Text of RM’s speech at the inaugural ceremony of ‘Hutatma Smruti Smarak’ in Goa.
गोवा की इस ऐतिहासिक भूमि पर, आप सभी के बीच आना, मेरे लिए गौरव का क्षण है। वीरों की इस भूमि पर, आज मैं उन महान आत्माओं के चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करने आया हूँ, जिन्होंने गोवा की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
इस ‘हुतात्मा स्मृति स्मारक’ के उद्घाटन के अवसर पर, मैं समस्त रणबांकुरों, उनके परिजनों और समस्त देशवासियों को बधाई देता हूँ। मैं Goa के Chief Minister, डॉ. प्रमोद सावंत और उनकी पूरी टीम को, ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए विशेष बधाई देता हूँ।
पत्रादेवी का यह शहीद स्मारक, उस अमर बलिदान की स्मृति का प्रतीक है, जिसने भारत की आज़ादी के अंतिम अध्याय को अपने रक्त से लिखा। यह वह तीर्थ है जहाँ भारत के विभिन्न कोनों से आए वीरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह सिद्ध कर दिया, कि भारत एक जीता-जागता राष्ट्र है। और उसी राष्ट्र की एक अभिव्यक्ति हमें आज यहाँ दिख रही है, जब हम सब अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि देने एकत्र हुए हैं।
साथियों, यदि हम गोवा का इतिहास देखें, तो इस राज्य का इतिहास भी, इसकी geography की तरह ही, बड़ा गौरवशाली है। सातवाहनों, बादामी के चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, कदंबों और विजयनगर साम्राज्य जैसे अनेक शक्तिशाली राजवंशों ने गोवा में शासन किया। 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों का यहाँ आना हुआ, और फिर धीरे-धीरे पूरा गोवा उनके औपनिवेशिक शासन के अधीन आ गया। लेकिन एक स्वतंत्र समाज, बहुत ज्यादा दिनों तक पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ नहीं रह सकता।
गोवा की जनता ने, औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आवाज़ उठाने का कार्य किया। गोवा की स्वतंत्रता का संघर्ष गोवा की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा; यह पूरे देश के लोगों की जिम्मेदारी बन गया। भारत के विभिन्न भागों से, अनेक समूहों ने गोवा की ओर शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने के लिए कूच किया। पंजाब से करनैल सिंह, मध्य प्रदेश से सहोदरा देवी, महाराष्ट्र से मधुकर दामोदर चौधरी, और अनेक राज्यों से आए सत्याग्रही, गोवा की ओर आए।
हजारों लोग यह जानते हुए गोवा की ओर बढ़े, कि उन्हें गिरफ्तारी, हिंसा और यहाँ तक कि मृत्यु का सामना भी करना पड़ सकता है। यह उनका साहस था कि वे निहत्थे, शांतिपूर्ण और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ते गए। वी.डी. चिटाले के नेतृत्व में, लगभग 2500 सत्याग्रही पत्रादेवी पहुँचे।
वैसे तो पत्रादेवी सत्याग्रह के उन सत्याग्रहियों में सभी महत्त्वपूर्ण थे, सबकी विशेष कहानियाँ थी, लेकिन मैं उनमें से कुछ नामों का जिक्र यहाँ जरूर करना चाहूँगा। मध्य प्रदेश की एक युवा विधवा सहोदरा देवी का नाम आपने सुना होगा। वे अपने हाथों में तिरंगा लेकर आगे बढ़ रही थीं। जब पुर्तगाली सैनिकों ने सत्याग्रहियों पर गोलियाँ चलाईं, तब सहोदरा देवी को गोली लगी। किंतु घायल होने के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को अपने हाथों में थामे रखा। उनके हाथ से तिरंगा गिरा नहीं, क्योंकि वह केवल उनके हाथ में नहीं था, वह उनके हृदय में, उनकी आत्मा में बसा हुआ था।
पत्रादेवी सत्याग्रह से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण नाम, करनैल सिंह बेनीपाल का है। वे पंजाब के एक युवा सत्याग्रही थे। जब सहोदरा देवी को गोली लगी, तो वे आगे आए, और उन्होंने पुर्तगाली सैनिकों के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। वे केवल 25 वर्ष के थे। कुछ ही महीने पहले उनका विवाह हुआ था। किंतु उन्होंने गोवा की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
इस सत्याग्रह में कई अन्य लोग भी शहीद हुए। मधुकर दामोदर चौधरी, राम सिंह और कल्याण शर्मा जैसे नाम भी गोवा की स्वतंत्रता के संघर्ष के इतिहास का हिस्सा बन गए। इनमें से प्रत्येक का अपना जीवन था, अपने सपने थे, अपना परिवार था। किंतु उन्होंने गोवा की आज़ादी को अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर रखा।
साथियों, हमारे देश की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक हमारी national consciousness रही है। भारत हमेशा से एक cultural और civilizational idea रहा है। आज के भारत में, जब हम regionalism, communalism और casteism पर बहस करते हैं, तो हमें यह ध्यान रखना होगा कि इन सब narrow minded thought से ऊपर, एक भावना है, जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह है हमारी national unity. पत्रादेवी का इतिहास हमें इसी unity का सबसे powerful lesson देता है। पत्रादेवी का इतिहास हमें संदेश देता है, कि भारत को बाँटने वाली पहचानें अनेक हो सकती हैं, लेकिन भारत को जोड़ने वाली पहचान केवल एक है, और वह भारतीय होने की पहचान। उस सत्याग्रह में एक ही identity सबसे ऊपर थी, भारतीय होने की identity. और अपनी यही पहचान हमें हमेशा बनाए रखनी होगी।
पत्रादेवी की भूमि पर सत्याग्रहियों ने अपना moral courage दिखाया। उन्होंने दुनिया को बताया, कि भारत अपने अधिकार के लिए शांतिपूर्ण तरीके से भी खड़ा हो सकता है। लेकिन जब एक sovereign nation की territorial integrity का प्रश्न सामने हो और peaceful efforts अपनी सीमा तक पहुँच जाएँ, तब किसी राष्ट्र को अपने सामर्थ्य का उपयोग करने का भी अधिकार होता है।
इसी national resolve की परिणति आगे चलकर Operation Vijay में हुई। एक रक्षामंत्री के रूप में, मुझे यह कहते हुए हर्ष और गौरव की अनुभूति होती है, कि Indian Armed Forces ने जिस professionalism, courage और discipline के साथ, गोवा की मुक्ति के अभियान को सफल बनाया, वह भारतीय सैन्य इतिहास का एक important chapter है। 1961 में हमारी सेनाओं ने, कुछ ही समय के भीतर जिस पराक्रम का परिचय दिया, वह देश ही नहीं बल्कि दुनिया के सैन्य इतिहास में एक नज़ीर बन गया। हमारी सेनाओं ने जिस आत्मविश्वास के साथ अपने दायित्व का निर्वहन किया, वही परंपरा आज अत्याधुनिक और आत्मनिर्भर सेनाओं के रूप में आगे बढ़ रही है। Operation सिंदूर इसका एक बड़ा उदाहरण दुनिया के सामने मौजूद है।
आज हमारे पास अत्याधुनिक साजो सामान, Warships, लड़ाकू विमान, स्वदेशी तकनीक, उन्नत रडार, नेटवर्क-केंद्रित युद्धक क्षमता और दूर तक प्रभाव डालने वाली हवाई शक्ति है। इसलिए गोवा मुक्ति दिवस केवल अतीत के सैन्य पराक्रम को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए हमारी सेनाएँ सदैव सजग, सक्षम और तैयार रहनी चाहिए।
साथियों, गोवा की मुक्ति भारत की अखंडता और स्वाभिमान की पुनर्स्थापना थी। 19 दिसंबर 1961 को, गोवा अंततः पुर्तगाली शासन से मुक्त हुआ। और यह उन सत्याग्रहियों के बलिदान के बिना संभव नहीं था, जिन्होंने वर्षों पहले पत्रादेवी जैसे स्थानों पर अपने प्राणों की आहुति दी थी। उनका बलिदान ही था, जिसने भारत सरकार और भारतीय समाज को यह संकल्प दिलाया, कि गोवा को हर स्थिति में स्वतंत्र कराया जाएगा। Operation Vijay का सैन्य अभियान भी, उसी संकल्प की परिणति था। आज जब हम स्वतंत्र भारत में साँस ले रहे हैं, हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह स्वतंत्रता अनायास नहीं मिली।
साथियों, यह स्मारक हमें कई संदेश भी दे रहा है। यह हमसे केवल यह याद रखने के लिए नहीं कह रहा, कि यहाँ हमारे सत्याग्रहियों ने बलिदान दिया था। यह हमें इस बात को सोचने को मज़बूर कर रहा है, कि आखिर वो सभी सत्याग्रही, अपना घर, अपना समाज छोड़कर, इतनी दूर क्यों आए थे? वे किस आदर्श में विश्वास रखते थे?
दरअसल वे सब लोग, अपना घर-समाज छोड़कर, गोवा इसलिए आए, क्योंकि उनके लिए यह देश एक विचार और आत्मा था। और उस आत्मा के किसी एक हिस्से पर भी पराधीनता की बेड़ी उन्हें स्वीकार नहीं थी। उन्होंने राष्ट्र को केवल नक्शे पर नहीं देखा था। उन्होंने राष्ट्र को अपने हृदय में अनुभव किया था। उनके लिए पंजाब की पीड़ा केवल पंजाब की पीड़ा नहीं थी। मध्य प्रदेश की पीड़ा केवल मध्य प्रदेश की पीड़ा नहीं थी। गोवा की पीड़ा केवल गोवा की पीड़ा नहीं थी। इसलिए गोवा की मुक्ति का संघर्ष भी, केवल गोवा का संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह उस राष्ट्रीय चेतना का संघर्ष बना, जिसने भारत को एक सूत्र में बाँधा था। यहाँ पंजाब का युवा आया, मध्य प्रदेश की बेटी आई, महाराष्ट्र के सत्याग्रही आए, और सबने मिलकर बता दिया कि भारत की सीमा नक्शे से नहीं, भारतीयों के संकल्प से तय होती है।
मैं जब पत्रादेवी के इस स्मारक को देखता हूँ, तो मुझे यहाँ भारत की एकता का जीवंत प्रतीक दिखाई देता है। मुझे यहाँ वह भारत दिखाई देता है, जिसमें कोई व्यक्ति किसी दूसरे प्रदेश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देता है। यही भाव, पत्रादेवी को, एक तीर्थ के समान बनाता है।
साथियों, 1961 में जब गोवा आज़ाद हुआ, तो हमारे सत्याग्रहियों ने जिस विकसित गोवा और भारत का संकल्प देखा होगा, उस संकल्प की ओर हम बहुत तेजी से आगे बढ़े हैं। 1961 के भारत और 2026 के भारत में जमीन-आसमान का अंतर है। आज हमारी सेना अत्याधुनिक technology को अपना रही है। हमारी Navy blue waters से लेकर strategic maritime spaces तक भारत के interests की रक्षा कर रही है। हमारी Air Force हमारे आसमानों की सुरक्षा कर रही है। और तीनों सेनाएँ jointness तथा integration की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
आज भारत fighter aircraft से लेकर warships, missiles, radars, drones और advanced defence systems तक अनेक क्षेत्रों में अपनी indigenous capabilities को बढ़ा रहा है। आज भारत weapons का buyer न रहकर, global defence manufacturing का important exporter बन रहा है।
जिस भारत की बेटियाँ कभी स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह की अग्रिम पंक्ति में खड़ी थीं, आज उसी भारत की बेटियाँ fighter aircraft की cockpit में बैठकर, देश के आसमान की रक्षा कर रही हैं। यह केवल परिवर्तन की कहानी नहीं है; यह नए भारत की शक्ति की कहानी है। आज हमारी बेटियाँ armed forces में leadership roles निभा रही हैं, space missions का हिस्सा बन रही हैं, startups शुरू कर रही हैं और देश की economy को नई दिशा दे रही हैं। ये सारी चीज़ें, उन सपनों का reflection है, जिसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था।
साथियों, हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने हमें आज़ादी तो दिला दी, लेकिन उस आज़ादी का सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी भी है। आजादी का अर्थ केवल यह नहीं है कि हम स्वतंत्र रूप से अपनी बात कह सकें। आजादी का अर्थ यह भी है, कि हम अपनी स्वतंत्रता के साथ अपनी responsibilities को समझें। स्वतंत्र भारत के नागरिक के रूप में हमारी जिम्मेदारी है। यह बात विशेषकर हमारे युवाओं के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने हमें एक responsibility भी दी है, कि हम देश की unity को मजबूत करें, constitutional values का सम्मान करें, कानून का पालन करें और राष्ट्रहित को अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखने का प्रयास करें। इस स्वतंत्रता को, तथा इसके भाव को, आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है।
इसके लिए जरूरी है, कि इन सत्याग्रहियों की कहानियों को याद रखा जाए, और नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। उनका बलिदान इतिहास की पुस्तकों में नाम और तारीख बनकर न रह जाए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा, कि आने वाली पीढ़ियाँ उन नामों के पीछे के चेहरों को जानें, उनके संघर्ष को समझें, और उनके त्याग से प्रेरणा लें। आज के दिन, यदि हम कोई निश्चय कर सकते हैं, तो हमें यही संकल्प लेना चाहिए, कि हम आपसी मतभेद भुलाकर, राष्ट्रहित में एकजुट रहेंगे। यही उन बलिदानियों के प्रति, हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
मैं आज यहाँ आकर बड़ा अभिभूत हुआ। यह स्थान पूरे भारत के लिए एक तीर्थ के समान है। मैं उन सभी बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, जिन्होंने पत्रादेवी की इस पवित्र भूमि पर अपने प्राणों की आहुति दी। मैं सहोदरा देवी के अदम्य साहस को नमन करता हूँ, जिन्होंने घायल शरीर के साथ भी तिरंगे को नहीं छोड़ा। मैं करनैल सिंह बेनीपाल के बलिदान को नमन करता हूँ, जिन्होंने युवा अवस्था में ही देश के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। मैं मधुकर दामोदर चौधरी जी, राम सिंह जी, कल्याण शर्मा जी, और उन सभी 22 बलिदानियों को नमन करता हूँ, जिन्होंने पत्रादेवी पर स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनका बलिदान भारत के इतिहास में अमर रहेगा। उनकी स्मृति हमें सदैव प्रेरणा देती रहेगी। यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा, कि स्वतंत्रता की कीमत क्या होती है, और उसे अक्षुण्ण बनाए रखना, हमारी कितनी बड़ी जिम्मेदारी है। हमें यह याद रखना होगा, कि पत्रादेवी स्मारक हमें अतीत की ओर देखने के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य की ओर बढ़ने की भी प्रेरणा देता है।
मैं खासकर हमारी युवा पीढ़ी, देश की जेन ज़ी से यह कहना चाहूँगा, कि आप जब भी गोवा आएँ, तो इस स्थल पर एक बार जरूर ज़रूर आएँ। इन बलिदानियों को नमन करें, उनके संघर्ष को जाने, और यह समझने का प्रयास करें कि देश की अखंडता हमें कितनी बड़ी कीमत चुकाकर मिली है। क्योंकि जो पीढ़ी अपने इतिहास को जानती है, वही अपने भविष्य को सही दिशा दे सकती है। आप यहाँ से केवल एक selfie भर लेकर न जाएँ, बल्कि एक प्रेरणा लेकर जाएँ, कि जिस भारत को हमारे वीरों ने स्वतंत्र बनाया, उसे हमें और अधिक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित बनाना है।
साथियों, मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत जी के नेतृत्व में गोवा आज एक ऐसे विकास मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जहाँ विकास भी है और विरासत भी। एक ओर श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर, आग्वादा सेंट्रल जेल म्यूज़ियम, कोटि तीर्थ कॉरिडोर, एकादश तीर्थ यात्रा और ‘पुण्यभूमि गोमंतक’ म्यूज़ियम के माध्यम से गोवा की सांस्कृतिक विरासत को संजोया जा रहा है; वहीं दूसरी ओर न्यू ज़ुआरी ब्रिज, मनोहर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, स्वयंपूर्ण गोवा, मुख्यमंत्री कौशल्य पथ और ‘म्हाजे घर योजना’ के माध्यम से आधुनिक गोवा का निर्माण हो रहा है। यानी, गोवा अपनी जड़ों से जुड़कर अपनी नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है; और ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र को चरितार्थ कर रहा है। हमारा गोवा इसी तरह भविष्य में लगातार नई-नई ऊँचाइयाँ छूता रहेगा ऐसा मेरा विश्वास है।
अंत में, मैं इस आयोजन के लिए सभी आयोजकों, गोवा के मुख्यमंत्री, गोवा की जनता और यहाँ उपस्थित सभी गणमान्य व्यक्तियों का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए, अपनी बात समाप्त करता हूँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद।