Text of RM’s speech at the 11th Convocation Ceremony, Babasaheb Bhimrao Ambedkar University, Lucknow.
मैं मानता हूँ कि विद्यालय और विश्वविद्यालय केवल शिक्षा के केंद्र नहीं होते, वे व्यक्तित्व निर्माण के केंद्र होते हैं। देश की समृद्धि का आधार होते हैं। वे बेहतर समाज का निर्माण करते हैं और राष्ट्र को आगे बढ़ने की दिशा देते हैं। और जब किसी संस्थान का नाम बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महान राष्ट्रनिर्माता से जुड़ा हो, तब उस संस्थान से यह अपेक्षा और भी बढ़ जाती है।
इसलिए इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसे युवाओं के निर्माण का भी होना चाहिए, जो Justice, Equality, Liberty और Fraternity के आदर्शों से प्रेरित होकर Nation Building में योगदान दें।
‘बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय’ के उन सभी विद्यार्थियों को मैं बधाई देता हूँ जो आज Degree प्राप्त कर रहे हैं। आज आप सभी की वर्षों की मेहनत और लगन सफल हो रही है।
आपकी इस सफलता के पीछे आपके माता-पिता, परिवारजनों और शिक्षकों का भी योगदान है। मैं उन सभी को भी हार्दिक बधाई देता हूँ। आप भी, आज उनका आभार व्यक्त करना मत भूलिएगा।
साथियों,
ऐसा कहा जाता है कि असली शिक्षा वह है, जो व्यक्ति के Head, Heart और Hand—तीनों का विकास करे। Education of Head यानी सोचने और समझने की शक्ति का विकास। Education of Hand यानी Practical skills, Vocational skills और Problem-solving Skills का विकास ताकि हम अपने ज्ञान को धरातल पर उतार सकें।
लेकिन मैं मानता हूँ कि इन सभी में सबसे जरूरी Education of Heart है। Education of Heart हमें यह सिखाती है कि अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग, दूसरों और समाज के हित में कैसे करें। Knowledge और Skills के साथ यह संस्कार और संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक हैं।
शिक्षा के साथ संस्कार न हों, तो ज्ञान अधूरा रह जाता है। संस्कारों के साथ संवेदनशीलता न हो, तो व्यक्तित्व अधूरा रह जाता है। और ज्ञान, संस्कार और संवेदनशीलता के साथ राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव न हो, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
डॉ. आंबेडकर ने भी शिक्षा के साथ, चरित्र के महत्व पर जोर देते हुए कहा है कि Character, Education से ज्यादा Important होता है। उन्होंने कहा था— “Educated man without character and humility is more dangerous than a beast.” यानी अगर स्वभाव में विनम्रता न हो और चरित्र में नैतिकता न हो तो, एक शिक्षित व्यक्ति हिंसक जानवर से भी खतरनाक होता है।
ऐसे ही श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि जीवन की सारी उपलब्धियाँ शून्य की तरह हैं। शून्य अपने आप में कोई मूल्य नहीं रखता, लेकिन जब उसके आगे ‘1’ लग जाता है, तो वही शून्य दस, सौ और हजार बन जाता है।
यह ‘1’ हमारे जीवन के नैतिक मूल्य, चरित्र और संस्कार हैं। जब उपलब्धियां मूल्यों पर आधारित होती हैं, तब ही जीवन सार्थक होता है। इसलिए यदि शिक्षा सिर्फ डिग्री दे, लेकिन उससे चरित्र का विकास न हो, तो उसका कोई मूल्य नहीं है। वह शिक्षा अधूरी होती है।
मैं आशा करता हूँ कि इस संस्थान ने विद्यार्थियों में केवल Competence ही नहीं, बल्कि Character का भी विकास किया होगा। केवल Professional Skills ही नहीं, बल्कि Public Service की भावना को भी जगाया होगा; केवल Excellence ही नहीं, बल्कि Ethics भी सिखाया होगा; और केवल Knowledge ही नहीं, बल्कि Nation के प्रति Commitment भी विकसित किया होगा।
साथियों,
स्वामी विवेकानंद जी ने एक बार कहा था कि मुझे सौ योग्य और समाज के प्रति समर्पित युवा मिल जाएँ तो मैं भारत का भविष्य बदल सकता हूँ। सोचिए, वे केवल सौ युवाओं की बात कर रहे थे।
इसका अर्थ यह है कि बड़ी भीड़ और संख्याबल से समाज नहीं बदलता, बल्कि बड़े संकल्प से बदलता है। ऐसे युवाओं से बदलता है जो ईमानदारी, समर्पण और राष्ट्रसेवा के भाव से काम करते हैं।
आज इस समारोह में मैं आप सभी से कहना चाहता हूँ कि क्यों न ऐसे कुछ युवा इसी सभागार से निकलें जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि भारत के लिए बड़े सपने देखें। ऐसे युवा जो नौकरी करने वाले ही नहीं, बल्कि रोजगार देने वाले बनें; जो समस्याओं की चर्चा करने वाले नहीं, बल्कि उनके समाधान खोजने वाले बनें; जो सफलता को केवल अपनी Salary से नहीं, बल्कि समाज पर अपने सकारात्मक प्रभाव से मापें।
लेकिन सवाल यह है कि हम अपने इन सपनों और संकल्पों को पूरा कैसे करें? समाज को बदलने का रास्ता क्या हो? बदलाव का आधार क्या हो? संविधान सभा में दी अपनी Last Speech में डॉ. आंबेडकर ने इसका उत्तर दिया है।
उन्होंने स्पष्ट कहा है कि सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हमें संवैधानिक तरीकों को ही अपनाना चाहिए। Constitutional Methods को ही अपनाना चाहिए। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को चेताया था कि जब लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते हमारे सामने खुले हों, तब हिंसा, अराजकता और असंवैधानिक तरीकों का सहारा लेना बिल्कुल भी उचित नहीं हो सकता। Unconstitutional Methods, Grammar of Anarchy हैं और इनका त्याग करना ही उचित है।
डॉ. आंबेडकर ने केवल यह नहीं बताया कि बदलाव का रास्ता क्या नहीं होना चाहिए, उन्होंने यह भी बताया कि बदलाव की शुरुआत कहाँ से होती है। उन्होंने तीन शब्दों का मंत्र दिया है। वे तीन शब्द हैं—Educate, Agitate and Organise.
Educate यानी सबसे पहले शिक्षित होइए। इसके बाद आता है—Agitate. और बाबासाहेब के लिए Agitate का अर्थ सड़क पर उतरकर हिंसा करना या अराजकता फैलाना बिल्कुल नहीं था।
Agitate का अर्थ है—अन्याय को देखकर भीतर से बेचैन होना, गलत चीज के खिलाफ सवाल करना। और इसके बाद आता है Organise. यानी बाकी लोगों को भी गलत चीजों के बारे में जागरूक करना और फिर उनके साथ मिलकर Democratic तरीके से बदलाव लाने का प्रयास करना।
डॉ. आंबेडकर ने केवल यह मंत्र बताया ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में इसे अपनाया भी। आप सभी को पता होगा कि स्कूल के दिनों में डॉ. आंबेडकर को उस नल से पानी भी नहीं पीने दिया जाता था जिस नल से बाकी सब बच्चे पानी पीते थे। ऐसा अन्याय सहने के बाद कोई भी सामान्य व्यक्ति या तो अपने भाग्य को कोसकर रह जाता या हिंसा का रास्ता चुनता।
लेकिन डॉ. आंबेडकर ने अपने भीतर के गुस्से को सकारात्मक रूप देते हुए शिक्षा का मार्ग चुना। उन्होंने Columbia University और London School of Economics जैसे Prestigious Institutions से शिक्षा प्राप्त की। M.A., M.Sc., PhD, D.Sc, D.Lit और Bar at law जैसी Degrees हासिल कीं।
इसके बाद डॉ. आंबेडकर विदेश में रहकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकते थे। लेकिन उन्होंने भारत वापस आकर, यहाँ समाज की कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई। लोगों को जागरूक किया। उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताया। उनके भीतर बदलाव की इच्छा जगाई। लोगों को अन्याय देखकर चुप न रहना, सवाल करना और बदलाव के लिए प्रयास करना सिखाया। उन्होंने लोगों को जोड़ा। उन्हें अन्याय के खिलाफ संगठित किया। और लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से बदलाव का रास्ता दिखाया।
प्रिय विद्यार्थियों,
आज आपको जो डिग्री मिल रही है, वह आपकी मंज़िल नहीं है। बल्कि नई मंज़िलों तक पहुँचने का एक माध्यम है। डिग्री आपको एक Field में सीमित करने के लिए नहीं, बल्कि नई संभावनाओं के द्वार खोलने के लिए होती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. वेंकटरामन रामकृष्णन जी हैं।
उन्होंने अपनी पढ़ाई Physics में की, लेकिन जिज्ञासा और सीखने की इच्छा ने उन्हें Biology के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित किया। और वर्ष 2009 में उन्हें Chemistry के क्षेत्र में Nobel Prize मिला।
यानी डिग्री सिर्फ Possibilities की दुनिया का Entry Point है। यह बताती है कि आपने कहाँ से शुरुआत की है, यह नहीं कि आप कहाँ तक पहुँच सकते हैं।
आज दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है। नई Technologies और Inventions, हर दिन नए अवसर पैदा कर रहे हैं। ऐसे समय में वही व्यक्ति आगे बढ़ेगा जो हर दिन कुछ नया सीखने के लिए तैयार रहेगा।
प्रिय विद्यार्थियों,
आप सभी ने School में Maths पढ़ा होगा। Maths में a² + b² केवल a² + b² ही रहता है। लेकिन जब वही a और b साथ आते हैं, यानी (a + b)² बनता है, तो उसका परिणाम ‘a² + b² + 2ab’ हो जाता है। यह 2ab हमें बहुत बड़ी सीख देता है। यह बताता है कि साथ मिलकर काम करने से हम बेहतर Results प्राप्त कर सकते हैं।
यह हमें बताता है कि Cooperation, Teamwork, Collaboration; Progress के Multiplier हैं। जब हम अकेले चलते हैं, तो हमारी सफलता सीमित रहती है। लेकिन जब हम मिलकर, एक-दूसरे का सहयोग करते हुए आगे बढ़ते हैं, तो हमारी क्षमता और उपलब्धियाँ कई गुना बढ़ जाती हैं।
यह बात हर स्तर पर लागू होती है। आप सोचिए कि अगर भारत के सभी लोग सिर्फ अपनी-अपनी सफलता के बारे में सोचेंगे, तो हम आगे तो बढ़ेंगे, लेकिन आगे बढ़ने की गति बहुत Slow होगी। लेकिन अगर सभी लोगों का एक Collective Goal होगा और हम मिलकर आगे बढ़ेंगे, तो हमारे विकास की गति कई गुना बढ़ जाएगी।
इसलिए मैं अक्सर सभी से और खासकर विद्यार्थियों से कहता हूँ कि आप जिस भी कार्य क्षेत्र में हों, हमेशा याद रखें, कि आप सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि Team India के लिए काम कर रहे हैं। 2047 तक विकसित भारत बनने के लिए कार्य कर रहे हैं।
प्रिय विद्यार्थियों,
हम अक्सर सोचते हैं कि सफलता के लिए सबसे पहले अच्छी परिस्थितियाँ होनी चाहिए, अच्छा अवसर आना चाहिए, अनुकूल समय आना चाहिए। लेकिन बड़ी-बड़ी सफलता की कहानियाँ, सबसे कठिन दौर में लिखी गई हैं। कठिन समय में जो लोग हिम्मत नहीं हारते, वे उस संकट को अवसर में बदल देते हैं।
Fortune, FedEx, Microsoft, Walt Disney, HP, LinkedIn जैसी दुनिया की कई बड़ी कंपनियाँ आर्थिक मंदी और संकट के दौर में शुरू हुईं। उनके Founders इस बात में नहीं उलझे कि समय कैसा है? उन्होंने यह नहीं सोचा कि हालात क्या हैं? उन्होंने बस अपने काम पर ध्यान दिया, अपनी मेहनत जारी रखी और आगे बढ़ते रहे। यही सफलता का मंत्र है।
ऐसे ही, जब हमारे देश में 1960 और 70 के दशक में खाद्यान्न का संकट आया, तो डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन जी ने इस चुनौती को हरित क्रांति के अवसर में बदल दिया। कुछ ही वर्षों में भारत Foodgrains Production में आत्मनिर्भर बन गया।
ऐसे ही जब भारत में Modern Industry Establish करना लगभग असंभव माना जाता था, तब जमशेदजी टाटा और सर दोराबजी टाटा ने 20वीं सदी की शुरुआत में Steel Industry की नींव रखी।
कोविड महामारी के समय भारतीय वैज्ञानिकों ने Record समय में Vaccine विकसित की। भारत ने न केवल अपने नागरिकों का टीकाकरण किया, बल्कि अनेक देशों को भी वैक्सीन उपलब्ध कराई।
पिछले एक दशक में केंद्र सरकार ने हर चुनौती को अवसर में बदलने का कार्य किया है। जब दुनिया Supply Chains के संकट से जूझ रही थी, तब हमने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का संकल्प लिया। Semiconductor Manufacturing, Digital Public Infrastructure और Startups को नई गति दी। Manufacturing को बढ़ावा दिया।
यानी परिस्थितियाँ हमेशा आपके अनुकूल नहीं होंगी, लेकिन यदि आपका ध्यान समस्याओं पर नहीं बल्कि समाधान पर होगा, तो कठिन समय भी अवसर में बदल सकता है।
इसलिए अनिश्चितताओं से डरने के बजाय, अपने काम को पूरी निष्ठा से कीजिए। अपने आप को निरंतर बेहतर करते रहिए। यह आपकी सफलता का राज होगा।
प्रिय विद्यार्थियों,
अभी हाल ही में हुए Commonwealth Games में भारत के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया। कई Historic Records बनाए। Medals जीते। उन सभी के संघर्ष की कहानियाँ प्रेरणादायक हैं।
जैसे भारतीय सेना के जवान सोमन राणा ने एक विस्फोट में अपना पैर गंवा दिया था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और Para Shot Put (शॉट-पुट) में Gold Medal जीतकर इतिहास रचा।
तेजस्विन शंकर Injury के बावजूद Decathlon (डेकैथलॉन) प्रतियोगिता में उतरे और पदक जीता। वहीं, जब भारत की पहली Judoka Medal Winner अस्मिता डे पोडियम पर खड़ी थीं, तब उन्हें अपने पिता की याद आ रही थी, जिनकी पिछले वर्ष ही मृत्यु हो गई थी।
ऐसी अनेक कहानियाँ हैं जो हमें एक ही बात सिखाती हैं कि Grit (ग्रिट), Perseverance और Hard Work के सामने कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। यदि संकल्प मजबूत हो, तो सीमित संसाधन और बड़ी से बड़ी बाधा भी, मेहनत और प्रतिभा के सामने टिक नहीं सकती।
जैसे एक समय था जब भारत के पास Space Programme के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं थे। Rockets; साइकिलों और बैलगाड़ियों पर ले जाए जाते थे। लेकिन भारत के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया कि सफलता, संसाधनों की मोहताज नहीं होती है।
आज भारत Mars तक पहुँच चुका है, चंद्रमा के South Pole पर पहुँच चुका है। सूर्य की Study के लिए आदित्य-L1 भेज चुका है। अब Human Spaceflight की तैयारी कर रहा है। और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
Space के क्षेत्र में भारत का Private Sector भी नई ऊँचाइयाँ छू रहा है। अभी हाल ही में Skyroot Aerospace ने India का पहला Private Orbital Rocket लॉन्च किया है। इसी तरह Galax-Eye ने दुनिया का सबसे पहला Opto-SAR Satellite Launch किया है।
कभी हमारी उपलब्धियों पर दुनिया व्यंग्य करती थी। आपको शायद न पता हो, लेकिन जब भारत ने Mars Mission Launch किया था, तो विदेशों में इसका मज़ाक उड़ाया गया था। एक विदेशी Newspaper (The New York Times) में Racist Cartoon तक Publish किया गया था।
लेकिन आज पूरी दुनिया भारत के Space Program की सफलता को देखकर हैरान है। उसका सम्मान करती है। यह परिवर्तन किसी चमत्कार से नहीं आया, बल्कि भारत के युवाओं, वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के संकल्प से आया है। उनकी मेहनत से आया है।
English में एक कहावत है— First they ignore you, then they laugh at you, then they fight you, and then you win. यानी सफलता की यात्रा अक्सर चार पड़ावों से होकर गुजरती है—पहले लोग आपको नज़रअंदाज़ करते हैं, फिर आप पर हँसते हैं, फिर आपका विरोध करते हैं और अंत में वही लोग आपकी सफलता की तारीफ करते हैं।
आपको भी ऐसे लोग मिलेंगे जो आपकी उपेक्षा करेंगे। आपका मजाक उड़ाएँगे। आपके रास्ते में बाधाएँ खड़ी करेंगे। लेकिन आपको रुकना नहीं है। आत्मविश्वास से आगे बढ़ना है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको सफल होने से कोई नहीं रोक पाएगा।
देवियो और सज्जनो,
पिछले 12 वर्षों में शिक्षा की Quality, Accessibility और Affordability बढ़ी है। भारत का Research and Development Expenditure दोगुना हो गया है। 34 साल में पहली बार हमने नई National Education Policy बनाई है।
शिक्षा के क्षेत्र में हुए बदलावों और अच्छी Policies का परिणाम है कि आज देश के युवा Physics, Chemistry और Biology के Olympiads में Medals जीत रहे हैं। Startups खड़े कर रहे हैं। Unicorn कंपनियाँ बना रहे हैं। Drones बना रहे हैं। Hydrogen Trains बना रहे हैं।
आज भारत में Registered Patents की संख्या कई गुना बढ़ गई है। वर्ष 2015 में हम Global Innovation Index में 81वें स्थान पर थे, 2025 में हम 38वें स्थान पर पहुँच गए हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा Startup Ecosystem बन गया है। यह कहा जा सकता है कि आज भारत Global Innovation Powerhouse बन चुका है।
यह सब बातें एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि हम अपने युवाओं को इस Tech-age में पीछे नहीं रहने देंगे। और यह Ensure करते रहेंगे कि हमारा युवा Explore करें। Innovate करें। Experiment करें, Create करें और समाज को बेहतर बनाने के लिए Solutions दें।
साथियो,
किसी भी राष्ट्र के विकसित और आत्मनिर्भर बनने के लिए केवल GDP का बढ़ना पर्याप्त नहीं है। उतना ही आवश्यक है कि उसके नागरिकों को अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता और अपनी विरासत पर गर्व हो। आर्थिक शक्ति किसी राष्ट्र को समृद्ध बनाती है, लेकिन सांस्कृतिक आत्मविश्वास उसे महान बनाता है।
हमारा उद्देश्य भारत को आर्थिक के साथ-साथ मानसिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त बनाना भी है। हमने पिछले 12 वर्षों में भारतीय भाषाओं, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव का भाव जगाने का कार्य किया है।
इसलिए आज भारत केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति और अपनी क्षमता पर विश्वास रखने वाले राष्ट्र के रूप में भी उभरा है। आज जब भारत कुछ बोलता है तो दुनिया सुनती है। आज हम सिर्फ Rules Follow नहीं करते हैं, हम Rules बनाते हैं।
आज की युवा पीढ़ी को अपनी पहचान पर गर्व है, अपनी सभ्यता पर विश्वास है और अपने देश के भविष्य पर भरोसा है।
मुझे लगता है कि नए भारत में यह सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ है। यानी यह भी कहा जा सकता है कि ‘Make in India’ की सफलता के पीछे ‘Believe in India’ की भावना है।
प्रिय विद्यार्थियों,
मैं आप सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ। आप सभी को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।
जय हिन्द! जय भारत! धन्यवाद।