पाकिस्तान को सही संदेश

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दक्षेस सम्मेलन में बाकी नेताओं के साथ राजनाथ सिंह

 

 पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय से निगाह रखने के कारण अगर मैं इसका विश्लेषण करूं तो यही कह सकता हूं कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ तमाम मतभेदों के बावजूद राजनाथ सिंह को पाकिस्तान भेजकर सही कदम उठाया क्योंकि यह कोई द्विपक्षीय दौरा नहीं था बल्कि क्षेत्रीय संगठन में हिस्सेदारी का सवाल था। भारतीय मंत्री के यहां नहीं जाने से पाकिस्तान को तो कोई फर्क नहीं पड़ता मगर दक्षेस के सदस्य देश जरूर इससे नाराज होते क्योंकि भारत इस संगठन का सबसे बड़ा सदस्य है और उसकी गैरमौजूदगी में यह बैठक ही विफल हो जाती। दक्षेस की वार्ता में भारत की भागीदारी जरूरी मानी जाती है। हालांकि इस बैठक में बांग्लादेश और अफगानिस्तान ने अपने मंत्रियों को नहीं भेजा क्योंकि अलग-अलग वजहों से ये दोनों देश पाकिस्तान से बेहद नाराज हैं।

अपनी अंदरूनी समस्याओं से बुरी तरह ग्रस्त पाकिस्तान नहीं चाहता था कि भारत दक्षेस के मंच का इस्तेमाल उसकी सच्चाई सामने लाने के लिए करे मगर राजनाथ सिंह के दौरे ने उसकी मंशा पूरी नहीं होने दी। सिंह ने बिना पाकिस्तान का नाम लिए आतंकवाद पर उसके दोहरे रवैये को उजागर कर दिया। उन्होंने अपने भाषण में कश्मीर में जारी आतंकवाद को आजादी की लड़ाई बताने की कड़ी आलोचना भी की। यही नहीं, आतंकवादी बुरहान वानी को शहीद करार देने की भी निंदा की। इस सबसे पाकिस्तान को भड़कना ही था क्योंकि कश्मीर अभी उसे अपने सभी संकटों का निदान दिख रहा है।

यह समझा जाना चाहिए पाकिस्तान अभी चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है। उसकी सेना के 82 हजार जवान उत्तर-पश्चिमी सीमा पर तैनात हैं और इस पख्तून कबायली इलाके में संघर्ष की स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि वहां के करीब 18 लाख लोग बेघर हो चुके हैं। इनमें से करीब 50 हजार लोग सीमा पार कर अफगानिस्तान चले गए हैं। अफगानिस्तान में तालिबान आतंकियों को पाकिस्तानी मदद ने स्थिति और बिगाड़ दी है जिसके कारण अफगानिस्तान से उसके संबंध खराब हो चुके हैं। ईरान भी पाकिस्तान से नाराज चल रहा है। यही नहीं, पाकिस्तान का सबसे बड़ा आर्थिक और सैन्य मददगार अमेरिका भी उससे नाराज हो गया है जिसके कारण देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई है। पूरी दुनिया में आज की तारीख में सिर्फ दो ही देश पाकिस्तान के मित्र हैं, पहला चीन और दूसरा तुर्की। तुर्की में भी वहां की सरकार अभी विफल सैन्य तख्तापलट की घटना के बाद अंदरूनी समस्याओं से ही जूझ रही है इसलिए वस्तुत: अभी पाकिस्तान का पूरी दुनिया में सिर्फ एक ही मित्र है और वह चीन है। कभी पाकिस्तान को दुनिया के इस्लामी देशों से भरपूर मदद मिला करती थी मगर वह स्थिति भी बदल चुकी है। अधिकांश इस्लामी देश अब पाकिस्तान से पल्ला झाड़ चुके हैं। दूसरा संकट खुद पाकिस्तान की सरकार में है। सरकार और सेना के संबंध एक बार फिर से खराब हो गए हैं। पनामा पेपर्स में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के रिश्तेदारों के नाम आने के कारण शासन पर उनकी पकड़ कमजोर हुई है और इसलिए सेना को हावी होने का मौका मिल रहा है। इन सब संकटों का आसान हल नवाज शरीफ सरकार को कश्मीर मुद्दे में दिख रहा है। इसलिए पाकिस्तान की सरकार ने जोर-शोर से इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया है। अभी आजादी एक्सप्रेस ट्रेन को आतंकी बुरहान वानी की तस्वीरों से सजाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि रोजमर्रा की समस्याओं और सरकार की विफल विदेश नीति से जनता का ध्यान हट सके। यह कमाल की बात है कि एक आतंकी जो पाकिस्तान द्वारा मुहैया कराए गए एके 47 राइफल के संग पूरी दुनिया में अपनी तस्वीरें फैलाता फिर रहा था उसके मारे जाने पर पाकिस्तान उसे शहीद करार दे रहा है। भारत के अभिन्न अंग कश्मीर का कोई बाशिंदा अगर अपनी ही सरकार के खिलाफ हथियार उठाए तो उसे आतंकी ही तो कहा जाएगा।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मुझे नहीं लगता कि भारत और पाकिस्तान के संबंध निकट भविष्य में सुधरने वाले हैं। भारत सरकार भी शायद इस बात को समझ चुकी है इसलिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान में दक्षेस के मंच से ऐसा सख्त भाषण दिया। इसके बावजूद मेरा मानना है कि भारत को कश्मीर के मुद्दे पर अपने प्रयास को और बढ़ाने की जरूरत है। अगर आप किसी क्षेत्र को अपना अभिन्न अंग बताते हैं तो वहां के नागरिकों से सीधी बात करने में कैसी हिचक? इसलिए बेहतर है कि कश्मीर में अवाम से ज्यादा बातचीत की जाए, सर्वदलीय बैठकों के ज्यादा प्रयास हों और हालात सुधारने के लिए जो भी किया जा सकता है वह किया जाना चाहिए। बाकी पाकिस्तान से संबंध फिलहाल तो नहीं सुधरने वाले।

(लेखक वरिष्ठ राजनयिक एवं पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रहे हैं)

(सुमन कुमार से बातचीत पर आधारित)

 

स्रोत :: आउटलुक

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