Speech at the Launch Ceremony of the Book ‘Mahamantra’ in New Delhi.
सबसे पहले, परम आदरणीय साक्षी श्री महाराज जी के चरणों में मैं अपना प्रणाम निवेदित करता हूँ।
आज इस गीता-संजीवनी रूपी पुस्तक ‘महामंत्र’ के विमोचन कार्यक्रम में आप सबके बीच आना, मेरे लिए बड़ा ही दिव्य अनुभव वाला है। साथ ही यह कार्यक्रम, अपने आपमें आत्म-चिंतन के एक विशिष्ट शिविर जैसा है।
स्वयं के ऊपर चिंतन करना हो, तो ‘गीता’ से बड़ा, और पुनीत ग्रंथ भला और क्या हो सकता है।
अखिल ब्रह्मांड के नायक, जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्ण जी के साक्षात् श्रीमुख से उच्चरित गीता को, नए, आधुनिक और सहज रूप में प्रस्तुत करने के लिए, मैं इस पुस्तक के लेखक, परम श्रद्धेय साक्षी श्री जी को, अपने हृदय की गहराइयों से नमन करता हूँ, आपको साधुवाद देता हूँ।
संयोग देखिए, कि आपका भी मूल नाम श्रीकृष्ण है। राम श्रीकृष्ण उपाध्याय। यानि द्वापर के श्रीकृष्ण जी की गीता की व्याख्या, कलियुग में भी स्वयं श्रीकृष्ण जी ही कर रहे हैं, इससे सुखद बात और क्या हो सकती है।
आपका जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण है, कि भारतीय दर्शन, और दार्शनिक परंपरा कैसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहती है, फलती फूलती है और समृद्ध होती है। आपने जिस प्रकार से स्वामी सुदर्शनाचार्य जी महाराज से दीक्षा लेकर, इस जीवंत परंपरा को आगे बढ़ाया है, वह अत्यंत प्रेरणादायी है।
आपमें से अनेक लोग अवगत भी होंगे, कि साक्षी श्री जी, किसी समय में सरकारी सेवा में भी रहे हैं। वहाँ इन्होंने समाज के हर वर्ग को देखा, समझा, और फिर जब उन्होंने पाया कि वहाँ से जो संतुष्टि मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिल रही, तो वे आध्यात्मिक सेवा की ओर उन्मुख हुए।
अब यह प्रश्न उठता है, कि सरकारी सेवाओं में तो आमतौर पर जीवन जीने की सारी मूलभूत सुविधाएं तो व्यक्ति को मिल ही जाती हैं, तो फिर आखिर कौन सी बात थी, जो साक्षी श्री जी को अध्यात्म की ओर ले गई। ऐसा क्या बचा रह गया था जिसे पाने की आकुलता थी और महाराज जी इस दिशा में आगे बढ़े। जहाँ तक मैं समझता हूँ, वह प्रेरक तत्व है, ‘स्वधर्म की खोज’।
साथियों, जब बाहरी दुनिया की सारी उपलब्धियाँ होते हुए भी, भीतर की आत्मा तृप्त नहीं होती, तब मनुष्य स्वधर्म की ओर लौटता है। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर के प्रश्नों को सुनना सीख जाता है, उसी दिन उसकी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा शुरू हो जाती है। यही वह यात्रा होती है, जो राम श्रीकृष्ण उपाध्याय जी को ‘साक्षी श्री’ बना देती है। साक्षी श्री जी ने ‘साइंस डिवाइन फाउंडेशन’ के माध्यम से लोगों को जिस तरह से enlightened किया है, वह अद्वितीय है। आपका आत्मीयता से भरा व्यक्तित्व, और आपकी स्पष्टता, आपको एक ‘जीवंत व्यक्तित्व’ बनाती है। इस पुस्तक के माध्यम से आपने जो विचार रखे हैं, वह निश्चित रूप से हमारे युवाओं के लिए एक inspiration होगा।
साथियों, वैसे तो गीता पर, और उसके सारामृत पुस्तक ‘महामंत्र’ पर अभी काफी कुछ कहा जा चुका है, फिर भी, गीता को मैं जिस दृष्टि से देख पाया हूँ, जो समझ पाया हूँ, और जितना जीवन में उतार पाया हूँ, और इस पुस्तक में गीता का जो वैशिष्ट्य मैंने देखा, उस पर थोड़ी बहुत बात आपसे मैं जरूर करना चाहूँगा।
हम सब जानते हैं, कि महाभारत के युद्ध में, अर्जुन की दुविधाओं को खत्म करने के लिए, अर्जुन के संशयों का समाधान करने के लिए, भगवान कृष्ण ने, गीता का उपदेश दिया। लेकिन गीता केवल अर्जुन को दिया गया उपदेश नहीं है, वह हम सबके जीवन का दर्पण है। कुरुक्षेत्र, अर्जुन और कृष्ण तब भी थे; आज भी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज कुरुक्षेत्र हमारे बाहर कम, और हमारे भीतर अधिक है।
कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले अर्जुन के दिमाग में जो बातें चल रही थीं, वैसी दुविधाएँ हमारे मन में भी चलती हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, और न जाने कितनी तरंगें एक व्यक्ति के मस्तिष्क में चलती हैं। ये सभी वृत्तियाँ हैं, और यही हमें व्याकुल करती हैं, हमें नचाती हैं। यहीं गीता मुझे एक प्रकाश स्तंभ की तरह दिखाई देती है।
अपने सीमित अध्ययन में मैंने देखा है, कि गीता एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जहाँ मानव की वृत्तियों पर इतनी गहराई से बात की गई है। आपने महामंत्र ‘दो’ में इसकी चर्चा की भी है। कहीं यह ‘राग’ और ‘द्वेष’ के रूप में है, कहीं यह ‘सतोगुण’, ‘रजोगुण’, और ‘तमोगुण’ के रूप में है। पर वास्तव में वह है मानव की वृत्ति ही, जिससे मानव संचालित होता है। मुझे लगता है, कि मनुष्य एक बार को अपने धर्म से, अपने ज्ञान से विमुख हो सकता है, लेकिन अपनी वृत्तियों से विमुख होना बहुत कठिन हो जाता है।
जैसे इसका एक उदाहरण मैं आपको देता हूँ। आप सब वो घटना याद करिये, जब भगवान श्रीकृष्ण, दुर्योधन को समझाने जाते हैं। भगवान, दुर्योधन से धर्म-अधर्म की चर्चा करते हैं। तो उस दौरान दुर्योधन ने एक बड़ी स्पष्ट बात कही। दुर्योधन ने कहा, कि “जानामि धर्मम्, न च मे प्रवृत्तिः, जानामि अधर्मम्, न च मे निवृत्तिः।“ यानी, ‘कृष्ण! आप मुझे धर्म और अधर्म का ज्ञान देने आए हैं? आपको लगता है कि मुझे इसका ज्ञान नहीं है? अरे मैं भी उन्हीं गुरु का शिष्य रहा हूँ, जिनके शिष्य धर्मराज युधिष्ठिर रहे हैं, और आप मुझे धर्म-अधर्म का पाठ पढ़ा रहे हैं? ‘जानामि धर्मम्, न च मे प्रवृत्तिः, मैं भली-भांति जानता हूँ कि धर्म क्या है, लेकिन क्या करूं, मेरी उसमें प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती। और मैं यह भी जानता हूँ, कि अधर्म क्या है, लेकिन मैं उससे निवृत्त ही नहीं हो पाता, वह मुझसे छूट ही नहीं पाता है। ऐसा लगता है जैसे कोई और दैव मेरे भीतर बैठकर यह सब करवाता है, मैं क्या करूं? यह है वृत्ति, यह है गुण।
और साथियों, यह केवल दुर्योधन की विडंबना नहीं है। यह कइयों की विडंबना है। चोर को पता होता है कि चोरी करना गलत है, लेकिन फिर भी वह चोरी करता है। लोग जानते हैं, कि झूठ बोलना गलत है, लेकिन झूठ बोलते हैं। लोग जानते हैं, कि भ्रष्टाचार पाप है, लेकिन भ्रष्टाचार करते हैं। लोग जानते हैं, कि दूसरों का अहित करना अधर्म है, लेकिन करते हैं। मनुष्य को पता होता है, कि झूठ बोलना, निंदा करना, दूसरों का अहित करना, ये सब चीज़ें गलत है, लेकिन उसकी वृत्ति ही वही होती है। उसका ज्ञान उसकी वृत्ति के आगे कहीं खो जाता है। यही वृत्ति की शक्ति है। यही वृत्ति का खेल है।
तो ऐसे में प्रश्न यह उठता है, कि क्या इस वृत्ति से कभी पार पाया जा सकता है? क्या इस चक्र से बाहर निकला जा सकता है? गीता में इसका उत्तर हमें मिलता है और मैं साक्षी श्री जी को बधाई देता हूँ, कि उन्होंने इन प्रश्नों का समुचित उत्तर इस पुस्तक में दिया है।
गीताजी कहती हैं, योगः कर्मसु कौशलम्। यानी योग, कर्म में कुशलता है। और कर्म में कुशलता तब आती है, जब हमारी वृत्तियाँ शांत हों। जब हमारा चित्त स्थिर हो। जब हम कर्म करते हैं, लेकिन फल की आसक्ति से मुक्त होकर करते हैं।
जब हम कर्तव्य करते हैं, लेकिन अहंकार के बिना करते हैं, तो हमारी वृत्तियाँ अपने-आप नियंत्रण में आ जाती हैं।
और यह सिद्धांत केवल कोई आध्यात्मिक सिद्धांत नहीं है। यह राजनीतिक सिद्धांत भी है, सामाजिक सिद्धांत भी है और राष्ट्रीय सिद्धांत भी है।
जब हम राष्ट्र की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा, कि राष्ट्र भी एक चित्त ही है। राष्ट्र रूपी उस चित्त में भी कई वृत्तियाँ होती हैं। और यदि राष्ट्र की वृत्तियाँ शांत नहीं हैं, यदि राष्ट्र का चित्त स्थिर नहीं है, तो राष्ट्र कभी महान नहीं बन सकता।
आज भारत की वृत्तियाँ बदल रही हैं। आज भारत जिस मोड़ पर खड़ा है, वह अवसरों का क्षण है। आज हमारे युवा देश की पहचान पर गर्व कर रहे हैं। आज हमारे वैज्ञानिक चंद्रयान से लेकर गगनयान तक को साकार कर रहे हैं। आज हमारे स्टार्टअप, दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। यह सब तब हो रहा है, जब हमारी वृत्तियाँ सकारात्मक हैं। जब हमारा चित्त राष्ट्र निर्माण की ओर लगा है।
लेकिन साथियों, खतरा अभी टला नहीं है। निंदा की वृत्ति, अविश्वास की वृत्ति, भय की वृत्ति, अहंकार की वृत्ति, ये सभी हमें भीतर से कमजोर कर सकती हैं। हमें इनसे बचना होगा, और इनसे बचने में गीता एक सशक्त माध्यम हो सकती है।
मैं साक्षी श्री जी को, इस बात के लिए धन्यवाद देता हूँ, कि इन्होंने इस पुस्तक में, गीता के अनेक ऐसे अमृत-बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है, जो आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं। इस पुस्तक में न केवल गीता की व्याख्या की गई है, बल्कि उसे आधुनिक जीवन से भी जोड़ा गया है। यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं है। यह जीने के लिए है।
ऐसा कहने के पीछे मेरा निजी अनुभव भी है। मैं पेशे से एक शिक्षक रहा हूँ, physics का student रहा हूँ। किताबें पढ़ने की मेरी आदत रही है। पर सार्वजनिक जीवन में आने के बाद, तमाम व्यस्तताओं के कारण, कई बार किताब के कुछ पन्ने ही पलट पाता हूँ। लेकिन जब इस पुस्तक को मैंने अपने हाथ में लिया, और जब मैं इसके पन्ने पलटने लगा, तो पढ़ते-पढ़ते कब आधी पुस्तक खत्म हो गई, मुझे पता ही नहीं चला। मतलब एक तरीके से, मन को बांध लेने की शक्ति इस पुस्तक में मुझे दिखी। ऐसा नहीं है, कि मैंने गीता पहले कभी पढ़ी ही नहीं थी। लेकिन जिस तरह से गीता को एक नए आयाम के साथ, इस पुस्तक में, साक्षी श्री जी ने प्रस्तुत किया है, उसके लिए आप निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं।
साथियों, जब मैं इस पुस्तक के पन्ने पलट रहा था, तो मेरे मस्तिष्क में एक बात आई। मुझे लगता है कि लगभग सभी के घर में गीता रखी हुई होगी, सबने उसके पन्ने तो पलटे ही होंगे। और हजारों वर्षों से गीता का ज्ञान हम सबके घर-घर में है। ‘गीता’ और ‘रामायण’ आदि हमारे यहाँ, कोई भी, जीवन में बिलकुल ‘पहली बार’ नहीं सुनता है। यानि आप किसी से भी गीता आदि की चर्चा करें, तो वह उसे कभी न कभी जरूर सुना हुआ होता है। पहली बार कब सुना होता है, यह याद भी नहीं होता है, लेकिन सुना जरूर हुआ होता है।
लेकिन आपने एक बात पर गौर किया होगा, कि जब भी हम गीता को समझने का प्रयास करते हैं, तो हमें किसी न किसी माध्यम की, किसी न किसी गुरु की आवश्यकता पड़ती है।
जैसे, सीधे-सीधे गीता के श्लोक और उसके अर्थ पढ़ लेने की बजाय, हमें उन अर्थों की रसप्रद, और प्रासंगिक व्याख्याएं ज्यादा रुचिकर लगती हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि गीता का ज्ञान एक बार सुन लेने से समाप्त नहीं होता। वह हर बार हमारी चेतना के एक नए स्तर पर खुलता है।
कृष्ण ने अर्जुन को गीता सुनाई थी, लेकिन हर मनुष्य अर्जुन नहीं है। अर्जुन के सामने जो परिस्थिति थी, जो उनका मन था, जो उनका जीवन-अनुभव था। लेकिन हमारे प्रश्न अलग हैं, हमारी उलझनें अलग हैं, और हमारी चेतना का स्तर भी अलग है।
इसलिए एक ही गीता रहते हुए भी, हमारे लिए उसका अर्थ बदलता रहता है। और यहीं गुरु की आवश्यकता सामने आती है। एक गुरु गीता में कुछ जोड़ते नहीं, वो सिर्फ हमारी दृष्टि को विस्तृत करते हैं।
जैसे कोई एक व्यक्ति गीता पढ़ता है, तो उसे उसमें कर्म का महत्त्व दिखाई देता है। दूसरा कोई पढ़ता है, तो उसे ज्ञान दिखाई देता है। तीसरा कोई उसमें भक्ति देखता है। चौथा, उसमें जीवन के संघर्षों का समाधान देखता है। और कोई उसी गीता में आत्मा, प्रकृति, चेतना और परम सत्य के प्रश्नों को देख लेता है। लेकिन देखने और समझने वाले की दृष्टि को विस्तृत करने का काम, गुरु करते हैं। गुरु हमें केवल यह नहीं बताते कि किसी श्लोक का अर्थ क्या है। वह हमें यह देखने की क्षमता देते हैं, कि उस अर्थ के और कितने आयाम हो सकते हैं।
जैसे एक बच्चा समुद्र को देखता है, तो उसे केवल बहुत सारा पानी दिखाई देता है। लेकिन एक नाविक उसी समुद्र में रास्ते देखता है। एक वैज्ञानिक उसमें धाराएँ, तापमान और ecology देखता है। एक कवि उसमें सौंदर्य देखता है। समुद्र एक ही है। अंतर समुद्र में नहीं, देखने वाली आँखों में है। गीता भी ऐसी ही है। हमारी चेतना जितनी विस्तृत होती जाती है, गीता का अर्थ उतना ही गहरा होता जाता है। और गुरु हमारी चेतना को उसी दिशा में विस्तृत करने में सहायता करता है।
गुरु हमारे सामने गीता का कोई दूसरा संस्करण नहीं रखते। वह उसी गीता को एक नई दृष्टि से देखने की क्षमता देते हैं। गुरु वह हैं, जो हमारे सामने गीता के नए द्वार खोलते हैं। हम गीता के एक द्वार से प्रवेश करते हैं। गुरु उसके कई द्वार दिखाते हैं।
जैसे, मान लीजिए आपने गीता का एक अंश पढ़ लिया, समत्वं योग उच्यते। यानी हर परिस्थिति में, सुख-दुःख में, एक समान रहना ही योग है। दसवें महामंत्र में आपने इसकी चर्चा की है। आपने यह पढ़ लिया, लेकिन यह श्लोक, पुस्तक से बाहर निकलकर, आपके जीवन में गुरु के सहारे ही उतर सकता है। गुरु ही बताएंगे, कि गीता केवल पढ़ने के लिए नहीं है। गीता देखने और जीने के लिए है, और यहाँ यह पुस्तक एक जीवंत गुरु का कार्य करती है।
इसी प्रकार, साक्षी श्री जी, इस पुस्तक के माध्यम से हमें 11 महामंत्र देते हैं। हर अध्याय अपने आप में एक सीख है। जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कहा, कि यह कार्यक्रम आत्मचिंतन के माध्यम की भांति है, इसलिए, इस मंच से, मैं देशवासियों, खासकर युवाओं और हमारे जेन जी मित्रों से भी स्व चिंतन का आग्रह करूँगा।
हमारे युवा इस देश का भविष्य हैं। हमारे युवाओं के पास ऊर्जा है, जोश है, सपने हैं। लेकिन उन्हें अपने भीतर की वृत्तियों को भी पहचानना होगा। आपको स्वधर्म खोजना होगा। आपको यह समझना होगा कि जीवन एक साधना है।
आज हमारे युवाओं के सामने एक बड़ी चुनौती, ‘तुलना’ की वृत्ति की है। आज हमारे युवा अपने जीवन को अपने अनुभवों से कम, और दूसरों के जीवन से अधिक मापने लगे हैं। सोशल मीडिया पर किसी की सफलता देखते हैं, तो उन्हें अपनी उपलब्धियाँ छोटी लगने लगती हैं। किसी को आगे बढ़ते देखते हैं, तो भीतर बेचैनी पैदा होती है। कभी हीनता आती है, कभी ईर्ष्या आती है और कभी यह लगता है, कि हम जीवन में पीछे रह गए हैं।
लेकिन हमें यह समझना होगा, कि जीवन कोई प्रतियोगिता नहीं है, जिसमें सभी को एक ही समय पर, एक ही स्थान पर पहुँचना है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी यात्रा है, अपनी परिस्थितियाँ हैं, अपनी क्षमताएँ हैं और स्वधर्म है।
प्रश्न यह नहीं है कि हमारे भीतर कौन-सी वृत्ति मौजूद है। प्रश्न यह है कि हम अपने भीतर किस वृत्ति को मजबूत कर रहे हैं। यही कारण है, कि मैं साक्षी श्री जी को हृदय से नमन करता हूँ, कि उन्होंने इस पुस्तक के माध्यम से गीता को केवल शास्त्र के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उसे हमारे आज के जीवन से जोड़ने का प्रयास किया है।
यह पुस्तक हमें गीता के श्लोकों से आगे जाकर उनके जीवनगत अर्थ को समझने की प्रेरणा देती है। जब हम परेशान हों, तब गीता हमें धैर्य देती है। जब हम भ्रम में हों, तब गीता हमें विवेक देती है। जब हम भय में हों, तब गीता हमें साहस देती है। और जब सफलता हमारे भीतर अहंकार पैदा करने लगे, तब गीता हमें विनम्रता का स्मरण कराती है।
मेरे विचार से इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह हमें बाहर की दुनिया बदलने से पहले अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा देती है। वैसे भी जब मनुष्य अपने भीतर झाँकना सीख जाता है, तब उसे यह समझ आने लगता है, कि उसकी सबसे बड़ी लड़ाई किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं है। उसकी सबसे बड़ी लड़ाई उसके अपने मन की उन वृत्तियों से है, जो उसे बार-बार अस्थिर करती हैं।
साथियों, आज मनुष्य बाहर की दुनिया से जितना जुड़ा हुआ है, उतना शायद ही कभी पहले जुड़ा था। एक click पर हम लोग पूरी दुनिया से जुड़े रहते हैं। लेकिन इसी भाग-दौड़ में एक बड़ा सवाल उठता है, कि पूरी दुनिया से तो हम जुड़े हुए हैं, लेकिन क्या हम ख़ुद से जुड़े हुए हैं? हम पूरी दुनिया की आवाज़ तो सुनते हैं, लेकिन क्या हमें अपने भीतर की आवाज़ सुनाई देती है? गीता इन सारे प्रश्नों का उत्तर देती है। गीता हमें बाहर से भीतर की ओर यात्रा कराती है।
गीता एक तरह से हमारे भीतर बैठे अर्जुन, और हमारे भीतर बैठे कृष्ण के बीच का संवाद है। अर्जुन हमारे मन हैं, जो संशय, भय, मोह और करुणा से भरे हुए हैं। कृष्ण हमारी अंतरात्मा हैं, हमारा विवेक हैं, हमारी चेतना हैं। जब हम गीता पढ़ते हैं, तो वास्तव में हम अपने ही भीतर बैठकर अपने ही मन से संवाद करते हैं।
गीता हमें यह सिखाती है, कि हम ही अपने सबसे बड़े मित्र भी हैं, और सबसे बड़े शत्रु भी। जब हम ख़ुद से जुड़ते हैं, तो हम अपने मित्र बन जाते हैं। जब हम ख़ुद से कटते हैं, तो हम अपने शत्रु बन जाते हैं। साक्षी श्री जी ने ‘महामंत्र’ में गीता को आत्म-संवाद का सूत्र बताया है। इस पुस्तक को पढ़ते समय आपको ऐसा लगेगा जैसे आप अपने ही भीतर की आवाज़ सुन रहे हों। यह पुस्तक हमारे भीतर के प्रश्न जगाती है, और उनके उत्तर भी भीतर से ही उभरने लगते हैं।
साथियों, एक बात पर आप सबने ध्यान दिया होगा। गीता का अवतरण कहाँ हुआ? कुरुक्षेत्र में। दो विशाल सेनाओं के बीच, युद्ध के उन्माद के बीच गीता का उपदेश हुआ। और यह अपने आप में एक चमत्कार है कि शांति के कई संदेश, उस युद्ध के मैदान से आए। हालाँकि यह विरोधाभास नहीं है, यह गहरा सत्य है। गीता अर्जुन को युद्ध से भागने की सलाह नहीं देती। वह उन्हें फल की आसक्ति, राग-द्वेष, अहंकार और भय के बिना, युद्ध करने की प्रेरणा देती है। और इसी को तो शांति कहते हैं। बाहर युद्ध चलता रहे, लेकिन निष्काम कर्म ऐसा हो, कि हमारे भीतर शांति बनी रहे।
निष्काम कर्म को साक्षी श्री गणित के सूत्र जैसा समझाते हैं। वह सूत्र भले ही देखने में बहुत छोटा है, लेकिन वह हमारे जीवन का सारा गणित सीधा कर देता है। और वह सूत्र है- ‘कर्म minus इच्छाएँ = निष्काम कर्म’
यह आत्म-विज्ञान का समीकरण है। हम सब कर्म करते हैं। कोई छोटा कर्म, कोई बड़ा कर्म। कोई घर का कर्म, कोई राष्ट्र का कर्म। सैनिक का कर्म सीमाओं की सुरक्षा करना है। शिक्षक का कर्म पढ़ाना है। किसान का कर्म अन्न उगाना है। वैज्ञानिक का कर्म शोध करना है। माता-पिता का कर्म बच्चे को सँवारना है। राजनेता का कर्म जनसेवा करना है। इस तरह से सब अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, अपने धर्म का पालन करते हैं।
लेकिन जब इन कर्मों के साथ, फल की आसक्ति, प्रशंसा की इच्छा, पुरस्कार और प्रतिष्ठा पाने की इच्छा जुड़ती है, तो इससे कर्म की भावना दूषित होती है। ये इच्छाएँ जब कर्म के साथ जुड़ जाती हैं, तब कर्म बंधन बन जाता है। मनुष्य कर्म तो करता है, लेकिन शांति नहीं पाता।
जब हम कर्म से इन इच्छाओं को, फल की आसक्ति को, अहंकार को, प्रशंसा की भूख को घटा देते हैं, तो जो शेष रहता है, वह निष्काम कर्म होता है।
हालाँकि इन बातों पर मनुष्य के मन में यह प्रश्न भी उठता है, कि तो फिर क्या हम कर्म न करें? क्या हम कोई इच्छा ही न रखें? क्या हम सपने ही न देखें?
इसका उत्तर तो यही हो सकता है कि हम सपने देखें, लेकिन वो सपने हमें इतना न बाँध दें, कि हम अपने कर्तव्य को ही भूल जाएँ। इच्छाएँ हमें इतनी बेचैन न कर दें, कि हम अपने स्वधर्म से ही भटक जाएँ। एक सैनिक सीमा पर खड़ा होता है, तो उसे मेडल की इच्छा नहीं होती, उसके पास कर्तव्य की प्रेरणा होती है। एक माँ अपने बच्चे की सेवा, किसी भी बदले की इच्छा के बिना करती है। ये सब निष्काम कर्म के जीवंत उदाहरण हैं।
और निष्काम कर्म का यह सूत्र केवल व्यक्तियों के लिए नहीं है। यह राष्ट्र के लिए भी है। यदि हमारे नेता, प्रशासनिक अधिकारी, सैनिक, शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, किसान, मजदूर, ये सब अपना कर्म निष्काम भाव से करें, तो राष्ट्र का चित्त स्थिर होगा। राष्ट्र की वृत्तियाँ शांत होंगी। और जब राष्ट्र की वृत्तियाँ शांत होंगी, तो राष्ट्र निश्चित रूप से और अधिक अग्रणी होगा।
इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम गीता को केवल पढ़ें नहीं, उसे अपने व्यवहार में उतारें। आइए, आज हम केवल यह संकल्प न लें कि हम गीता पढ़ेंगे। बल्कि यह संकल्प लें कि हम गीता को अपने जीवन में उतारेंगे। हम अपने मन को समझेंगे। अपनी वृत्तियों को पहचानेंगे। उन वृत्तियों को दिशा देंगे। अपने स्वधर्म का पालन करेंगे। और अपने कर्म को राष्ट्र तथा समाज के हित से जोड़ेंगे।
यह पुस्तक, जैसा कि मैंने पहले भी कहा, केवल एक पुस्तक नहीं है, यह एक दर्पण है। आप सब इसे पढ़ें, इसे जियें, और अपने जीवन को बदलें।
मैं साक्षी श्री जी को, उनके पूरे दल को, और इस पुस्तक के प्रकाशकों को हृदय से बधाई देता हूँ। साथ ही पुनः, आपको अपना प्रणाम निवेदित करते हुए, मैं अपना निवेदन समाप्त करता हूँ।
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद!