहे।