इनोवैशन हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है, और मैरिटाइम एक्सीलेंस हमारी ऐतिहासिक ताकत रही है: रक्षा मंत्री

Text of RM’s speech at the Maritime Conclave “Sagar Sankalp” in Kolkata

Garden Reach Shipbuilders & Engineers, और The Week द्वारा आयोजित, ‘सागर संकल्प’ Maritime Conclave में, आप सभी के बीच आकर, मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही है। यह मंच, विचार-विमर्श का तो अवसर प्रदान कर ही रहा है, इसके साथ-साथ यह conclave, भारत के maritime future की दिशा तय करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है। मैं, Garden Reach Shipbuilders & Engineers, और The Week को, इस महत्त्वपूर्ण आयोजन के लिए बधाई देता हूँ।

साथियों, यह आयोजन बंगाल की धरती पर, कोलकाता में हो रहा है। इस धरती की अपनी एक अलग ऊर्जा है। बंगाल की भूमि ने, भारत को एक तरफ साहित्य और कला दिया, तो दूसरी तरफ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय स्वाभिमान को भी दिशा दी । एक समय था, इतिहास में इस स्थान का, अपना एक special maritime importance था। भारत के east से, कोई भी समुद्र के रास्ते जब भारत आता था, तो कोलकाता उसका centre हुआ करता था। व्यापार यहीं से आया। नए विचार यहीं से आए। नई तकनीकें यहीं से आईं, और संवाद का एक लंबा सिलसिला यहीं से शुरू हुआ। हुगली के किनारे स्थित यह शहर, देश की आर्थिक यात्रा का भी साक्षी रहा है, और राष्ट्रीय जागरण का भी केंद्र रहा है।

अभी कुछ ही महीने पहले, यहीं पर Combined Commanders’ Conference आयोजित हुई थी। उसमें हमारे प्रधानमंत्री जी की भी उपस्थिति रही थी। उसमें Maritime सहित कई Strategic विषयों पर चर्चा हुई थी। और आज का यह Maritime Conclave भी, उसी Continuity की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। मुझे प्रसन्नता है, कि Garden Reach Shipbuilders & Engineers, और The Week मिलकर इस संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं।

साथियों, Garden Reach Shipbuilders & Engineers का इतिहास यदि हम देखें, तो पाएँगे, कि इसकी जड़ें उन्नीसवीं शताब्दी से जुड़ी हैं। वह दौर ऐसा था, जब देश के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं। ऐसे समय में GRSE जैसी संस्थानों ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। GRSE, 1884 में, एक छोटे riverside workshop से शुरू हुई थी, और आज यह भारत के अग्रणी defence shipyards में बदल चुकी है। इसने 790 से अधिक vessels, जिसमें 110 से अधिक warships हैं,  उनका निर्माण किया है। GRSE की expertise frigates, corvettes, anti-submarine warfare ships, एवं landing ships बनाने में है। परंतु बड़ी बात यह है, कि GRSE ने friendly foreign nations को भी, warships and maritime platforms export करके, भारत की साख, और defence diplomacy को मजबूत किया है। High indigenisation levels, advanced in-house design capability, और MSMEs के साथ मजबूत supply chain network ने, इसे national maritime transformation का एक प्रमुख स्तंभ बना दिया है।

जहाँ तक ‘The Week’ की बात है, तो आप जैसे media organization ने, पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित किया है; एक serious और balanced approach प्रस्तुत किया है। Media केवल सूचना देने का माध्यम ही नहीं होती है। वह समाज की समझ को आकार भी देती है। एक तरफ GRSE है, जो स्टील और मशीनरी से देश की ताकत को साकार रूप देता है। और दूसरी तरफ The Week जैसा मीडिया है, जो शब्दों और विचारों से उसी ताकत को जन-जन तक पहुंचाता है।

साथियों, मैं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से अपनी बातें आपके बीच रखूँगा। जब हम भारत के, गौरवशाली इतिहास पर ध्यान देते हैं, तो हमें कई सारी बातें मिलती हैं। लगभग ढाई हजार वर्ष पहले से लेकर मध्यकाल तक, भारत global trade का एक प्रमुख center रहा। उस समय, जब दुनिया के कई हिस्से विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में थे, तब भारत knowledge, commerce और culture, तीनों ही क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहा था।

उस समय भारत के जहाज़, समुद्री मार्गों के माध्यम से दूर-दूर तक यात्रा करते थे। हमारा संपर्क Roman Empire और मेसोपोटामिया की सभ्यता तक स्थापित था। पूर्व दिशा में श्रीलंका, दक्षिण-पूर्व एशिया, कंबोडिया और इंडोनेशिया तक भारतीय व्यापारियों और समुद्री यात्रियों की active presence थी।

यह जो बाहरी दुनिया से संपर्क था, वह भी केवल trade तक सीमित नहीं था, बल्कि cultural exchange का भी माध्यम था। भारत ने spices, textiles और handicrafts export किए, लेकिन इसके साथ-साथ हमने philosophy, astronomy, mathematics, और cultural ideas भी विश्व के साथ साझा किए।

आज भी जब हम, South-East Asia की ओर देखते हैं, तो इस ऐतिहासिक संबंध के अनेक जीवंत उदाहरण दिखाई देते हैं। आप में से अनेक लोग अवगत होंगे, कि Thailand की प्राचीन राजधानी ‘अयुथ्या’ का नाम, अयोध्या से inspired रहा। Indonesia की national airline का नाम भी “गरुड़” है, जो भारतीय पुराणों की सांस्कृतिक स्मृति को दर्शाता है।

आप शायद अवगत हों, कि अभी हाल ही में वापस आए, “कौण्डिन्य Ship Project” के माध्यम से, भारत की इसी विरासत को, पुनर्जीवित करने का एक प्रेरक प्रयास देश को देखने को मिला। इस initiative का उद्देश्य, प्राचीन भारतीय shipbuilding techniques को समझना, और उन्हें modern perspective में पुनः स्थापित करना था। इसके तहत, Stitched ship method के आधार पर एक special ship का निर्माण किया गया। जिसमें लकड़ी के तख्तों को iron nails से नहीं, बल्कि नारियल की रस्सियों से जोड़ा गया और wooden planks से seal किया गया। यह वही तकनीक थी, जिसका उपयोग हमारे प्राचीन समुद्री यात्रियों द्वारा किया जाता था।

इस ship ने पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक लगभग 1500 nautical miles की सफल यात्रा पूरी की। पूरे देश ने यह अनुभव किया, कि कैसे इस technical experiment ने अतीत और वर्तमान के बीच, एक living bridge का काम किया। यह हमें याद भी दिलाता है, कि innovation हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है, और maritime excellence, हमेशा से हमारी historical strength रही है।

साथियों, आज जिस तरह से maritime domain की importance बढ़ रही है, उसे ध्यान में रखते हुए, यह आवश्यक है, कि हम अपने ancient wisdom, और modern technology, दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ें। क्योंकि जो राष्ट्र अपने इतिहास से प्रेरणा लेता है, वही भविष्य को आत्मविश्वास के साथ गढ़ता है।

आप देखिये, कि आज maritime domain पहले की तुलना में, काफी बदल चुका है। आज के समय में maritime domain, केवल trade routes या naval strength तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह national resilience, economic growth, technological innovation और strategic autonomy का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है।

बदलती global geopolitics के इस दौर में, oceans एक बार फिर विश्व की Power balance के केंद्र में आ गए हैं। ऐसे समय में, एक major maritime nation के रूप में, भारत का यह दायित्व है, कि वह confidence, capability और clear vision के साथ leadership प्रदान करे।

आज हम सब एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर तेजी से नई परिस्थितियाँ दिखाई दे रही हैं। Supply chains re-align हो रही हैं, energy pathways को लेकर नए समीकरण बन रहे हैं, और समुद्री क्षेत्रों में गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं। पहले समुद्र को केवल व्यापार का माध्यम माना जाता था, लेकिन आज हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं, कि समुद्र strategic dominance का केंद्र बनता जा रहा है।

दुनिया बदल रही है, और पुराने notions टूट रहे हैं। यह बात हम पिछले कई वर्षों से लगातार देख रहे हैं।  जो अलग-अलग flash points और conflicts दुनिया में दिख रहे हैं, वे ऊपर-ऊपर से भले ही आपस में जुड़े हुए नजर नहीं आते। हर भौगोलिक और regional स्थिति की अपनी अलग background, और अपनी अलग कहानी है। फिर भी अगर गौर से देखें, तो एक common बात दिखाई देती है। आज वैश्विक स्तर पर हमेशा कुछ नया हो रहा है, एक परिवर्तन चल रहा है। पुराने विचार, पुराना global order, पुरानी धारणाएँ तेज़ी से बदल रही हैं। यही वह uncertainties हैं, जिन्हें हमें समझना होगा।

अभी चल रही मिडिल ईस्ट की स्थिति, इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। आज जो वहां हो रहा है, वह बहुत असामान्य है। आगे चलकर मिडिल ईस्ट में, या हमारे पड़ोस में परिस्थितियाँ किस दिशा में जाएँगी, इस पर अभी ठोस टिप्पणी करना कठिन है। यदि हम Strait of Hormuz, या पूरे Persian Gulf क्षेत्र को देखें, तो यह विश्व की energy security का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जब इस क्षेत्र में disturbance या disruption होता है, तो उसका सीधा असर तेल और गैस की सप्लाई पर पड़ता है। यही नहीं, आज हम supply chain disruptions केवल ऊर्जा क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी देख रहे हैं। इन uncertainties का सीधा प्रभाव, अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार पर पड़ता है।

साथियों, वर्तमान में स्थितियाँ असामान्य हैं, एवं ऐसा प्रतीत होता है कि आगे जाकर ये और dynamic होती जाएँगी। आज जिस तरह अलग-अलग देश ज़मीन पर, हवा में, समुद्र में, और अब तो space तक में, एक-दूसरे से टक्कर ले रहे हैं, वह सच में चिंता की बात है। यह एक abnormal situation है। What I consider as more worrying, is the fact, that this abnormalcy is becoming the new normal. इन सभी dynamic factors के साथ, आज की दुनिया में, एक और महत्वपूर्ण तत्व जुड़ गया है, और वह है, Technological dynamism. आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र में technology अभूतपूर्व परिवर्तन ला रही है। स्वाभाविक है, technology से related supply chain भी important हो गए है। High end technologies के साथ तो, supply का मुद्दा और भी गहराई से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के तौर पर, एक मोबाइल फोन से लेकर हवाई जहाज तक, या कोई और high technology system हो, इनकी supply chains लगातार diversify और complex हो रही हैं। Defence sector में तो यह technological dynamism और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आता है। Defence sector में आज high end और precision technologies का इस्तेमाल हो रहा है, इसीलिए हमारी सरकार का, शुरू से यह मानना रहा है कि इस uncertainity के दौर में, supply chain disruptions से बचने का एक मात्र उपाय है ‘आत्मनिर्भरता’।  और हमारी आत्मनिर्भरता के vision की एक प्रमुख धुरी है, Defence Public Sector Undertakings.

ऐतिहासिक दृष्टि से, भारत के Defence sector में Public Sector की प्राथमिकता रही है। पहले Ordnance Factory Board ने रक्षा निर्माण में, एक प्रमुख भूमिका निभाई। चार shipyards सहित विभिन्न क्षेत्रों में Defence Public Sector Undertakings ने राष्ट्रीय सुरक्षा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। परन्तु, लगातार परिवर्तनों, जिनमें से कुछ की मैंने अभी चर्चा भी की, उनके मद्देनज़र और हमारे defence production को qualitative और quantitative मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से कई structural और policy reforms को लागू किया है। जिससे efficiency, accountability और competitiveness बढ़ी हैं। अब transparency, financial discipline, performance benchmarking और R&D पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

विशेष रूप से shipbuilding sector में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है। Garden Reach Shipbuilders & Engineers, तथा हमारे और जो प्रमुख Defence Shipyards हैं, इन सब पर भी विशेष focus दिया गया है; ताकि हमारा industrial ecosystem मजबूत और futuristic बन सके। इन shipyards को production units के साथ-साथ, technology hubs के रूप में विकसित करने का भी लक्ष्य रखा गया है। Infrastructure modernisation, digital ship design tools, modular construction techniques और supply chain integration के माध्यम से इन्हें global standards तक ले जाने का प्रयास किया जा रहा है। और हम अपने उद्देश्य में सफल भी हो रहे हैं।

आज GRSE बस ships नहीं बना रहा, बल्कि green shipbuilding, electric ferries, hybrid propulsion systems और AI-enabled design optimisation जैसे क्षेत्रों में भी अग्रणी भूमिका निभा रहा है। भविष्य में यह संस्थान और भी उन्नति करे, इसकी मैं कामना करता हूँ।

साथियों, आज यहाँ private sector के भी players उपस्थित हैं। मैं आप सबसे भी एक बात कहना चाहूँगा। Structural reforms के क्षेत्र में, हमारा प्रयास यह भी रहा है, कि private defence industry को ऐसी अनुकूल परिस्थितियाँ दी जाएँ, जो उन्हें level playing field प्रदान करें। सिर्फ field ही क्यों, बल्कि मैं कहूँगा कि level playing sky तैयार करें, क्योंकि यह बहुत ऊँची उड़ान है। हमने Import-export प्रक्रियाओं में सुधार किया है। Transfer of Technology की व्यवस्था, DRDO की labs को private sector के लिए उपलब्ध कराना, green channel certification की सुविधा प्रदान करना, defence corridors की स्थापना, DPSUs के reserved orders को खोलना, ये सभी कदम केवल facilitate करने के लिए नहीं थे, बल्कि private sector को, maximum performance के लिए enable करने के लिए भी थे। हमारा उद्देश्य यही रहा है, कि public sector और private sector, shoulder to shoulder आगे बढ़ें; और आज यह हो भी रहा है। इसके अच्छे परिणाम भी हमारे सामने हैं। आज देश में produce होने वाले defence articles, platforms, equipment और accessories में लगभग 25 प्रतिशत योगदान private industry से आ रहा है।

यह गर्व की बात है, कि हमारी private industries, लगातार बेहतर कर रही हैं।  Tata की Morocco में उपस्थिति, L&T की international activities, Armenia को 155 mm gun systems की supply, Akash जैसे systems का export या collaboration, ये सभी private sector की बढ़ती भूमिका को दिखाते हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री जी द्वारा, H-125 helicopter की Assembly Line का inauguration इसी बात का प्रमाण है। विशेष रूप से naval systems के क्षेत्र में, आत्मनिर्भरता का जो assimilation हुआ है, वह तो और अच्छा response है। भारत में निर्मित naval platforms और systems में Indian content का स्तर काफी ऊँचा है।

हाल ही में, मैंने Society for Indian Defence Manufacturers (SIDM) के एक कार्यक्रम में private sector की इन्हीं उपलब्धियों को देखते हुए, उन्हें एक लक्ष्य दिया था। वह यह, कि private sector को कुल Defence Production by Value की 50 percent की भागीदारी ensure करनी है। मुझे यह बताते हुए भी बड़े गौरव की अनुभूति होती है, कि रक्षा क्षेत्र में भारत पूरी गति के साथ आत्मनिर्भरता की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। यदि मैं आंकड़ों की बात करूं, तो पिछले financial year तक, हमारा domestic defence production, डेढ़ लाख करोड़ रूपये के record आँकड़े को भी पार कर चुका है। साथ ही हमारा defence export भी, 24,000 करोड़ रुपए के रिकॉर्ड आँकड़े को पार चुका है। हालांकि इन आँकड़ों से हमें overwhelmed नहीं हो जाना है। हमें अभी और बहुत आगे जाना है; जहां ये सारे numbers कुछ मायने नहीं रखेंगे। हमें numbers से भी आगे देखना है। मुझे पूरा विश्वास है, कि हम सब मिलकर, उस दिशा में भी आगे बढ़ेंगे। मुझे पूरा विश्वास है, कि आप लोग 50% private participation के लक्ष्य को भी, अवश्य पूरा करके दिखाएंगे। आप लोगों का effort, मज़बूती से दिखाता है, कि आत्मनिर्भरता हमारे लिए केवल एक slogan नहीं रही, बल्कि एक practical reality के रूप में स्थापित हो रही है।

आज स्थिति यह है, कि हम जिस आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के साथ आगे बढ़े थे, उसके सकारात्मक परिणाम हमारे सामने है। आज भारतीय नौसेना के लिए भी, जितने warships और submarines order पर हैं, वे सभी भारतीय shipyards में बन रही हैं। एक समय था, जब हम बड़े platforms के लिए दूसरों की ओर देखते थे, लेकिन आज हम design, engineering, construction और lifecycle support तक की पूरी क्षमता, अपने भीतर विकसित कर रहे हैं। यही तो आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ है। जब हम कहते हैं, कि हम Builder’s Navy बन चुके हैं, तो यह कोई slogan नहीं है, यह ground reality है।

यहाँ यह भी समझना जरूरी है, कि बड़े-बड़े platforms का निर्माण मात्र ही, shipyards की उपलब्धि नहीं होते। इसके पीछे पूरा Industrial structure काम करता है। यानी अगर front end पर warship दिख रही है, तो back end पर एक विस्तृत Industrial ecosystem सक्रिय होता है। GRSE आज  केवल एक बड़े shipyard की कहानी नहीं है; इसके पीछे एक विशाल MSME ecosystem खड़ा है। हजारों MSMEs, start-ups और indigenous vendors इस supply chain का हिस्सा हैं। मुझे बताया गया है, कि Defence Shipyards को भी support करने के लिए, हजारों MSMEs जुड़े हुए हैं। इसे आप सभी Conglomerate Effect के नाम से भी जानते हैं I Conglomerate effect में एक synergy आती है, efficiency बढ़ती है, risk mitigation होता है, एवं innovation का ecosystem बनता है I

इसी सोच के साथ, भारत सरकार ने कई targeted initiatives और institutional reforms को आगे बढ़ाया  हैं। लेकिन मैं इसे केवल policy language में नहीं रखना चाहता। बात सीधी है, अगर हमें भारत को shipbuilding में आगे ले जाना है, तो हमें industry को confidence देना होगा। इसी भावना से हम अनेक financial assistance schemes लेकर आएं। Long term funding के लिए, हमने dedicated mechanism बनाया। FDI norms को liberalise किया। हमने PPP model को encourage किया। Defence shipbuilding को, strategic partnership framework में खोला गया। Maritime India Vision 2030, एवं Maritime Amrit Kaal vision 2047 के तहत, world-class shipbuilding clusters develop करने के लिए, करीब 3 लाख करोड़ रूपये का investments plan किया गया हैI

आज Coastal states में clusters विकसित किए जा रहे हैं। हमारा लक्ष्य साफ है, 2030 तक हमें top ten shipbuilding nations में स्थान बनाना है। और 2047 तक तो हमें top five में पहुँचना है। यह सपना बड़ा तो है, लेकिन असंभव नहीं, और यह केवल सरकार का लक्ष्य नहीं है, यह हम सब की जिम्मेदारी होनी चाहिए। यह industry, workforce और policy system, तीनों की shared responsibility है।

इस ‘सागर संकल्प’ conclave में, मैं यह कहना चाहूँगा, कि सागर यानी समुद्र, आज opportunity भी है, और challenge भी है। यदि हम coordinated planning, technology adoption, और institutional synergy के साथ आगे बढ़ें, तो भारत का maritime domain सुरक्षित, समृद्ध और सशक्त होगा। यही समय है, जब हमें अपने maritime vision को Clear, Confident और Collective रूप में आगे बढ़ाना है।

Indian Navy की readiness, Operation Sindoor जैसे अभियानों की सफलता, और आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ते कदम, ये सभी संकेत देते हैं, कि भारत का रक्षा क्षेत्र सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।

यही हमारा संकल्प है। यही हमारी दिशा है। यही हमारा विश्वास है। आज आवश्यकता है, तो बस निरंतरता की, समन्वय की और राष्ट्रीय संकल्प की। यदि हम सब मिलकर, maritime vision को आगे बढ़ाएँ, तो आने वाले वर्षों में, भारत न केवल अपने हितों की रक्षा करेगा, बल्कि वैश्विक समुद्री स्थिरता में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

इसी विश्वास और इसी संकल्प के साथ, मैं इस सम्मेलन की सफलता की कामना करता हूँ। साथ ही, Garden Reach Shipbuilders & Engineers, और The Week को, भविष्य के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ देते हुए, मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ।

बहुत-बहुत धन्यवाद!!