संघ का विचार ‘सहिष्णुतावाद’ से भी आगे ‘सम्मानवाद’ का है: रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह

Text of RM’s speech at the book launch ceremony of ‘RSS @ 100: A Century of Commitment’ in New Delhi.

देवियो और सज्जनो,

श्री श्याम जाजू और श्री अनुपम त्रिवेदी जी की पुस्तक “RSS at 100 : एक सदी संकल्प की”, के लोकार्पण का यह सबसे उपयुक्त समय है क्योंकि इस साल विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना की शताब्दी मना रहा है।

मैं श्याम जाजू जी और अनुपम त्रिवेदी जी को लंबे समय से जानता हूँ। श्याम जाजू जी भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे हैं। और अनुपम त्रिवेदी जी भाजपा के संवाद प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक रहे हैं। ये दोनों ही लोग संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों से भी काफी नजदीक से जुड़े रहे है।

साथियों,

इस पुस्तक को मैंने जितना पढ़ा है, उस आधार पर, मैं यह कह सकता हूँ कि कई कारणों से, यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण किताब है।

सबसे पहला कारण यह है कि, RSS के द्वारा किए गए राष्ट्रहित, समाज निर्माण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के कार्यों को, यह पुस्तक प्रामाणिक तरीके से और बहुत ही आसान भाषा में पाठकों के सामने लाती है।

साथियों,

दो American Scholars, Walter Andersen और Shridhar Damle ने, अपनी पुस्तक ‘The Brotherhood in Saffron’ में लिखा है कि “The RSS is difficult to understand and easy to misunderstand.” इसकी बड़ी वजह यह है कि RSS के बारे में बहुत कम लोगों ने Fair और Objective Analysis किया है। मुझे लगता है कि यह पुस्तक इस कमी को दूर करेगी।

साथियों,

RSS, अनवरत 100 वर्षों से देश और समाज की सेवा का कार्य कर रहा है। लेकिन उसके बारे में आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग या तो Un-informed है या Mis-informed है। मैं आपको इसके कुछ उदाहरण देता हूँ।

लंबे समय तक यह झूठ बार-बार दोहराया गया कि इस संस्था का स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें इस पुस्तक का 4th Chapter पढ़ना चाहिए। उन्हें सच्चाई पता लग जाएगी।

उन्हें पता लग जाएगा कि स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। डॉ. हेडगेवार जी भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल गए थे। Quit India Movement के दौरान स्वयंसेवकों ने क्रांतिकारियों को अपने घरों में पनाह भी दी थी। महाराष्ट्र के चिमूर और आष्टी में स्वयंसेवकों ने अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया था।

साथियों,

संघ के बारे में वर्षों तक बहुत से मिथक गढ़े गए और बार-बार दोहराए गए। ऐसा Narrative बनाने की कोशिश की गई कि RSS, हिन्दू राष्ट्र बनाने का समर्थन करता है। लेकिन ऐसी बात करने वाले लोग यह जानते ही नहीं हैं, कि संघ के लिए ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ आखिर है क्या?

संघ की दृष्टि में हिन्दू, हिन्दुत्व या Hinduism कोई संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं है। बल्कि यह सोच स्वामी विवेकानंद जी के विचारों से प्रेरित है। स्वामी विवेकानंद जी Hinduism को एक ऐसी सांस्कृतिक चेतना मानते थे, जो इस भूमि की साझा विरासत है। और जो हमारे आध्यात्मिक मूल्यों और एकात्म दृष्टि का प्रतीक है।

1972 में एक Interview के दौरान गुरुजी श्री गोलवलकर ने यह स्पष्ट कहा था कि जब बात देश की आती है तो, वे हिंदू और मुसलमान में कोई भेद नहीं करते। गुरु जी कहते थे कि संघ का विचार ‘सहिष्णुतावाद’ से भी आगे बढ़कर, ‘सम्मानवाद’ का है। यानी सिर्फ Tolerance नहीं, बल्कि Acceptance और Respect का भी है।

इस बात को समझाने के लिए गुरुजी ने श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य (श्री चंद्रशेखर भारती स्वामी जी) के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग भी सुनाया था। एक अमेरिकी व्यक्ति, शंकराचार्य के पास आया और उनसे बोला कि मैं हिंदू बनना चाहता हूँ। शंकराचार्य ने उससे पूछा—”क्या तुमने अपने धर्म का पूरी ईमानदारी से पालन किया है? और फिर उन्होंने आगे कहा, जाओ, पहले अपने धर्म का पालन करो, उसे पूरी निष्ठा से जीकर देखो। यदि तब भी तुम्हें संतोष न मिले, तब मेरे पास आना।

यानी संघ व्यक्ति के Religion के आधार पर, उसे Judge नहीं करता है। संघ सिर्फ राष्ट्र के प्रति समर्पण माँगता है। संघ ने हमेशा यह प्रयास किया है कि समाज में सामंजस्य हो। एकता हो। अनुशासन हो। और सद्भाव हो। संघ का विचार सभी को एक जैसा बनाने का   नहीं है, बल्कि सबको एक सूत्र में जोड़ने का है। संघ एकरूपता की नहीं, बल्कि एकात्मता की बात करता है।

डॉ. हेडगेवार जी ने भी स्पष्ट कहा है कि संघ ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ में विश्वास करता है। यह विचार वसुधैव कुटुंबकम का विचार है। सह-अस्तित्व, सार्वभौमिकता और बंधुत्व का विचार है। यह किसी का बहिष्कार करने का नहीं, बल्कि सभी को स्वीकार करने का विचार है।

साथियों,

वर्ष 1932 में Central Provinces और Berar की सरकार ने संघ को सांप्रदायिक घोषित कर दिया था। और सरकारी कर्मचारियों के RSS के कार्यक्रमों में भाग लेने पर रोक लगा दी थी। लेकिन जब यह मामला Provincial Assembly में पहुँचा, तो हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और अन्य समुदायों के सभी प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा था, कि डॉ. हेडगेवार के द्वारा स्थापित संगठन किसी भी समुदाय के विरुद्ध हो ही नहीं सकता है।

इसलिए जिन लोगों ने वामपंथी Propaganda में फँसकर, संघ के बारे में गलत धारणाएं बना ली हैं, उन्हें इस किताब को पढ़ने के बाद संघ के बारे में सही समझ मिलेगी और उनकी भ्रांतियाँ दूर होंगी।

मैं आशा करता हूँ कि यह पुस्तक समाज में एक नया विमर्श शुरू करेगी। इस पुस्तक की सफलता के लिए, दोनों लेखकों और प्रभात प्रकाशन को, मैं अपनी शुभकामनाएं  देता हूँ।

साथियों,

लगभग 101 वर्ष पहले, 1925 में, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूप में जो बीज बोया था, वह आज एक वटवृक्ष बन चुका है। दुनिया का सबसे बड़ा और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्वयंसेवी संगठन बन चुका है।

हमारे यहाँ कहा जाता है “क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे”। अर्थात्, महान कार्य बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि लोगों के चरित्र, संकल्प और आंतरिक सामर्थ्य से सिद्ध होते हैं। यही संदेश RSS  की सौ वर्षों की यात्रा में भी दिखाई देता है।

RSS, अपने स्वयंसेवकों के संस्कार, अनुशासन और निस्वार्थ सेवा की भावना के बल पर संस्कृति, धर्म, और भारतीयता की रक्षा के लिए अपना योगदान दे रहा है। जब भी देश पर कोई संकट आया है, संघ और स्वयंसेवक, मदद के लिए सबसे पहले आगे आए हैं।

देश के विभाजन के समय हुई हिंसा में लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। उस समय बिना अपनी जान की परवाह किए, गुरुजी श्री गोलवलकर, श्री बालासाहेब देवरस जी, श्री माधवराव मूले जी, श्री वसंतराव ओक जी और संघ के हजारों स्वयंसेवक, संवेदनशील और हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में लोगों के बीच जाकर कार्य कर रहे थे।

विभाजन के बाद पाकिस्तान से हजारों Kidnapped महिलाओं को भारत में सुरक्षित वापस लाने की बड़ी चुनौती थी। इस कार्य के लिए, अक्टूबर, 1947 में, उस समय के रक्षा मंत्री सरदार श्री बलदेव सिंह ने सरदार वल्लभभाई पटेल को एक पत्र लिखकर एक Secret Service बनाने का सुझाव दिया था। उन्होंने लिखा था कि इसके लिए स्वयंसेवकों की मदद ली जा सकती है। सरदार बलदेव सिंह जी ने इस विषय में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी श्री गोलवलकर से परामर्श करने का सुझाव भी दिया था।

साथियों,

1962 और 1965 के युद्ध के दौरान भी स्वयंसेवकों ने राहत कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। 1965 के युद्ध के समय तो तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने गुरुजी श्री गोलवलकर को विशेष विमान भेजकर दिल्ली बुलाया था। उस समय संघ और स्वयंसेवकों ने बड़े स्तर पर राहत कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई थी।  इसी तरह 1984 के सिख-विरोधी दंगों में, सिख भाई-बहनों की रक्षा करने में, स्वयंसेवक सबसे आगे थे।

साथियों,

RSS ने देश की एकता और अखंडता के लिए जो कार्य किए हैं, नई पीढ़ी को उन्हें भी जानना चाहिए। 1947 में कश्मीर के भारत में विलय के लिए, महाराजा हरि सिंह को राजी करने के लिए श्री गोलवलकर जी को भेजा गया था।

1954 में स्वयंसेवकों ने, दादरा और नगर हवेली को आज़ाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्वयंसेवकों ने गोवा की मुक्ति के लिए भी अपने प्राणों का बलिदान किया था। उस समय श्री जगन्नाथराव जोशी जी ने एक नारा दिया था “नेहरू जी अब क्या करें? पुलिस लेकर गोवा चलें, पुलिस लेकर गोवा चलें।” अंततः 1961 में गोवा का भी भारत में विलय होकर ही रहा।

साथियों,

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से संविधान, लोकतंत्र और नागरिकों के अधिकारों का सशक्त प्रहरी रहा है।

वर्ष 1950 में जब सरकार द्वारा Freedom of Speech को कुचलने की कोशिश की गई, तब संघ ने निर्भीकता के साथ इसका विरोध किया था। The Organiser के Editor श्री के.आर. मलकानी जी ने नागरिकों के Fundamental Rights बचाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी।

यही नहीं जब 1975 में देश में आपातकाल लगाया गया, तब RSS ने संविधान और लोकतंत्र की रक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई थी। आपातकाल के समय गिरफ्तार किए गए लोगों में बड़ी संख्या में स्वयंसेवक थे।

साथियों,

जो भी एक बार संघ की शाखा में चला जाता है और संघ के कार्यों को पास से देख लेता है, वो संघ का प्रशंसक बन जाता है।

वर्ष 1934 में गांधी जी ने RSS के एक शिविर का दौरा भी किया था। गांधी जी यह देखकर प्रसन्न हुए कि स्वयंसेवक जाति के आधार पर कोई भेद नहीं करते। गांधी जी ने स्वयंसेवकों के अनुशासित और सादगीपूर्ण जीवन की सराहना की थी।

डॉ. भीमराव आंबेडकर जी भी संघ के बारे में Positive विचार रखते थे। श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि बाबासाहब ने पुणे में देखा था कि स्वयंसेवकों के बीच Untouchability जैसी कोई चीज नहीं थी। ठेंगड़ी जी ने लिखा है कि डॉ. हेडगेवार और बाबासाहब दोनों की धारणा थी कि सामाजिक समरसता का निर्माण किए बिना सामाजिक समता स्थापित नहीं हो सकेगी।

साथियों,

आज तक संघ के हर सरसंघचालक ने समाज में भेदभाव और छुआछूत का विरोध किया है। गुरुजी “न हिंदू पतितो भवेत्” की बात करते थे। श्री बालासाहेब देवरस जी ने स्पष्ट कहा है कि जाति और छुआछूत जैसी विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ सामाजिक असमानता का परिणाम हैं। उनका दृढ़ मत था कि Untouchability को ‘Lock, Stock and Barrel’ यानी पूरी तरह समाप्त करना ही होगा। श्री सुदर्शन जी कहते थे कि जातिवाद और सामाजिक विषमता, भारत की आत्मा को क्षीण करते हैं। वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी ने भी “एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान” का स्पष्ट संदेश दिया है।

साथियों,

संघ ने हमेशा ‘राष्ट्र प्रथम-सदैव प्रथम’ के भाव से कार्य किया है। इसी का परिणाम यह हुआ है कि RSS दुनिया का सबसे बड़ा और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्वयंसेवी संगठन बन चुका है।

लेकिन अभी हाल ही में Congress के एक बड़े नेता पूछ रहे थे कि RSS Registered क्यों नहीं है। ऐसी बातों का जवाब नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि संविधान हर व्यक्ति को संगठन बनाने का अधिकार देता है,।

मैं इसमें यह बात जोड़ना चाहता हूँ कि माँ के प्रेम का कोई लाइसेंस नहीं होता है। गुरु के संस्कार किसी सरकारी मुहर के मोहताज नहीं होते हैं। माँ गंगा को बहने के लिए लाइसेंस नहीं चाहिए। सूर्य को प्रकाश देने के लिए Registration की जरूरत नहीं होती है।

इसी तरह RSS वो Civilisational Force है जिसे किसी Certification और Validation की आवश्यकता नहीं है। संघ निरंतर “सेवा धर्मः, परमः श्रेयः” की भावना के साथ कार्य कर रहा है और करता रहेगा।

साथियों,

पूरी दुनिया में शायद ही कोई ऐसा संगठन हो, जो इतने बड़े स्तर पर और इतने लंबे समय से लगातार कार्य कर रहा हो, और उसमें विभाजन न हुआ हो।

लेकिन, आज तक RSS में न कभी कोई विभाजन हुआ है, और न ही बिखराव। यह Leadership Quality के साथ-साथ उस मूल भावना का परिणाम भी है जो “राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय, इदं न मम” की बात करती है। संघ का हर स्वयंसेवक इसी संकल्प के साथ कार्य करता है कि मेरा कुछ भी नहीं है और अगर कुछ है भी तो वो सब भी राष्ट्र को समर्पित है। उसे किसी पद या प्रतिष्ठा की लालसा नहीं रहती। बस सेवा की ललक रहती है।

और इसलिए मैं कहता हूँ कि जो संस्था सेवा, आत्म-त्याग और समर्पण के आदर्शों पर चलती है, और जिसके कार्यकर्ताओं का ध्येय पवित्र होता है, वहाँ विभाजन नहीं होता, केवल संयोजन होता है। उस  संस्था के लोगों को प्रसिद्धि और पुरस्कार की लालसा नहीं रहती है।

साथियों,

संघ अपने कार्यों का कभी बखान नहीं करता है। संघ का मूल संस्कार ही है: “प्रसिद्धि पराङ्मुखता”। अर्थात्, कार्य करो, लेकिन प्रसिद्धि की इच्छा मत रखो।

आप सोचिए, जब शताब्दी वर्ष का उत्सव मनाने का समय आया, तब भी RSS ने यही कहा कि यह उत्सव से ज्यादा आत्ममंथन और आत्मचिंतन का अवसर है। यह उत्सव भी संघ ने पाँच प्रण करके मनाया। इन पाँच प्रणों का उद्देश्य ऐसा समाज बनाना है जो संस्कारित भी हो। समरस भी हो। आत्मनिर्भर भी हो। पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भी हो। और अपने कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहें। मैं समझता हूँ कि ये पाँच प्रण विकसित भारत के पाँच आधारस्तंभ कहे जा सकते हैं।

साथियों,

कहने के लिए बहुत बातें हैं, लेकिन समय की अपनी सीमा है। अंत में, मैं इस पुस्तक की सफलता की कामना करते हुए, अपनी वाणी को विराम देता हूँ।