कला समाज को एक पहचान देती है: श्री राजनाथ सिंह

कला साधक संगम (कुरुक्षेत्र)



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 कुरूक्षेत्र की इस पवित्र भूमि पर ‘संस्कार भारती’ द्वारा जो यह ‘अखिल भारतीय कला साधक संगम’ आयोजित किया गया है वह प्रतिभावान और अनुभवी कलाकारों का संगम भी है और समागम भी है।

 जानकारी प्राप्त हुई है कि भारत के अलग-अलग राज्यों से करीब 4000 कला-साधक यहां कुरूक्षेत्र में आए हैं। ये कला साधक जहां अपनी प्रस्तृतियों के माध्यम से अपनी प्रतिभा-क्षमता का प्रदर्शन करेंगे वहीं एक-दूसरे से संपर्क और संवाद करके अपनी प्रतिभा का संवर्धन भी करेंगे।

 भारतीय परम्परा में कला को साधना की मान्यता प्राप्त है। यह संयोग नही है कि जिस नाट्य-शास्त्र को भारतीय कला की आदि-पुस्तक/पहली पुस्तक के रूप में जाना जाता है उसके रचनाकार भरत मुनि एक साधक भी थे और संत भी थे।

 दो हजार वर्षों से भी अधिक पुराने ‘नाट्य शास्त्र’ को भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ‘Performing Arts की गीता’ कहा जाए तो अतिश्योक्ति नही होगा।

 चूंकि यहां कला साधकों का समागम हो रहा है इसलिए मैं यहां पर ‘रसों’ की चर्चा करना चाहूंगा।

 जैसा कि आप जानते हैं कि कला के प्रदर्शन से रस की उत्पत्ति होती है और भरत मुनि ने नाट्य शास्त्र में लिखा है कि रस नौ प्रकार के होते है। यह ‘नवरस’ दिखते नहीं है मगर हर व्यक्ति अपनी जिंदगी में इनका अनुभव करता है।

 इसलिए मेरा मानना है कि कला एक ऐसी विधा है जो अदृश्य को सदृश्य और अनकहे को कह देना संभव बनाती है।

 कला समाज को प्रभावित करती है और समाज से प्रभावित भी होती है। किसी ने कहा कला समाज की अभिव्यक्ति है तो किसी ने कला को परिवर्तन की अभिव्यक्ति माना है।

 कला को आप किस रूप में देखते है इस बात पर तो बहस की गुंजाईश है मगर इस बात पर सभी एकमत होते हैं कि कला और समाज एक दूसरे के बिना जीवित नहीं रह सकते।

 इसलिए मैं मानता हूं कि कला किसी भी समाज की ‘Collective Memory’ है जो उस समाज को एक पहचान देती है।

 जब हम भारत या भारतीय कलाओं की बात करते हैं तो हमारे सामने उसका इतना विराट स्वरूप प्रकट होता है कि उसकी चर्चा एक भाषण में कर पाना तो असंभव है। सिर्फ कुछ बातों की चर्चा मैं यहां करना चाहूंगा जो कला के महत्व को और समाज पर उनके प्रभाव को समझने में मदद कर सकती है।

 भारतीय कला जगत की समृद्धि की तुलना केवल अन्तरिक्ष से की जा सकती है जिसका ओर-छोर देख पाना असंभव है।

 जैसा कि मैंने नाट्य शास्त्र की चर्चा की और उसे विश्व के सभी कलाकारों की गीता की संज्ञा दी। मगर कला के संसार की जो सबसे बड़ी ‘कृति’ है उसकी चर्चा मैं आज यहां कुरूक्षेत्र में नहीं करूंगा तो बात अधूरी रहेगी।

 मैं मानता हूं कि कला के संसार की सबसे महान कृति है ‘महाभारत’ जो जीवन के हर पहलू को इतने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है कि हजारों साल बीत जाने के बावजूद उसकी प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है।

 यदि ‘महाभारत’ एक महान ‘कृति’ है तो भगवान श्रीकृष्ण को भारतीय परम्परा में ‘सबसे पारंगत कलाकार’ माना गया है। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण 16 कलाओं में पारंगत एकमात्र पुरूष हैं। यही कारण है कि उन्हें ‘पूर्णावतार’ की संज्ञा दी है।

 भगवान श्रीकृष्ण द्वारा जो सबसे बड़ा ज्ञान दिया गया वह ‘गीता ज्ञान’ इसी कुरूक्षेत्र की धरती से दिया गया है।

 जिन सोलह कलाओं में भगवान श्रीकृष्ण को पारंगत माना गया उनमें से दो की चर्चा मैं यहां करना चाहूंगा। उन दो कलाओं के नाम हैं ‘उत्कर्षिणी’ एवं ‘कर्मण्यता’।

 उत्कर्षिणी का अर्थ है ऐसी कला जो लोगों के उत्थान-उत्कर्ष में सहायक हो एवं कर्मण्यता यानि ऐसी कला जो कर्म करने की प्रेरणा दे।

 कला और कलाकार का एक उद्देश्य सबको पता है वह है ‘रस की उत्पत्ति’ जिसे सामान्य भाषा में मनोरंजन या Entertainment कहा जाता है। मगर कला केवल मनोरंजन तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए।

 कला मनोरंजन के साथ-साथ प्रेरणादायी भी होनी चाहिए। कला ऐसी हो जो Inspire करे समाज को Uplift करें।

 जब हम परिवर्तन या पुनर्जागरण की बात करते हैं तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका कला की होती है।

 यूरोप में जब Renaissance यानि पुनर्जागरण हुआ तो उसका नेतृत्व चित्रकारों, मूर्तिकारों, कलाकारों, नाटककारों एवं लेखकों ने किया। उन्होंने समाज को झकझोरा और परिवर्तन का अलख जगाया।

 भारत में 19वीं शताब्दी में जो सांस्कृतिक पुनर्जागरण देखा गया उसका नेतृत्व समाज सुधारकों ने किया। इसका अर्थ यह नहीं कि कला ने भारतीय पुनर्जागरण में योगदान नहीं किया।

 जिस वन्दे मातरम के उद्घोष से पूरा भारत गुंजायमान हुआ वह कविता बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा ‘आनंद मठ’ पुस्तक में 1882 में लिखी गई।

 यदि भारत को पूरे देश में माता के सदृश वन्दनीय माना जाता है तो उसमे बंकिम चन्द्र चटर्जी की कविता ‘वन्दे मातरम’ की महती भूमिका रही।

 मगर बहुत कम लोग यह बात जानते है कि 1905 में गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के भतीजे अवनीन्द्र नाथ टैगोर ने एक ऐतिहासिक चित्र बनाया था जिसे ‘भारत माता’ के नाम से जाना गया। उस एक चित्र ने पूरे बंगाल में जनमानस को इतना प्रेरित किया कि सिस्टम निवेदिता उस चित्र को पूरे भारतवर्ष में ले जाना चाहती थी।

 ‘वन्देमातरम’ गीत और ‘भारत माता’ चित्र को समाज में जो स्वीकार्यता मिली और उससे जो प्रेरणा पैदा हुई उसका काफी असर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर पड़ा है।

 स्वतंत्रता संग्राम का अलख जगाने में हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी लेखनी का कितनी कुशलता से उपयोग किया इससे आप लोग भी अच्छी तरह परिचित है।

 आज देश की आजादी को 70 साल पूरे हो गए हैं। इस साल 1942 में हुए अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन को भी 75 वर्ष पूरे हो गए है।

 1942-1947 के बीच के पांच वर्ष आजादी के आन्दोलन में निर्णायक माने जाते है क्योंकि इस दौरान जो कुछ इस देश में घटा उसने ‘गुलाम भारत’ को ‘आजाद भारत’ में बदल दिया।

 आज भारत आजाद है मगर न जाने कितनी समस्याएं है जिनसे आज भी भारत जूझ रहा है। गरीबी, आतंकवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद और न जाने कितनी सामाजिक कुरीतियों से भारत को अभी तक जूझना पड़ रहा है।

 हमारे प्रधानमंत्री ने एक संकल्प लिया है और वह है नए भारत के निर्माण का जिसमें यह लक्ष्य रखा गया है कि 2022 तक यानि भारत की आजादी के 75वें वर्ष तक भारत को गरीबी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद से मुक्ति दिलानी है।

 यह काम केवल राजनीतिक सक्रियता से संभव नहीं है। इसमें समाज के हर वर्ग और विशेष रूप से प्रबुद्ध वर्ग जिनमें कलाकारों का विशेष महत्व है उनकी भागीदारी चाहिए।

 ‘नए भारत’ का क्या स्वरूप बने इस पर कला जगत को खुल कर अपनी बात कहने की जरूरत है।

 हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के माध्यम से सुनिश्चित की है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कला जगत की Oxygen/प्राणवायु है।

 इस राष्ट्रीय संकल्प को साकार करने की दिशा में सबसे बड़ी प्रेरणा हमारे कला जगत से जुड़े कलाकार दे सकते हैं।

 इसलिए इस अखिल भारतीय साधक संगम में पधारे हर कला साधक से मेरी यह विनम्र अपील है कि आप अपनी-अपनी विधा के माध्यम से ‘नए भारत’ का स्वरूप अभिव्यक्त करें।

 आप सभी कला साधक ‘नए भारत’ के शिल्पी है। इस देश को आपकी प्रतिभा और क्षमता से सही दिशा में मार्गदर्शन प्राप्त होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

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