Text of RM’s speech at the ‘Shri Guru Parv Mahamahotsav and Sant Sammelan’ in Ayodhya.
एक बार सभी बोलेंगे – सियावर रामचंद्र की जय।
सबसे पहले, मैं, हम सबके आराध्य, प्रभु श्री राम को, और उनकी जन्मभूमि, अयोध्या जी को नमन करता हूँ।
यह वह भूमि है, जहाँ माता सरयू की पावन धारा के रूप में, सनातन की आध्यात्मिक चेतना सदियों से प्रवाहित होती आ रही है।
यह वह भूमि है, जिसे भगवान श्रीराम ने अपने चरणों से पावन किया, जहाँ से रामराज्य की परिकल्पना ने सम्पूर्ण मानवता को एक आदर्श शासन व्यवस्था का मार्ग दिखाया।
इस पुण्यभूमि पर स्थित, श्री उदासीन संगत ऋषि आश्रम में, आप सभी संतों के बीच आकर, मैं स्वयं को धन्य अनुभव कर रहा हूँ।
संतों के बीच आना, किसी पुण्यकर्म और ईश्वर के आशीर्वाद से कम नहीं है।
हमारे यहाँ तो कहा भी गया है, “बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता।” आप सब संतों के बीच मेरा आना हुआ है, तो निश्चित ही मैं इसे ईश्वर की प्रत्यक्ष कृपा मानता हूँ।
मैं श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा निर्वाण, और श्री उदासीन संगत ऋषि आश्रम, के समस्त संत-महात्माओं, पदाधिकारियों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। आपने मुझे इस पावन भूमि पर आमंत्रित करके, मुझे कृतार्थ किया है।
यहाँ आना, मेरे लिए एक आध्यात्मिक यात्रा के समान है, एक ऐसी यात्रा जो मुझे मेरी जड़ों से जोड़ती है, जो मुझे उस अयोध्या से जोड़ती है, जिसमें भारत की आत्मा बसती है।
साथियों, अयोध्या को मैं सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं समझता। अयोध्या एक चेतना है, एक संस्कृति है, एक सभ्यता है। जिस प्रकार सूर्य, पूर्व से उदित होकर समस्त जगत को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार इस अयोध्या नगरी से धर्म, न्याय, और मर्यादा का प्रकाश समस्त भारतवर्ष में, समस्त विश्व में प्रसारित हुआ। आज जब पूरी दुनिया भारत की संस्कृति का पुनरुत्थान देख रही है, तब अयोध्या एक बार फिर अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त कर रही है। और अयोध्या के इस गौरव में, हमारी संत परंपरा का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
मैं उदासीन परंपरा के पूज्य संतों का, उनके मार्गदर्शन के लिए आभार प्रकट करता हूँ। उदासीन परंपरा सनातन धर्म की वह जीवंत धारा है, जिसने सदियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना को पोषित किया है। जब भी उदासीन परम्परा का नाम, मेरे जेहन में आता है, तो मेरा ध्यान इस नाम पर कुछ देर के लिए ठहरता है। आमतौर पर ‘उदासीन’ शब्द का प्रयोग Neutral, बुझे हुए, या निष्क्रिय भाव के लिए किया जाता है। लेकिन व्याकरण के विद्वान बताते हैं, कि ‘उदासीन’ शब्द ‘उत्’ और ‘आसीन’ से मिलकर बना है। ‘उत्’ का अर्थ है उत्कृष्ट, यानी एकदम ऊँचाई पर; और ‘आसीन’ का अर्थ है, विद्यमान, विराजमान, यानी बैठा हुआ।
अर्थात् जो जीवन-जगत से कहीं ऊपर, उससे परे जाकर विद्यमान है, वह उदासीन है। उदासीन होना सबके बस की बात नहीं; यह अपने आप में एक परम स्थिति है। ‘उदासीन’ शब्द का अर्थ होता है, वह जो सांसारिक मोह-माया से परे हो, जो ब्रह्म में लीन हो। लेकिन यह उदासीनता संसार से भागने जैसा नहीं, बल्कि संसार के मोह से मुक्त होकर, संसार की सेवा करने जैसा है। आदि शंकराचार्य जिसे ‘स्वदेशो भुवनत्रयम्‘ कहते हैं, यानि कि ये तीनों लोक मेरे अपने देश हैं, मेरे घर हैं, परिवार हैं। यह वह परंपरा है, जिसने भारतीय संस्कृति की रक्षा और संवर्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, तथा अपनी शैव परंपरा को आज तक जीवंत बनाए रखा है। इसके लिए आप सभी प्रशंसा और श्रद्धा के पात्र हैं।
साथियों, भारत की सभ्यता की एक बड़ी विशेषता यह रही है, कि यहाँ ज्ञान को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा गया। ज्ञान को परम्परा बनाया गया। उस परम्परा को संस्कार बनाया गया। और फिर संस्कार को, शिक्षा के माध्यम से, समाज के व्यवहार में उतारा गया।
शिक्षा किसी भी सभ्यता की रीढ़ होती है। और जब शिक्षा का माध्यम संस्कृत जैसी देवभाषा हो, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मुझे बताया गया, कि श्री नारायण संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना, 1912 में बाबा श्री केशवराम जी महाराज ने की थी। और उस परम्परा को, आज तक यहाँ के संत, यहाँ के आचार्य निभा रहे हैं।
मैं इस अवसर पर, श्री महंत डॉ० स्वामी भरत दास जी महाराज को हृदय से बधाई देता हूँ। उनके नेतृत्व में यह आश्रम निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। मैं आश्रम के सभी संतों, ब्रह्मचारियों, कर्मचारियों एवं श्रद्धालुओं को भी बधाई देता हूँ जिनके सामूहिक प्रयासों से यह संभव हुआ है।
ये जो पूरी परम्परा है, इसका एक महत्वपूर्ण आधार संस्कृत है। संस्कृत को केवल एक भाषा नहीं समझा जाना चाहिए। संस्कृत के पास भारत की ज्ञान-परम्परा का एक विशाल भंडार है। वेदों से लेकर उपनिषद तक, दर्शन से लेकर व्याकरण तक, आयुर्वेद से लेकर गणित तक, ज्योतिष से लेकर साहित्य तक, न्याय से लेकर मीमांसा तक, भारतीय ज्ञान-परम्परा का एक बड़ा हिस्सा, संस्कृत के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा, और विश्व की बौद्धिक परंपराओं को इसने समृद्ध किया। संस्कृत हमारे अतीत की स्मृति अवश्य है, लेकिन उससे भी अधिक यह हमारे भविष्य की संभावनाओं की भाषा है।
साथियों, आज दुनिया तकनीकी रूप से बहुत आगे निकल गई है। लेकिन मनुष्य के सामने प्रश्न अभी भी वही हैं। मैं क्या हूँ? मैं कौन हूँ और मैं क्यों हूँ?
और सही मायनों में देखा जाय तो, आज दुनिया में सबसे अधिक जानने की ज़रूरत भी यही है, कि मैं कौन हूँ। हम दुनिया के हर कोने से जुड़े हुए हैं, हर बात से जुड़े हुए हैं, लेकिन बस अपने से नहीं जुड़े हुए हैं। यही आज का सबसे बड़ा संकट है।
अपने आप को जानने की जिज्ञासा आज की नहीं है; यह सदियों से हमारी संस्कृति का केंद्र रही है। हमारी पूरी परंपरा इसी पर टिकी है, जो अपने आप को जान गया, वह सब कुछ जान गया। और यहीं पर हमारी गुरु परम्परा की भूमिका सामने आती है।
आपको स्मरण होगा, स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के बचपन का एक प्रसंग आता है। दयानन्द सरस्वती जी के बचपन का नाम ‘मूल शंकर’ था। बताते हैं, कि एक बार ज्ञान की प्राप्ति के लिए, वह स्वामी विरजानंद महाराज जी की कुटिया पर पहुँचते हैं। दरवाजा खटखटाते हैं।
भीतर से गुरु विरजानंद जी की आवाज आई, ‘कौन?’
इस पर मूलशंकर कहते हैं, ‘मैं यही जानने तो आया हूँ, कि मैं हूँ कौन। मालूम ही होता तो यहाँ आता ही क्यों।’
फिर गुरूजी ने सहर्ष उनको अंदर बुलाया, कि आओ बेटा, तुम्हारा ही इंतज़ार था। उन्हें अपना शिष्य बनाया, और दुनिया ने मूलशंकर को स्वामी दयानन्द सरस्वती बनते देखा। यही वह जिज्ञासा है, जो मनुष्य को स्वयं तक ले जाती है, और यही गुरु होते हैं, जो मनुष्य को, स्वयं तक पहुँचाने में सहायक होते हैं।
मैं कौन हूँ। यह जो “मैं” है, वह बड़ा ही गूढ़ विषय है। महाभारत के युद्ध के बाद, एक प्रसंग में कर्ण, भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं-
“भक्त: अर्थे धनं क्षीणं, स्व–दारा–गत यौवनम्।
स्वामि कार्ये गताः प्राणा, अन्ते तिष्ठ माधवः।”
यानी कि हे कृष्ण, मेरा धन भक्ति के कार्य में चला जाए, मेरा शरीर परिवार के लिए हो जाए, और मेरे प्राण, मेरे स्वामी के कार्य में चले जाएँ। लेकिन अंत में हे कृष्ण! आप मेरे लिए प्राप्तव्य वस्तु के रूप में शेष रहें।
यह बड़ा विचारणीय प्रसंग है। धन भक्ति में चला जाए, अर्थात् मैं धन नहीं हूँ। यौवन और शरीर परिवार के लिए हो जाए, अर्थात् मैं शरीर भी नहीं हूँ। प्राण स्वामी के कार्य में चले जाएँ, अर्थात् मैं प्राण भी नहीं हूँ। इन सब के बाद जो कुछ बच रहा है, कर्ण कहते हैं, उस ‘मैं’ को कृष्ण की प्राप्ति हो। यानि वह जो ‘मैं’ है, वह धन, शरीर और प्राण, इन तीनों से भी कहीं अलग है, कहीं परे है। इन सबके परे भी एक ऐसी चेतना का विचार किया गया है, जिसे भारतीय दर्शन में आत्मा और ब्रह्म के संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया है। उसी आत्मबोध की यात्रा में गुरु हमारा मार्गदर्शन करते हैं।
यानि, गुरु वह नहीं है जो आपको दुनिया का ज्ञान कराए; गुरु वह है जो आपको स्वयं का ज्ञान कराए।
गुरु वह नहीं है जो आपको बाह्य जगत से जोड़े, गुरु वह है जो आपको आपके अंतर्जगत से जोड़े।
गुरु वह नहीं है जो आपको प्रकाश का दीया दिखाए; जो आपके भीतर ज्ञान का प्रकाश जगा दे।
आज पूरी दुनिया का ज्ञान कुछ सेकंड में हमारे पास आ सकता है। लेकिन प्रश्न यह है, कि क्या उस ज्ञान को सही दिशा देने वाला विवेक भी हमारे भीतर विकसित हो रहा है? यहीं पर हमारे संतों का महत्व हमें दिखाई देता है। संत हमें दृष्टि देते हैं। संत हमारे प्रश्नों के सभी उत्तर नहीं देते। संत कई बार हमें ऐसे प्रश्न दे देते हैं, जिनसे जीवन के सही उत्तर खोजने की यात्रा शुरू होती है।
साथियों, भारत की संस्कृति के विषय में, हमारे संतों के विषय में, और हमारे गुरुओं के विषय में कुछ भी कहना सूरज को दीया दिखाने के समान है। लेकिन फिर भी, आज इस अवसर पर कुछ बातें कहनी आवश्यक है, क्योंकि हम जिस संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं, उसकी महानता को हम स्वयं ही कभी-कभी भूल जाते हैं। भारत की संस्कृति में हमारे संतों का जो स्थान रहा है, वह अद्वितीय रहा है। बहुत कम लोग इस पर ध्यान दे पाते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है, कि हमारे संत ही भारतवर्ष के स्मृतिकार हैं। भारत की स्मृतियाँ संतों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती आई है। हमारे संतों ने, हमें अपनी संतानों की तरह प्रेम, ज्ञान और शांति का पाठ पढ़ाया।
साथियों, हम अयोध्या की पुण्यभूमि पर हैं। वर्षों का संघर्ष, एक भव्य रूप में आज हमारे सामने है। भगवान रामलला अपने घर में विराजमान हो चुके हैं। लेकिन यहाँ की संत परंपरा है, वह 500 से अधिक वर्षों से, लगातार श्रीराम जन्मभूमि से जुड़े, विभिन्न आंदोलनों की सहयोगी रही है। रानोपाली आश्रम भी, पंजाब प्रांत के निहंग संतों, एवं देश के उदासीन संतों के द्वारा, राम मंदिर से जुड़े योगदानों एवं गतिविधियों का केंद्र बना रहा।
हमारे संतों ने जेल की यातनाएँ सहीं, अपने प्राणों की आहुति तक दी। और आज जब रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हैं, तब हमें उन संतों का भी स्मरण करना चाहिए जिनके त्याग और बलिदान से यह संभव हुआ। यानी कि शिक्षा, धर्म और संस्कृति, तीनों ही क्षेत्रों में हमारे संतों ने योगदान दिया, और आज तक हमारा मार्गदर्शन भी करते आ रहे हैं।
साथियों, आज श्री गुरु पर्व महामहोत्सव भी है। अर्थात, आज का दिन यहाँ पर गुरुजनों को भी समर्पित है। यह गुरु पर्व हमें उस परंपरा से जोड़ता है, जो सनकादि ऋषियों से लेकर आज तक अविरल प्रवाहित हो रही है। संतों और गुरुओं का यह समागम है। ऐसे में, मैं एक बात पर अपने विचार रखना चाहूँगा।
आम तौर पर संत और गुरु को अलग-अलग करके देखा जाता है। भारतीय संस्कृति में जब हम ‘संत’ और ‘गुरु’ शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में दो अलग-अलग चित्र उभरते हैं। संत का स्मरण होते ही त्याग, तपस्या, करुणा, सरलता और ईश्वर-चिंतन का भाव आता है। वहीं गुरु का नाम लेते ही ज्ञान, मार्गदर्शन, शिक्षा और दिशा का विचार मन में आता है। लेकिन यदि इन दोनों शब्दों के गहरे अर्थ में उतरें, तो पता चलता है कि इनके बीच कोई कठोर विभाजन नहीं है। दोनों की यात्रा का केंद्र मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर, भ्रम से स्पष्टता की ओर और बाहरी जीवन से भीतर की चेतना की ओर ले जाना है।
संत और गुरु की समानता का एक महत्वपूर्ण आधार यह है, कि दोनों व्यक्ति को स्वयं से मिलाने का काम करते हैं। आप देखिये, कि मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या कई बार बाहरी परिस्थितियाँ नहीं होतीं, बल्कि उसके भीतर का भ्रम होता है। वह स्वयं को दूसरों की दृष्टि से देखने लगता है। वह सफलता को ही अपनी पहचान समझ लेता है। असफलता को अपना अंत मान लेता है। तुलना, भय, अहंकार और अपेक्षाएँ उसके भीतर लगातार शोर पैदा करती रहती हैं।
ऐसे में एक संत उस शोर के बीच शांति का अनुभव कराता है। और एक गुरु उस शांति तक पहुँचने का मार्ग समझाता है। इसलिए संत और गुरु दोनों की भूमिका अंततः मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाने की है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी, कि संत में गुरु छिपा होता है और गुरु में संतत्व छिपा होता है। दोनों का सार मनुष्य को उसके भीतर के अंधकार से निकालकर उसके भीतर के प्रकाश तक पहुँचाना है।
श्री नारायण संस्कृत महाविद्यालय आज जिस स्तर पर पहुँचा है, उसके पीछे गुरु रूपी हमारे संतगण, और संत रूपी हमारे गुरुजनों का आशीर्वाद है। किंतु हमें अभी और आगे बढ़ना है। हमें इस महाविद्यालय को और अधिक व्यापक और विस्तृत करने का लक्ष्य रखना चाहिए।
मैं यहाँ के सभी बच्चों को भी देवभाषा संस्कृत के अध्ययन पर बधाई देता हूँ। इस महाविद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों को देखकर मन में यही भाव आता है, कि यही तो इस देश का भविष्य हैं। यही तो वो बच्चे हैं, जो राष्ट्र को आगे ले जाएंगे, इस देव भाषा के गौरव को आगे बढ़ाएंगे। और भविष्य में संस्कृत और संस्कृति, दोनों की सेवा करेंगे।
साथियों, हमारी सरकार ने संस्कृत के अध्ययन को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने पर विशेष बल दिया है। मेरा मानना है, परम्परा को संरक्षित करने का सबसे अच्छा तरीका यही है, कि उसे वर्तमान समय की जरूरतों से जोड़ दिया जाए।
क्योंकि आने वाली पीढ़ी को केवल अतीत जानना पर्याप्त नहीं है। उसे अतीत से शक्ति लेकर भविष्य का निर्माण करना है। हमें ऐसे विद्यार्थी चाहिए जो संस्कृत के श्लोक को भी समझें और कंप्यूटर के कोड को भी समझें। जो वेदों के मंत्रों की गहराई को भी समझें, और आधुनिक विज्ञान की भाषा को भी समझें। जो न्याय और मीमांसा पढ़ें, साथ ही आधुनिक समाज की समस्याओं को समझने की क्षमता भी रखें।
साथियों, हम सब अक्सर आधुनिक सोच की बात करते हैं। लेकिन आधुनिक सोच का सही reflection, “आधुनिक शिक्षा” के रूप में हमें देखने को मिलता है। हम अक्सर “आधुनिक शिक्षा” की बातें करते हैं। लेकिन उस आधुनिक शिक्षा के मर्म को हम समझ नहीं पाते, कि सही मायनों में आधुनिक होने का अर्थ क्या होता है?
क्या आधुनिक होने का अर्थ केवल नई तकनीक का उपयोग करना है? या फिर क्या आधुनिक होने का अर्थ केवल अंग्रेजी बोलना है? नहीं। मेरे विचार से आधुनिक होने का वास्तविक अर्थ है, नई चुनौतियों को समझने की क्षमता। आधुनिक होने का वास्तविक अर्थ है, नई परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की क्षमता। और आधुनिक होने का वास्तविक अर्थ है, अपने समय की समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता।
अगर हमारी परम्परा हमें यह सिखाती है, कि मानव जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि व्यापक कल्याण भी है, तो वह परम्परा आधुनिक समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है। बल्कि शायद आज के दौर में पहले से अधिक प्रासंगिक है।
संस्कृत शिक्षा का प्रसार देश के प्रत्येक कोने में करना होगा। हमें ऐसे विद्यार्थी तैयार करने होंगे, जो संस्कृत के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में भी पारंगत हों। मुझे पूरा विश्वास है, कि आप इस दिशा में प्रयास करेंगे, और जरूर सफल होंगे।
आज इस पावन अवसर पर मुझे जो स्नेह आप सभी विद्वानों के द्वारा मिला है, वह मेरे लिए अविस्मरणीय है। मैं एक बार पुनः श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा निर्वाण, अयोध्या एवं श्री उदासीन संगत ऋषि आश्रम, रानोपाली, अयोध्या के समस्त संतों, पदाधिकारियों एवं आयोजकों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
मैं श्री महंत डॉ० स्वामी भरत दास जी महाराज को विशेष धन्यवाद देता हूँ, जिनके नेतृत्व में यह आश्रम निरंतर उन्नति कर रहा है। मैं आश्रम के सभी संतों, ब्रह्मचारियों, कर्मचारियों एवं श्रद्धालुओं को, सनातन और समाज के प्रति, उनकी कर्तव्यनिष्ठता के लिए बधाई देता हूँ।
यह आश्रम दिन-प्रतिदिन उन्नति करता रहे, हमारे संतों का मार्गदर्शन हमें लगातार मिलता रहे, हमारी संस्कृत और हमारी संस्कृति का लगातार संवर्धन होता रहे, इन्हीं कामनाओं के साथ, मैं अपना निवेदन समाप्त करता हूँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद।